ये था ऐसा बौद्धिक क्रांतिकारी, कि गांधी हुए नतमस्‍तक, नेहरू ने माना विचारों का लोहा, मोदी हैं आज भी दीवाने

अनुज द्विवेदी

First published: August 1, 2016, 3:57 PM IST | Updated: August 1, 2016, 4:03 PM IST
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ये था ऐसा बौद्धिक क्रांतिकारी, कि गांधी हुए नतमस्‍तक, नेहरू ने माना विचारों का लोहा, मोदी हैं आज भी दीवाने
जिन वीर सपूतों ने हमारे देश को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। आज मौजूदा...

जिन वीर सपूतों ने हमारे देश को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। आज मौजूदा समय में हम उन्ही अमर शहीदों के उद्देश्यों,सिद्धांतों और उनके देखे गए सपनों का प्रतिदिन गला घोंट रहे हैं। भारत में पत्रकारिता ने अपने उद्भव के साथ ही राष्ट्र के पुनर्जागरण में अपनी भूमिका का निर्वहन करना प्रारंभ कर दी थी। विभिन्न क्रांतिकारियों ने भी पत्रकारिता के माध्यम से स्वदेशी, स्वराज्य एवं स्वाधीनता के विचारों को जनसामान्य तक पहुंचाने का कार्य किया। ऐसे लोगों में  'लोकमान्य' बाल गंगा तिलक का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। आज इसी महान पुरुष की पुण्यतिथि है।

तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को ब्रिटिश भारत में वर्तमान महाराष्ट्र स्थित रत्नागिरी जिले के एक गांव चिखली में हुआ था। ये आधुनिक कॉलेज शिक्षा पाने वाली पहली भारतीय पीढ़ी में थे। इन्होंने कुछ समय तक स्कूल और कॉलेजों में गणित पढ़ाया। अंग्रेजी शिक्षा के ये घोर आलोचक थे और मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है।

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लोकमान्य तिलक के स्वदेशी प्रेम और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की नीति से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित थे, उन्होंने आगे चलकर तिलक के इस नीति का अपने सत्याग्रह में अनुसरण किया। महात्मा गांधी ने लोकमान्य तिलक के सम्बन्ध में कहा है कि, - "तिलक-गीता का पूर्वाद्ध है 'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है', और उसका उत्तरार्द्ध है 'स्वदेशी हमारा जन्मसिद्ध कर्तव्य है'। स्वदेशी को लोकमान्य बहिष्कार से भी ऊंचा स्थान देते थे।" तिलक की पत्रकारिता राष्ट्रीयता से ओतप्रोत थी। राष्ट्रहित के सिवा उनकी पत्रकारिता का कोई उद्देश्य नहीं था। पर स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज पत्रकारिता का हेतु, उद्देश्य और स्वरुप भी बदल सा गया है।

आज की पत्रकारिता तथ्य और सत्य से अधिक जनता को भ्रम में डालकर उन्हें बरगलाने का काम करती है। पत्रकारिता आज देशहित से अधिक लाभार्जन और अपना रौब झाड़ने का साधन बन गया है, यह आज किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में तिलक की 'लोकमान्य' पत्रकारिता से वर्तमान पत्रकारों और समाचार पत्रों के मालिकों को प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

स्वराज, स्वाधीनता, बहिष्कार, स्वदेशी' ये शब्द तिलक जी के राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत मुखर पत्रकारिता की देन है। लोकमान्य तिलक की पत्रकारिता ने ही स्वतंत्रता आन्दोलन को व्यापक बनाया।

दरअसल, तिलक ने विष्णु शास्त्री चिपलूणकर के साथ मिलकर सन 1881 में मराठी भाषा में 'केसरी' और अंग्रेजी में 'मराठा' नामक साप्ताहिक अख़बार की शुरुआत की। बाद में सन् 1891 में उन्होंने केसरी और मराठा दोनों पत्रों का पूरा भार स्वयं पर ले लिया और स्वतंत्र रूप से उसका प्रकाशित करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपनी प्रतिभा, लगन और अदम्य साहस के बल पर पत्रकारिता के महान आदर्श बन गए। उनकी प्रखर लेखनी ने केसरी और मराठा को पत्रकारिता जगत में बड़ी पहचान दी।

