नई वाली हिंदी का फैलता आकाश और बनारस टॉकीज का कलमकार, सत्य व्यास

दीपक दुआ

First published: December 8, 2016, 6:33 PM IST | Updated: December 9, 2016, 3:03 PM IST
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नई वाली हिंदी का फैलता आकाश और बनारस टॉकीज का कलमकार, सत्य व्यास
साहित्‍य कभी बाजार का हिस्‍सा नहीं रहा, लेकिन बाजार साहित्‍य में प्रवेश करने के लिए दशकों से छटपटाता रहा और...

साहित्‍य कभी बाजार का हिस्‍सा नहीं रहा, लेकिन बाजार साहित्‍य में प्रवेश करने के लिए दशकों से छटपटाता रहा और अपने प्रयासों के बूते हाल ही के दशकों में वह ये घुसपैठ करने में कामयाब रहा है। इस कामयाबी के बाद बाजार और साहित्‍य दो छोरों पर तो मौजूद रहे, लेकिन ये छोर जल्‍द ही उन दो खेमों में बंट गए, जिसमें एक लेखक अपने समय को अपनी बदलती संस्‍कृति, भाषा और परिवेश के साथ दर्ज कर समाज के बीच पहुंचने के लिए बाजार का सहारा लेता रहा, तो वहीं दूसरे छोर पर मौजूद साहित्‍य की एक रचनात्‍मक धारा ने अपने पारंपरिक ढांचे को ना तो तोड़ा और ना ही उसे बाजार के प्रभाव में आने दिया। इस छोर पर स्‍थित लेखक अपने लेखन की प्रतिबद्धता और तटस्‍थता के साथ आज भी मौजूद है। लेकिन साहित्‍य के इन दो छोरों के बीच में लेखन की एक धारा ऐसी भी रही, जिसने खुदको नए जमाने का पैरोकार माना और अपनी भाषा को नई हिंदी का नाम देते हुए अपनी रचनात्‍मक शक्‍ति, ऊर्जा और अस्‍तित्‍व की वहां तलाश की। उसने इसी नई हिंदी के तहत मनुष्‍य और उसके बदलते परिवेश के नए संघर्ष अपनी रचनाओं में जगह दी और पाठकों के सामने रखा। आज जबकि इस नई हिंदी के लेखन का एक पाठक वर्ग है, और इसका विस्‍तार हो रहा है ऐसे में हिंदी साहित्य के फैलते इस नए आकाश के चहेते लेखक हैं सत्य व्यास। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, यानी बीएचयू से लॉ की पढ़ाई करने और वहां के भगवानदास होस्टल में रहने के अपने अनुभवों को एक कहानी की शक्ल देकर वे 2015 में बनारस टॉकीजजैसा बेस्ट-सेलर उपन्यास लिख चुके हैं। उनका नया उपन्यास दिल्ली दरबारहाल ही में आया है। पिछले दिनों सत्य व्यास दिल्ली में थे। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं।

सवालः ‘बनारस टॉकीज़’ की कहानी में कितना सच और कितनी कल्पना है?

जवाबः काफी सारा सच है और थोड़ी कल्पना भी। जैसे अगर रैगिंग वाले एपिसोड की बात करें, तो वह पूरे का पूरा काल्पनिक है क्योंकि बीएचयू में रैगिंग की परंपरा है ही नहीं। लेकिन यह मुझे इसलिए दिखानी पड़ी क्योंकि जो तीन प्रमुख पात्र हैं, उनकी दोस्ती यहीं से प्रगाढ़ होती है। इसके अलावा बाकी सब कहीं न कहीं सच है। एक और बात है कि मेरी हमेशा से ही यह सोच रही है कि किसी कहानी में मुख्य पात्र कम होने चाहिए ताकि पाठक बीस किरदारों को पढ़ कर उलझ न जाए। तो वहां मेरे आसपास के जो बीस किरदार थे और उनकी जो खूबियां थीं वे मैंने इन तीनों में डाल दीं।

सवालः ‘बनारस टॉकीज’ की कहानी किसी मनोरंजक हिन्दी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी लगती है। क्या किसी फिल्मकार ने आपसे इसे लेकर संपर्क किया?

जवाबः कई फिल्मकारों ने मुझसे इस बारे में बात की थी। कोई टीवी सीरियल बनाने की बात करता है तो किसी ने वेब-सीरिज की बात की। एक-दो लोगों ने छोटे बजट की फिल्म बनाने का ऑफर दिया लेकिन मैं इस इंतजार में हूं कि किसी बड़े बैनर या बड़े निर्देशक की नजर में यह कहानी आ जाए।

सवालः अपने अगले उपन्यास ‘दिल्ली दरबार’ के बारे में बताएं?

