बाबुषा कोहली की टाइम लाइन से तीन कविताएं..!

बाबुषा कोहली

First published: September 12, 2016, 1:21 PM IST | Updated: September 12, 2016, 2:24 PM IST
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बाबुषा कोहली की टाइम लाइन से तीन कविताएं..!
Sundarbans National Park, Bangladesh. (Photo by Marka/UIG via Getty Images)

  (1)

   सुबह

   --------

दिन-दहाड़े

आसमान की जेब कट गई

रोड के आख़िरी टर्न पे टपका

इक सोने का सिक्का

पंछी, जंगल, शहर, समन्दर

सारे मालामाल हो गए

अब मंडी में बेचेंगे सब

मुट्ठी भर-भर उजियारा

और

बदले में अपने हिस्से की

सांस खरीदेंगे

          (2)

ग्रहण का अमरित

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उलीचना अंखियों से तप का जल

अजुरी भर-भर तुलसी पर ढारना

प्रार्थना बुदबुदाना

उस

आदमी

का

नाम लिए बग़ैर

नरम बिरही पत्तियां चबाना

काटना प्रेम का कठोर ग्रहण

पीना विषैली हो चली स्मृतियों का जल

बेधड़क मर जाना

इतनी बार और

इतनी तरह से मरना

उस

आदमी

का

नाम लिए बग़ैर

कि ग्रहण टलने के पहले अमर हो जाना

(3)

आख़िरी चिट्ठी

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सुग्गे के पंख-सा दुपट्टा

जिसके एक छोर में बधी रहती स्मृतियों की इलायची हमेशा

दूजी गाठ में सत्तर बरस लड़ने का वादा

पेड़ पर टिके खड़ी पहाड़ी गाव की एक साझ

जिसकी परछाईं मैदानों तक खिंच जाती

रंग-बेरंगे मौसम के धागे से मैं काढ़ती

रूमाल पर नाम तुम्हारा

सिकन्दर !

नदी के तरौंस पर बैठे किसी मासूम झगड़े के बाद

तुम्हारी तर्जनी के पोर से झर आती

मेरे माथे पर नर्मदा रंग की बिन्दी

और

दुःख की छोटी पगडंडी में एक जोड़ी परछाईं की आवाजाही

बस ! इतना ही तो चाहा था

पीठ के तालाब में तड़प कर मर गई

तुम्हारे होंठ की मछली

शीशी में भर कर सिरा आऊं मैं नदी के तरल में

तुम्हारी अधबुझी सिगरेट जैसा मेरा अधसुलगा मन

मगर अफ़सोस !

कि मेरे शहर की नदी किसी भी नेशनल हाइवे पर उफना जाए

वो तुम तक नहीं पहुंच सकती

कोई जो देखना चाहे समंदर का घना सूनापन

जाए

झाके तुम्हारी आंखें

तुम्हें भेजने थे

दुपट्टा

सांझ

बिन्दी

तुमने मेरी चिट्ठी का जवाब तक न भेजा

कोई अफ़सोस होगा तुम्हें

जब अचानक बिन जताए एक दिन कैलेंडर में मेरी सांसों का इतवार आ जाएगा ?

एक दिन

शहरों के बीचोंबीच रास्ते बना कर आएगी नदी

तुम्हें देने मेरी यह आख़िरी चिट्ठी

तुम नदी को मुट्ठी भर जौ-तिल देना

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