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दोनों की अख़बार स्वतंत्रता आन्दोलन का 'अग्निमंत्र' बन गया। 'केसरी' के सम्बन्ध में उन्होंने पत्रकारिता के अपने उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा था- "केसरी निर्भयता एवं निष्पक्षता से सभी प्रश्नों की चर्चा करेगा। ब्रिटिश शासन की चापलूसी करने की जो प्रवृत्ति आज दिखाई देती है, वह राष्ट्रहित में नहीं है। 'केसरी' के लेख इसके नाम को सार्थक करनेवाले होंगे।"

सन् 1905 में जब ब्रिटिश शासन ने बंगाल प्रान्त का विभाजन की योजना बनाई तब तत्कालीन कांग्रेस में हडकंप मच गया। कांग्रेस को अनुनय-विनय की नीति अपनाई, पर लोकमान्य तिलक ने पत्रकारिता के माध्यम से इसे व्यापक राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।

1920 में वन्देमातरम् में उन्होंने अपने एक लेख में पत्र का उद्देश्‍य लिखा- "मेरा मजहब हक परस्ती (सत्य की उपासना) है, मेरी मित्रता कौम परस्ती (राष्ट्र की पूजा) है, मेरी इबादत (पूजा)- खलक परस्ती (विश्व की उपासना) है, मेरी अदालत- मेरा अन्त:करण है। मेरी जायदाद- मेरी कलम है। मेरा मंदिर- मेरा दिल है।मेरी उमंगें सदा युवा रहना है। "

भारतीय पत्रकारिता का मुख्य कार्य जन भावना में राष्ट्रहित सर्वोपरि की भावना जगाना होना चाहिए। साथ ही जन-जीवन से जुड़े विभिन्न पक्षों को सत्यता तथा निष्पक्षता से रखना अनिवार्य आवश्यकता है और आज मौजूदा समय में ऐसी ही पत्रकारिता की आवश्यकता है ।

लोकमान्य तिलक क्रंतिधर्मी पत्रकार थे। जिन्होंने पत्रकारिता और स्वाधीनता तथा स्वदेशी के आंदोलन को एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित किया था। लोकमान्य तिलक पत्रकारिता जगत के लिए प्रेरणापुंज हैं, जिन्होंने पत्रकारिता को अपने उद्देश्यों की प्राप्ति एवं जनसेवा के एक प्रमुख उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया।

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आज ही के दिन 1 अगस्त, 1920 को लोकमान्य तिलक का अचानक देहांत हो गया था। आज ही के दिन भारत माता का एक और अमर सपूत हमें छोड़ चला गया था, लेकिन लोकमान्य तिलक आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने पत्रकारिता जगत में राष्ट्रीय मूल्यों को स्थापित करने के लिए जिस साहस,संघर्ष और बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया था,उनकी जरूरत आज भी महसूस होती है।

आज की मौजूदा पत्रकारिता को देखकर महसूस होता है कि तिलक की 'लोकमान्य' पत्रकारिता से कोसों दूर है, आज की भारतीय पत्रकारिता। अगर हमें आज भी पत्रकारिता को उतना ही प्रासंगिक और जीवन्त बनाए रखना है, तो हमे लोकमान्य तिलक के उन्हीं सिद्धांतों और आदर्शों को शामिल करना होगा। भारत माता के इस अमर सपूत और ओजस्वी पत्रकार पर समूचे देश को गर्व है। भारतीय पत्रकारिता लोकमान्य तिलक की 'ओजस्वी पत्रकारिता' का हमेशा ऋणि रहेगा।

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