स्‍मृति शेष : हंस के दफ्तर की खाली कुर्सी और राजेंद्र यादव होने का मतलब..!

किरण तिवारी

First published: August 27, 2016, 1:43 PM IST | Updated: August 27, 2016, 1:51 PM IST
facebook Twitter google skype whatsapp
स्‍मृति शेष :  हंस के दफ्तर की खाली कुर्सी और राजेंद्र यादव होने का मतलब..!
राजेन्द्र यादव जी से गिन-चुनकर चार बार मिली हूं। एक बार उनके दफ्तर में, जबकि दो बार उनके घर में...

राजेन्द्र यादव जी से गिन-चुनकर चार बार मिली हूं। एक बार उनके दफ्तर में, जबकि दो बार उनके घर में और एक बार किसी कार्यक्रम में।  दो बार की मुलाकातों में उन्होंने मुझे मराठी, बंगाली बनाया तीसरी बार में मैंने उन्हें पहले ही बोल दिया कि मैं उत्तर प्रदेश से हूं, जहां के आप भी रहने वाले हैं। ये तीन मुलाकातें अभिषेक भइया के साथ हुई थीं, तब उन्होंने हंसते हुए कहा था कि अभिषेक तुम्हारी बहन तो बहुत सीधी है, जबकि तुम बहुत नीच आदमी हो। अभिषेक भइया को उन्होंने बड़े प्यार से ये बात कही थी, क्योंकि वो उन्हें सच में प्यार करते थें।

दरअसल, मैंने सुना था कि यादव जी उन्ही लोगों को बुरा-भला कहते थे, जिससे वे बेहद प्यार करते थे। मेरा उनसे कभी-कभी आत्मीय रिश्ता नहीं था, और न ही मैंने उन्हें बहुत पढ़ा, लेकिन जितना पढ़ा, वो रोचक लगा, लेकिन पढ़ते हुए भी उनसे कोई ख़ास रिश्ता नहीं बन पाया, जबकि मन्नू जी को पढ़ते हुए और उनसे बिना मिले हुए भी उनसे ख़ास सम्बन्ध सा जुड़ता गया। वो अपने आस-पास की विचारों से समृद्ध एक मां जैसी लगीं, लेकिन यादव जी कभी भी इतने नजदीक महसूस नहीं हुए पर उनका एक ख़ास व्यक्तित्व हमेशा जेहन में रहा, जो समय-समय पर उनके कुछ बेहद जरूरी उपस्थिति को दर्शाता रहा।

सच कहूं तो, एक सम्पादक के तौर पर उन्होंने विचारों को लोगों को सामने रखा जिसे लोग अपनाते भी थे, तो कुछ बदले में गालियां भी देते थे, पर ये उनका विशाल ह्रदय ही था, जो दोनों तरह के लोगों को सुनता था, सबको कहने को मौका देता था और सबसे अच्छी उनकी सरलता थी कि कोई भी कभी भी उनसे मिल सकता था। इसमें उनका सम्पादक वाला अहम् कभी आड़े नहीं आया। मुझे लगता है कि वो अहंकारी तो नही ही थे, तभी तो कोई भी कुछ भी खुलकर उनके सामने कह पाता था।

पिछले साल कुछ माह हंस से जुड़ी रही, उस दौरान दफ्तर में बड़ी सी खाली कुर्सी देखकर एक खालीपन का अहसास जरूर होता, और उससे ज्यादा खाली हो चुके थे वहां के लोग जो दिनभर की बातों में न जाने कितनी बार उनका जिक्र करते और वो बातें भी इस तरह से होती थी कि लगता उनके बाउजी यहीं कही होंगे, वहां रहते हुए मैं भी इस अहसास से अछूती नही थी।

बहरहाल, हिंदी साहित्‍य के गलियारे राजेंद्र यादव का ना होना एक खालीपन भर देता है। उनकी अनुपस्‍थिति उनका विरोध करने वालों को भी उतनी ही खलती है, जितनी की उनके चाहने वालों को। बेबाक, लेकिन विनम्र, विचारधारा के प्रति तटस्‍थता के साथ सभी के प्रति एक उदारता उन्‍हें हिंदी साहित्‍य के उन गिने-चुने लेखकों और संपादकों में शामिल करती है, जो हमेशा याद किए जाएंगे। राजेंद जी आपसे असहमति के बाद भी आपकी स्‍मृति हमेशा बनी रहेगी, हर जन्‍मदिन पर..!

facebook Twitter google skype whatsapp