आप बीती : उस सड़क की दहशत दिल में धड़कती है, कौन था वह? जो यूं सामने आया और फिर..!

बी एस पाबला

First published: February 24, 2016, 4:38 PM IST | Updated: March 15, 2016, 3:56 PM IST
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आप बीती :  उस सड़क की दहशत दिल में धड़कती है, कौन था वह? जो यूं सामने आया और फिर..!
उस दिन जब मैंने बजाज स्कूटर के नशा उतार देने वाली बात बताई तो कई पुराने मित्रों ने उन सब...

उस दिन जब मैंने बजाज स्कूटर के नशा उतार देने वाली बात बताई तो कई पुराने मित्रों ने उन सब किस्सों को लिखने के लिए उकसाया जिन्हें आज भी ठहाकों के साथ याद किया जाता है।  वाकई में अब याद आता है कि हम अविवाहित मित्रों की अलग-अलग टोली कितना हुडदंग करती थी और मौत के मुंह में जाने लायक ना जाने कितने ही ऐसे काम किये जिसकी खबर हमारे घरवालों को आज तक नहीं है।

वह उमर ही ऐसी होती है, जब तमाम बंदिशें तोड़ देने को मना करता है, भले ही उनसे आगे चल नुकसान हो।  भयंकर किस्म की बातें फिर कभी। आज एक ऐसी मासूम सी बात बताता हूं, जिसे सुन कर एकाएक कोई यकीन ही नहीं करता। यकीन कर भी ले तो दसियों सवाल उछल जाते हैं मेरे ध्यान और ख्यालों पर।

बात है सन 1987 की।  तब हमारे नियोक्ता भिलाई इस्पात संयत्र की ओर से अपने कार्मिकों को वाहन खरीदने के लिए ऋण की सुविधा दी जाती थी। मैंने भी तब खरीदी काइनेटिक हौंडा।  उस समय वह तकनीक और स्टाइल का एक नायाब नमूना थी।  मेरे साथ ही नौकरी में आने वाले मित्र विकास किरवई ने भी इच्छा जाहिर की इसे खरीदने की।

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ऑफिस से निकल ऋण के लिए आवश्यक कागजी कार्रवाई के लिए हम सिविक सेंटर पहुंचे सुपर बाज़ार।  काम ख़त्म होने पर मैं उसे ले आया घर और फिर चाय नाश्ते के बाद मैं चल पड़ा उसे पॉवर हाउस बस स्टैंड तक छोड़ने के लिए।

अंधेरा छा चुका था।  फ़ॉरेस्ट एवेन्यू पर उतई तिराहे से धीरे-धीरे काइनेटिक होंडा चलाते मैं पीछे बैठे विकास से बातें भी करता रहा।  कई मौके पर पीछे की ओर चेहरा भी कर लेता।  मैं पहुंच चुका था उस जगह जहां मैत्री बाग़ से आती सड़क जुडती है।

किसी बात पर ठहाका लगाते मैंने गर्दन पीछे मोड़ एक गाली दी और वापस सामने चेहरा करते ही हैरान रह गया यह देख कर कि बीच सड़क पर एक पेड़ खड़ा है।  पलक झपकते ही महसूस हुआ कि हवा से उस पेड़ के पत्ते भी झूम रहे थे। मैंने अविश्वास भरी आवाज़ में पीछे बैठे विकास को पुकारा। निगाह उधर जाते ही वह भी चिल्लाया -अबे ये पेड़ कहां से आ गया सड़क पर! ब्रेक मार ब्रेक मार। … और ब्रेक मार जब तक गाड़ी खड़ी हो, हमारी आँखें अंधेरे का अभ्यस्त हो चुकीं। तब सामने आया असल मामला।

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हुआ यह था कि जो सड़क, मुख्य सड़क से आ कर जुड़ रही वहां से एक बड़े हाथी की पीठ पर किसी कटे पेड़ की डालियां इक्कट्ठा कर महावत घर जा रहा। चमकीले हरे पत्ते तो समझ आ गए, लेकिन शाम का सुरमई रंग और हाथी का रंग एक हो जाने से मतिभ्रम हुआ कि पेड़ है सड़क पर।

वो तो हम ही जानते हैं कि रोकी गई काइनेटिक हौंडा को जमीन पर टिके दो पैरों के सहारे संभाले हुए जब चंद क़दमों की दूरी से वह हाथी गुजरता दिख रहा तो हमारे दिल कैसे धाड़-धाड़ बज रहे थे।

आज भी मित्र विकास का कहना है कि अगर समय पर ब्रेक ना लगाई होती तो यह पक्का था कि चलती गाड़ी पर सवार हम उस हाथी के नीचे पैरों के बीच से या तो निकल जाते या कुचले जाते।

है ना मजेदार?

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