आप बीती : नौकरी करते हुए क्‍या आपके साथ भी ऐसा हुआ है, जो मेरे साथ हुआ..!

बी एस पाबला

First published: February 24, 2016, 3:13 PM IST | Updated: June 17, 2016, 8:20 PM IST
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आप बीती : नौकरी करते हुए क्‍या आपके साथ भी ऐसा हुआ है, जो मेरे साथ हुआ..!
मुझे बचपन से शौक रहा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स से उलझने का। तकनीकी दक्षता भी उसी में हासिल की। अब मेरी आजीविका...

मुझे बचपन से शौक रहा इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स से उलझने का। तकनीकी दक्षता भी उसी में हासिल की। अब मेरी आजीविका मुख्य तौर पर दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स के रखरखाव से जुड़ी है। अब तो दिन रात सैकड़ों किलोमीटर लंबी तारों का संजाल, महीन पुर्जों से अटे पड़े सर्किट बोर्ड, जुगनू सी दमकती  कतारबद्ध इंडिकेटर लाइट्स, घूरती आंखों सरीखे दसियों सीसीटीवी कैमरे गोया किसी मायावी दुनिया का आभास देते हैं।

वो तो गनीमत है कि बड़े-बड़े वॉल्वस की दुनिया से सफ़र शुरू कर तकनीक से कदम मिलाते कंप्यूटर तक आ पहुंचा वरना वहीं स्क्रू-ड्राईवर, कटर लिए खड़े रहते।

सैकड़ों तकनीकी मुश्किलों को सुलझाते, कुछ नया बनाते अब चार दशक होने को आए। इस बीच ऐसे भी कई अवसर मिले जब बनी बनाई लीक से हट कर विज्ञान, इलेक्ट्रोनिकी के नियमों के खिलाफ सोच कर, कल्पना की उड़ान भर किसी तकनीकी दोष की जड़ तक गए और उससे निजात पाई गई।

मतलब, यह कि हमला वहां किया गया, जहां दुश्मन के छिपे होने की संभावना किसी हालत में नहीं हो सकती, लेकिन वही निशाना सटीक बैठा इसकी प्रेरणा में मुझे वह कहानी हमेशा याद रहती है, जो बचपन में कभी अपने घर के पास वाली सार्वजनिक लाईब्रेरी में पढ़ी थी।

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हुआ यह कि एक राजा अपने लुक और स्टाइल को ले कर बहुत चौकन्ना रहता। राजमहल भी उसने अपनी पसंद से बनवाया हुआ था। चारों तरफ रंगीनियां बिखरीं रहती। हमेशा नये-नये कपड़े पहनना उसका जूनून था। कोई भी नया डिजाइन दिखता तो वह उसे चाहिए ही चाहिए।  तरह-तरह की शेरवानियां, बंद गले के कोट  उसकी कमजोरी माने जाते थे।

एक बार पड़ोसी देश का राजा आया तो उपहारस्वरूप कई पोशाकें दे गया। स्टाइलिश राजा की तो बांछें खिल गईं। गिफ्ट में मिले उन कपड़ों में सज-धज कर सभागृह में इठलाते बैठना, मंत्रियों को उस बारे में बताना उसका नित का काम हो गया। लेकिन एक दिन नृत्य की महफ़िल में राजा को अचानक चक्कर आ गया,  सांसें भारी होने लगीं, आंखों से धुंधला सा दिखने लगा, पसीने से भीग गया शरीर। दरबार में हडकंप मच गया। वैद्य आये, कुछ दवाई दी, आराम करने को कहा।

दूसरे दिन बाग़ में घूमते हुए फिर अचानक चक्कर, धुंधलापन, सांसें भारी, पसीने की धार। वैद्य ने दवाई तो दी, लेकिन ये काम रोज का हो गया। आसपास के राज्यों से भी तमाम वैद्य आए, लेकिन नतीजा कुछ  ना निकला। राजा ने मुनादी करवा दी कि जो उसकी बीमारी ठीक कर देगा उसे पांच गांव ईनाम में दे दिए जाएंगे। हर कोई दौड़ पड़ा। कोई किसी पेड़ के पत्ते ले आया, कोई कहीं की भस्म को अचूक बताए, कोई किसी टोटके की बात करे तो कोई भूत प्रेत का साया बताए।

दिन गुजरते गए, राजा की बीमारी ठीक ना हुई। चिंता में घुलते राजा ने सोच लिया कि कुछ नहीं हो सकता, अब अंत निकट है। क्यों ना अपने बचे शौक पूरे कर लिए जाएं. नये कपड़े सिलवा कर पहन कर ही मरूं। उसने अपने दर्जी को बुलावा भेजा। दर्जी अपने सहायक के साथ आया। राजा को दिलासा भी दी और दुआएं भीं। राजा ने भी ठंडी सांस छोड़ते अपने दिल की बात कही कि मेरे लिए नये कपडे सिल दो, नाप एक बार और ले लो।

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दर्जी ने अपना इंची टेप पकड़ा और लगा नाप लेने। जैसे-जैसे वह बोलते जाए वैसे-वैसे सहायक नोट करते जाए। शेरवानी की लंबाई 44 इंच… बांह 31 इंच… कंधे 22 इंच… बंद गले वाला कालर 20 इंच…!

राजा ने टोका ‘नहीं बांह 32 इंच कर दो और कॉलर 19½ इंच होना चाहिए’। दर्जी बांह के लिए तो मान गया, लेकिन कॉलर 20 इंच ही रखने को कहा सहायक से। राजा ने फिर टोका ‘नहीं! कालर 19½ इंच ही रखो’. दर्जी ने बड़ी विनम्रता से कहा कि महाराज! कॉलर 20 इंच ही रहने दीजिये। राजा ने भड़क कर पूछा कि  19½ इंच रखने से क्या आफत आ जाएगी?

दर्जी ने आख़िरी बार कोशिश करते हुए बताया कि महाराज अगर बंद गले का कॉलर 19½ इंच रखेंगे तो गला सा घुटने से आपको अचानक चक्कर आ जाएगा, सांसें भारी हो जाएंगी, आंखों से धुंधला सा दिखने लगेगा,  शरीर पसीने से भीग जाएगा, ऐसा लगेगा कि प्राण निकलने ही वाले हैं।

यही वह कहानी है जिसको ध्यान में रखते हुए लीक से हटते काम कर परिणाम देते हुए कई बार मैंने अपने वरिष्ठों से पीठ थपवाई है, अपनी नौकरी के मुश्किल मौकों पर।

आपके साथ भी ऐसा कुछ हुआ तो होगा ना?

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