जवाबः पहली बात तो यह कि यह दिल्ली की कहानी नहीं है बल्कि यह दिल्ली में एक कहानी है। अपनी ही लिखी दो लाइनें कहता हूं-‘था लोगों से सुना यह है शहर बड़ा दिल्ली, खानाबदोश थे हम आना ही पड़ा दिल्ली।’ यह एक ऐसा शहर है जो बाहर के लोगों को लगातार बुलाता, आकर्षित करता रहा है और पूरे प्यार और एहतराम से रखता आया है। इस शहर ने कभी किसी को दुर्भाव से नहीं देखा। सात बार उजड़ी है दिल्ली लेकिन इसने कभी किसी से यह नहीं कहा कि जाओ यहां से। पहले मैंने इसका नाम भी ‘सराय दिल्ली’ रखा था। यह कहानी बाहर से आए उन लड़कों की है जो अच्छी पढ़ाई और अच्छे रोजगार के लालच में दिल्ली आते हैं और बाहर से आए लड़कों की एक अपनी अलग ही मस्ती होती है। उनकी मस्ती, उनका प्यार, पढ़ाई जैसी बातें हैं इसमें, और जैसा कि ‘बनारस टॉकीज़’ में भी था, मैंने इस कहानी को एक थ्रिल से भी जोड़ा है। कहानी 2011 में खत्म होती है जब भारत ने क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता था। उस वर्ल्ड कप से एक थ्रिल को जोड़ा गया है जो अंत में जाकर खुलता है।

सवालः ‘बनारस टॉकीज़’ में आपने बनारस शहर को भी एक किरदार के तौर पर पेश किया है। क्या ‘दिल्ली दरबार’ में भी ऐसा होगा?

जवाबः जी बिल्कुल। यह कहानी दिल्ली के परिप्रेक्ष्य में ही है। दिल्ली इसके नायक को एक जगह खड़े होकर देख रही है। वह उसे बढ़ते हुए देखती है और एक जगह आकर वह उसे छोड़ देती है कि मैं यहीं हूं, अब तुम जाओ। पर जिस तरह से ‘बनारस टॉकीज़’ पूरे बनारस की कहानी नहीं कहता उसी तरह से ‘दिल्ली दरबार’ पूरी दिल्ली की कहानी नहीं है।

सवालः एक लेखक को आप कब सफल मानते हैं?

जवाबः  मेरे उपन्यास का कोई भी पेज पढ़ते समय अगर किसी पाठक को यह लगे कि यह तो बोर कर रहा है, तो मैं असफल हूं। अगर किसी को यह लगे कि यह तीन पेज छोड़ कर आगे चला जाए तो मैं असफल हूं। बतौर लेखक मेरी सफलता ही तब है जब मैं पढ़ने वाले को एकदम शुरू से ही बांध लूं और लगातार उसे बांधे रखूं। ‘बनारस टॉकीज़’ में ऐसा ही था और मैं यकीन दिलाता हूं कि ‘दिल्ली दरबार’ में भी आपको ऐसा ही मिलेगा।

सवालः अपने यहां या तो गंभीर साहित्य आता रहा या फिर लुगदी कहा जाने वाला लोकप्रिय साहित्य। लेकिन इधर इन दोनों के बीच में एक मध्यमार्गी साहित्य आने लगा है, जो आप और आपके कई समकालीन लेखक लिख रहे हैं, और चेतन भगत इस धारा के अगुआ हैं। इस धारा के उभरने की आप क्या वजह मानते हैं?

जवाबः देखिए, पहली बात तो यह कि मैं इस किस्म के वर्गीकरण को नहीं मानता। मैं एक ही समय में ‘गुनाहों का देवता’ को गंभीर भी मानता हूं और लोकप्रिय भी। मैं एक ही समय में ‘आपका बंटी’ को गंभीर भी मानता हूं और लोकप्रिय भी। लेकिन इनमें कहीं न कहीं भाषा ऐसी कलिष्ट हो जाया करती थी कि पाठक का पठन वहीं थम जाता था। जब चेतन भगत आए तो उन्होंने अपने लेखन को इतना सहज और सरल कर दिया कि हम जैसे कई लोगों को लगने लगा कि हम भी लिख सकते हैं। इससे पहले जितनी भी कहानियां आ रही थीं, वे अस्सी के दशक की थीं जबकि इधर समय बदला है, पाठक बदले हैं, उनका रहन-सहन बदला है, लेकिन लेखक नहीं बदला। उसके लेखन में न ई-मेल आया न मोबाइल, न फेसबुक। लेखक यह समझे ही नहीं कि समाज बदल रहा है तो हमें भी अपने लेखन को बदलना है। चेतन भगत ने यह काम बखूबी किया और यही वजह है कि युवा पीढ़ी के पाठकों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया।

सवालः अब आगे क्या लिखने जा रहे हैं?

जवाबः शुरुआत हो चुकी है। मेरी अगली कहानी है ‘चौरासी’ जिसके 80-90 पेज मैं लिख चुका हूं। 84 के दंगों के वक्त हम बोकारो में थे और मैं काफी छोटा था। नानावटी आयोग के मुताबिक दंगों में सबसे ज्यादा कत्लेआम दिल्ली में हुआ और उसके बाद बोकारो में। लेकिन मेरी कहानी कुछ अलग है। यह मारने की कहानी नहीं है, यह बचाने की कहानी है। उस खून-खराबे के दौर में भी जो कहीं प्यार बचा था, कहीं मानवता बची थी, यह उसकी बात करती है। जो हो रहा है वह भी दिखाती है लेकिन साथ ही यह एक ऐसे लड़के की कहानी कहती है जो एक सिख परिवार को बचाने में लगा हुआ है। मुझे उम्मीद है कि साल भर में मैं इसे तैयार कर लूंगा।

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