आंखों को चुभती रहेगी फिल्‍म 'पिंक' की ये हकीकत, इसलिए जाएं देखने..!

अनुभा त्र‍िपाठी

First published: September 26, 2016, 3:27 PM IST | Updated: September 26, 2016, 4:02 PM IST
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आंखों को चुभती रहेगी फिल्‍म 'पिंक' की ये हकीकत, इसलिए जाएं देखने..!
हाल ही में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन की फिल्म पिंक लोगों को काफी पसंद आ रही है। समाज में महिलाओं...

हाल ही में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन की फिल्म पिंक लोगों को काफी पसंद आ रही है। समाज में महिलाओं के प्रति फैली रूढ़ीवादी सोच पर फिल्म एक जोरदार तमाचा है, जो लोग देर रात घर से निकलने वाली लड़कियों, लड़कों के साथ हंसने बोलने लड़कियों को अपनी बपौती समझते हैं खासकर उन्हें ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

यही नहीं फिल्म में कोर्ट में अमिताभ द्वारा बोले गए डायलॉग लोगों के दिल को छू गए। इन डायलॉग्स को फेसबुक पर भी धड़ल्ले से शेयर कर पुरुषों को संदेश देने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन फिल्म देखने के दौरान एक सवाल जो बार-बार मेरे मन में उठ रहा था कि इससे पहले भी तो हम महिलाओं ने कई बार-बार यही बात कही है, जिसे हमेशा ही अनसुना कर दिया जाता है, तो इसमें नया क्या है?

PINK_Movie_Poster

वैसे देखा जाए तो फिल्‍म में एक बात जो नई है वह थी कि ये सारी बातें बॉलीवुड फिल्म में कही गईं, जिसका हमारे समाज पर काफी असर है और उस इंसान द्वारा कही गई जिसे सदी के महानायक कहा जाता है और जिसकी एक्टिंग की दुनिया कायल है, इसलिए ये बात लोगों को काफी पसंद आ रही है और लोग इसे सुन भी रहे हैं और देख भी रहे हैं वो भी पैसे खर्च कर के।

जाहिर है समाज को केंद्र में रखकर फिल्‍में बनाने का बॉलीवुड में लंबे समय से चला आ रहा है। भले ही उस दौर में यथार्थवादी फिल्‍मों के बनाने का उद्देश्‍य समाज से ज्‍यादा अंग्रेजी हुकूमत को देश की असली तस्‍वीर दिखाने के लिए किया गया था, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि कलाएं चाहे फिर किसी रूप में हो,उसका एकमात्र उद्देश्‍य समाज के भीतर की बुराइयों के प्रति समाज के ही लोगों में जागरूकता लाना ही होता है। यकीनन जब बात सीधी तरह से न समझ में आती हो तो उसे समझाने के लिए कलात्‍मक और रचनात्‍मक तरीके अपनाए जाते हैं। ऐसे में माध्‍यम कई हो सकते हैं, चाहे फिर वह कविता हो, नाटक हो या फिल्‍में।

यदि बात इस फिल्‍म की करें तो, इसमें कोई शक नहीं है कि फिल्म में महिलाओं के प्रति समाज की दकियानूसी सोच को बखूबी दर्शाया गया है। लड़कों के लिए अलग नियम और लड़कियों के लिए अलग कानून बनाने वाले इस समाज में रह रहे सक्सेना, गुप्ता जैसे लोग हमारे भी आसपास रहते हैं, जो लड़कियों के कपड़ों और उनके देर से घर आने पर उनके कैरक्टर जज कर पूरी सोसाइटी में अपनी राय फैलाते हैं। फिल्म देख कर मेरी जैसी तमाम महिलाओं में कहीं ना कही ये उम्मीद जाग रही थी कि अब तक हमारे द्वारा बोली गई ये बातें जो इस बहरे समाज को सुनाई नहीं देती आई हैं, शायद अमिताभ अपनी दमदार एक्टिंग के दम पर लोगों को समझा सकें।

अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब साल 2012 में निर्भया गैंगरेप ने पूरे देश को हिला दिया था उसके बाद पूरे देश में फैले जनआक्रोश के दौरान भी महिलाओं ने चीख-चीख कर यही बात कही थी कि हमें सीख देने वाले अपने लड़कों को काबू में रखें और उन्हें ये सिखाएं की महिलाओं के कपड़े भड़काऊ नहीं उनकी सोच गंदी है।

क्‍या ये सवाल अब नहीं उठाया जाना चाहिए कि लड़कियों के चाल चलन का निर्णय करने वाले ये देखें कि उनके लड़के घर के बाहर सुबह से शाम तक क्या करते हैं? हमारे इस पुरुषवादी समाज में क्यों आखिर सारे नियम कानून लड़कियों के लिए हैं?  क्या कोई ऐसा नियम कानून नहीं जो लड़कों को इन अपराधों को करने से रोक सके? क्यों हमारा कानून अबतक उन दंरिदों में ये खौफ पैदा नहीं कर पाता कि आखिर वो पकड़े गए तो उनका क्या हश्र होगा?

मौके की नजाकत को देखते हुए ये वादा भी किया गया कि महिलाओं के प्रति एक बेहतर माहौल बनाया जाएगा और अब किसी निर्भया को कुर्बान नहीं होना पड़ेगा। लेकिन धीरे-धीरे लोगों के जेहन से इस घटना कि छवि धूमिल होने लगी फिर सबकुछ वैसा ही होने लगा।

एक सवाल जो हर लड़की के मन कौंधता है कि क्यों आखिर देर रात घर से निकलने से पहले हमें ही अपनी नजर घड़ी की सुईंयों की तरफ दौड़ानी पड़ती हैं। रात का अंधेरा तो हर किसी के लिए बराबर होता है फिर क्यों इसका बोझ सिर्फ महिलाओं को ही ढोने के लिए कहा जाता है। अपनी पसंद के कपड़े पहनने से पहले महिलाओं को सौ बार सोचना होता है कि क्या वो ये कपड़े पहन कर बस, मेट्रो, ऑटो में सफर कर सकती है? क्या राह पर चलने वाले कुछ लोगों की गंदी निगाहें उसे इस कपड़े के साथ सड़क पर चलने देंगी? अगर इसका जवाब ना है तो उसे अपनी पसंद के कपड़े पहनने का कोई हक नहीं है।

महिलाओं के लिए हम एक नया समाज बनाने में तभी सक्षम हो पाएंगे जब हमारे समाज में रह रहे लोगों की महिलाओं के प्रति सोच बदल जाए और वो उन्हें एक आम इंसान की तरह देखें। क्योंकि समाज की सोच और महिलाओं के प्रति घटने वाले अपराध एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन जाने कब ये सपना साकार होगा और इसके लिए ना जाने कितनी और पिंक जैसी फिल्में बनानी पड़ेंगी।

(Photo : Film poster)

(लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं आईबीएन खबर डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी आईबीएन खबर डॉट कॉम स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  blogibnkhabar@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

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