मनुष्यता के लिए बलिदान की गाथा है मुहर्रम, गांधी ने इमाम हुसैन के त्याग को माना था इस्लाम का मूल..!

ध्रुव गुप्त

First published: October 12, 2016, 1:02 PM IST | Updated: October 12, 2016, 1:17 PM IST
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मनुष्यता के लिए बलिदान की गाथा है मुहर्रम,  गांधी ने इमाम हुसैन के त्याग को माना था इस्लाम का मूल..!
ज़हां में सबसे ज्यादा अश्क जिसके नाम पे बहा ज़माने ला, गम-ए-हुसैन का कोई ज़वाब ला ! आज मुहर्रम के...

ज़हां में सबसे ज्यादा अश्क जिसके नाम पे बहा

ज़माने ला, गम-ए-हुसैन का कोई ज़वाब ला !

आज मुहर्रम के पवित्र महीने की दसवीं तारीख़, यौमे आशुरा सत्य, न्याय और मानवीयता के लिए संघर्षरत हज़रत मोहम्मद के नवासे हुसैन इब्न अली की कर्बला के युद्ध में उनके बहत्तर स्वजनों और दोस्तों के साथ हुई शहादत को याद करने का एक अवसर है।

इमाम हुसैन विश्व इतिहास की ऐसी कुछ ऐसे महानतम विभूतियों में हैं, जिन्होंने अपनी सीमित सैन्य क्षमता के बावज़ूद आततायी यजीद की विशाल सेना के आगे आत्मसमर्पण करने के बजाय लड़ते हुए अपनी और अपने समूचे कुनबे की क़ुर्बानी देना स्वीकार किया। कर्बला में यजीद की अथाह सैन्य शक्ति के विरुद्ध हुसैन और उनके थोड़े-से स्वजनों के प्रतीकात्मक प्रतिरोध और अंततः यजीद की सेना द्वारा उन सबको भूखा-प्यासा रखकर बर्बर हत्या के किस्से पढ़-सुनकर आज भी हम सबकी आंखें नम हो जाती हैं।

दरअसल, मनुष्यता के हित में अपना सब कुछ लुटाकर भी कर्बला में इमाम हुसैन ने सत्य के पक्ष में अदम्य साहस की जो रौशनी फैलाई, वह सदियों से न्याय और उच्च जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ रहे लोगों की राह रौशन करती आ रही है। भविष्य में भी करती रहेगी !

कहा जाता है कि 'क़त्ले हुसैन असल में मरगे यज़ीद हैं / इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद।' इमाम हुसैन का वह बलिदान दुनिया भर के मुसलमानों के लिए ही नहीं, संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। हुसैन हम सबके हैं। यही वज़ह है कि यजीद के साथ जंग में लाहौर के एक ब्राह्मण रहब दत्त के सात बेटों ने भी शहादत दी थी, जिनके वंशज ख़ुद को गर्व से हुसैनी ब्राह्मण कहते हैं।

मरहूम अभिनेता सुनील दत्त इन्हीं हुसैनी ब्राह्मणों के वंशज थे। इस्लाम के प्रसार के बारे में पूछे गए एक सवाल के ज़वाब में एक बार महात्मा गांधी ने कहा था- 'मेरा विश्वास है कि इस्लाम का विस्तार उसके अनुयायियों की तलवार के ज़ोर पर नहीं, इमाम हुसैन के सर्वोच्च बलिदान की वज़ह से हुआ।'

लोग सही कहते हैं कि इमाम हुसैन आज भी ज़िन्दा हैं, मगर यजीद भी अभी कहां मरा है ? यजीद अब एक व्यक्ति का नहीं, एक अन्यायी और बर्बर मानसिकता का नाम है। दुनिया में जहां कहीं भी आतंक, ज़ुल्म, अन्याय, बर्बरता, अपराध और हिंसा है, यजीद वहां-वहां मौज़ूद है। यही वज़ह है कि हुसैन हर दौर में प्रासंगिक हैं। मुहर्रम उनके मातम में अपना ही खून बहाने का नहीं, उनके सर्वोच्च बलिदान से प्रेरणा लेते हुए मनुष्यता, समानता, अमन, न्याय और अधिकार के लिए उठ खड़े होने का संकल्प लेने काअवसर है।

(फोटो : Getty Images)

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