बंगाल नहीं, गुजरात में बनेगी महाश्वेता की समाधि

आशीष अंशु

First published: August 19, 2016, 8:57 AM IST | Updated: August 19, 2016, 8:57 AM IST
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बंगाल नहीं, गुजरात में बनेगी महाश्वेता की समाधि
सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन में महाश्वेता देवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने नंदीग्राम में कम्यूनिस्ट बर्बरता की जमकर आलोचना...

सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलन में महाश्वेता देवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने नंदीग्राम में कम्यूनिस्ट बर्बरता की जमकर आलोचना भी की। वे वास्तव में देश के अंदर गरीब, दलित, पिछड़ों और घुमंतू जनजातियों की आवाज थीं। इस देश में एक हजार से अधिक घुमंतू जातियों के ऊपर लागू अपराधी जातियों का कानून, चाहे कानून की किताब से हट गया हो, लेकिन वह पुलिस के काम काज में आज भी शामिल हैं।

घुमंतू जातियों को आज भी पुलिस अपराधी ही मानती है। घुमंतू जातियों के अधिकार के लिए महाश्वेता देवी ने ‘डिनोटिफायड एंड नोमेडिक ट्राइव्स राइट्स एक्शन ग्रुप’ नामक संस्था का गठन किया और इनके अधिकारों के लिए खुद भी लगातार संघर्ष किया।

Mahasweta Verma

इधर, बंगाल में महाश्वेता के संघर्ष का ही परिणाम था कि बुधन सबर नामक सबर घुमंतू जनजाति समाज से आने वाले युवक की पुलिस कस्टडी में हुई हत्या के मामले उसके परिवार को न्याय मिला। इसके लिए महाश्वेता को लंबा संघर्ष करना पड़ा। इसी प्रक्रिया में पुरुलिया-मेदिनीपुर में शबर आदिवासी समिति और छोटानागपुर बंधुआ मुक्ति समिति बनाकर महाश्वेता ने संग्राम किया।

उनके व्यक्तिगत जीवन के संघर्षों ने उनकी कहानियों और उनके उपन्यास को भी स्वर दिया। उनकी कहानियों के नायक आम तौर पर समाज में हाशिये पर डाल दिए गए पृष्ठभूमि से ही आते थे और उन्हें फिर स्वर महाश्वेता देती थीं। महाश्वेता ने शबर और लोध के लिए लिखा कि किस तरह पश्चिम बंगाल में 60 के करीब लोध और शबर को लूट और चोरी के आरोप में मार गिराया गया, लेकिन एक भी रुपया उनके पास पुलिस बरामद कर के दिखा नहीं पाई।

महाश्वेता देवी को पहली बार वड़ोदरा में भाषा के वेरियर एल्विन मेमोरियल लेक्चर में सुनने का मौका मिला। यह भाषा के साथ महाश्वेता देवी का पहला परिचय था। भाषा से जुड़े प्रोफेसर गणेश देवी के अनुसार, उसके बाद भाषा संस्थान महाश्वेता देवी का मानों दूसरा घर ही हो गया था। जब तक उनके स्वास्थ्य ने साथ दिया वे नियमित वड़ोदरा और तेजगढ़ स्थिति आदिवासी अकादेमी आती रहीं। महाश्वेता आदिवासी अकादमी के पूरे कॉन्‍सेप्‍ट को बेहद पसंद करती थीं।

महाश्वेता ‘भाषा’ की मार्गदर्शक और संस्थान में ट्रस्टी थीं:  भाषा संस्थान द्वारा जारी एक पत्र के अनुसार प्रोफेसर गणेश देवी ने महाश्वेता देवी की मृत्यु के बाद उनके परिवार से संपर्क किया। उनके परिवार के लोग महाश्वेता की अस्थियां तेजगढ़ स्थित आदिवासी अकादमी में रखने के लिए देने को तैयार हो गए हैं। प्रोफसेर देवी स्वयं महाश्वेता देवी की अस्थियों को लाने के लिए कोलकाता जाने वाले हैं।

21 अगस्त को अस्थि कलश वड़ोदरा स्थित भाषा कार्यालय में सुबह साढ़े नौ बजे से 11 बजे तक उनके लिए रखा जाएगा, जो दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं। 21 तारीख को ही ही अस्थि कलश आदिवासी अकादेमी, तेजगढ़ ले जाया जाएगा, जहां 03 बजे से लेकर 04.30 बजे तक प्रार्थना सभा होगी। उसके बाद अस्थि कलश को प्रस्तावित समाधी स्थल तक ले जाया जाएगा।

आदिवासी अकादमी में आने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों को जरूर महाश्वेता का अस्थि कलश उनके जैसा बनने के लिए प्रेरित करेगा। एक ऐसी महिला जो हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति के पक्ष में खड़ी रही और लगातार उनके लिए लड़ती रहीं।

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