गालिब : आदमी भी अलग था और जिंदगी का अंदाज-ए-बयां भी..!

नवोदित सक्‍तावत

First published: December 27, 2016, 2:45 PM IST | Updated: December 27, 2016, 2:56 PM IST
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गालिब :   आदमी भी अलग था और जिंदगी का अंदाज-ए-बयां भी..!
मिर्जा गालिब आज यदि होते तो अपनी जिंदगी के 220 साल पूरे कर चुके होते। असल में उनका पूरा नाम...

मिर्जा गालिब आज यदि होते तो अपनी जिंदगी के 220 साल पूरे कर चुके होते। असल में उनका पूरा नाम मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” था। उनकी शायरी सस्‍ती लोकप्रियता लिए नहीं थी, बल्कि उसमें गहन साहित्‍य और क्लिष्‍ट भाषायी उच्‍चता भी समाहित थी। बात-बात पर गा़लिब का नाम लेकर सतही शायरी करने वालों को यह जानकर हैरत होना चाहिए कि उन्‍होंने अपनी शायरी का बड़ा हिस्‍सा असद के नाम से लिखा है। गा़लिब हिंदुस्‍तान में उर्दू अदबी दुनिया के सबसे रोचक किरदार थे। उनका इस दुनिया में आना और जाना दोनों ही कई रोचक कहानियां के चलते इतिहास में दर्ज हो गया।

कम ही लोग जानते हैं कि गालिब का जन्‍म 27 दिसंबर 1796 को हुआ था और जब उनका निधन हुआ उसी साल महात्‍मा गांधी का जन्‍म हुआ था। साल था 1869 और वे लंबी उम्र जीये। पूरे 73 साल। आगरा में जन्‍मे गा़लिब मूल रूप से एक सैन्‍य परिवार की पैदाइश थे। उनकी जड़ें तुर्क से थीं। उनके दादा तुर्क से भारत आए थे। उनके दो पुत्र व तीन पुत्रियां थी। मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग खान व मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग खान उनके दो पुत्र थे।

गालिब फ़ारसी कविता को भारतीय भाषा में लोकप्रिय करने में माहिर थे। हालांकि मीर तकी मीर भी इसी विधा में पारंगत थे लेकिन गा़लिब ने इसका स्‍तर और बढ़ाया। वे ऐसे शायर हैं जो आज भी हिंदुस्‍तान और पाकिस्‍तान दोनों देशों में समान रूप से लोकप्रिय और आदृत हैं। उन्‍हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब मिला। गालिब 11 साल की उम्र में ही उर्दू एवं फ़ारसी में गद्य तथा पद्य लिखना शुरू कर चुके थे। उन्होंने फारसी और उर्दू दोनो में रोमांटिक शैली में लिखा और यह गजल के रूप में जाना जाता है।

गा़लिब को पत्र लिखने का बहुत शौक था। यूं कहें कि पत्र लेखन की कला के पुरोधा उन्‍हें कहा जा सकता है। उन्‍होंने बात बात पर पत्र लिखे और इतने दिलकश अंदाज में लिखे कि हर पत्र अपने आप में एक मास्‍टरपीस बन गया। उनके लिखे हुए कुछ अप्रकाशित पत्र आज उर्दू साहित्‍य की अहम विरासत माने जाते हैं।

गालिब असद और ग़ालिब दोनों ही नामों से कलम चलाई। उन्‍होंने इन दोनों नामों से अपना काव्‍य रचा, लेकिन बहुत कम लोग उन्‍हें असद के तौर पर जानते हैं। यदि जानते भी हैं तो वे उन्‍हें असद के तौर पर स्‍वीकार नहीं कर पाते। कारण बताया जाता है कि ग़ालिब शब्‍द में जो तंज है, वह असद में नहीं। खैर, यह तो पसंद नापंसद की बात है, लेकिन तथ्‍य ये है कि उनके चाहने वाले उन्‍हें हर रूप में याद करते हैं।

गालिब के लिए जिंदगी आसान नहीं रही। जिंदगी ने उन्‍हें हमेशा मुफलिसी दी। उनकी माली हालत हमेशा अच्‍छी नहीं रही। बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार में वे दरबारी कवि रहे, यानी बादशाह को खुश करके शायरी करना और जीवन यापन करना ही उनका मूल काम था। दिल्‍ली, कलकत्‍ता और आगरा की गलियों में उन्‍होंने खाक छानी। संघर्ष की जड़ें बचपन से ही पड़ गई थीं, जब पिता और चाचा का साया बचपन में ही सिर से उठ गया था, तब वे केवल पांच साल के थे, बाद में चाचा की मौत के बाद मिलने वाली पेंशन ही उनके गुज़ारे का आसरा थी। हालांकि जिंदगी में गालिब एक अच्‍छे गृहस्‍थ साबित हुए। नवाब इलाही बख्‍श की बेटी से 13 की उम्र में निकाह करने वाले ग़ालिब एक जिम्‍मेदार और अच्‍छे शौहर थे।

अहम बात यह है कि उन्‍होंने अपनी जिंदगी में खूब मान सम्‍मान कमाया। मुगल शासक बहादुर शाह ज़फ़र ने उन्‍हें दो बड़ी उपाधियों से नवाज़ा। उन्‍हें अपने दरबार का खास अंग बनाया। इतना ही नहीं, बादशाह ने गा़लिब को अपने बड़े बेटे के लिए शिक्षक भी नियुक्‍त किया। अच्‍छा ज्ञान होने के कारण गा़लिब मुगल दरबार के इतिहासकार भी रहे।

गा़लिब का यह शेर बेहद मशहूर है और इसकी उनकी आत्‍मकथात्‍मक अभिव्‍यक्ति कहा जाता है। इसके पीछे कारण है। गा़लिब ने बचपन से संघर्ष देखा और ता उम्र संघर्ष से उबर नहीं पाए। लेकिन संघर्ष की भट्टी में तपकर ही वे निखरे और उनमें बेहतर हास्‍यबोध का विकास हुआ। पेंशन के लिए वे अक्‍सर शहर दर-शहर-भटकते रहते और इन किस्‍सों का जिक्र वे चुटीले अंदाज में अपने शेर के माध्‍यम से करते। वे खुद ही कहते थे कि यूं तो कई शायर हुए हैं लेकिन उनका खुद अंदाज कुछ और ही है।

...और चलते-चलते एक किस्‍सा हो जाए

ये किस्‍सा गदर के दिनों का है। तब सभी अंग्रेज मुस्लिमों को शक की नज़र से देखते थे। दिल्‍ली शहर मुस्लिमों से खाली हो रहा था। उन दिनों गा़लिब ने जगह नहीं छोड़ी। कुछ फिरंगी उन्‍हें कर्नल के सामने ले गए। उनकी पोशाक देखकर कर्नल ने पूछा कि क्‍या तुम मुसलमान हो..! हाजिरजवाब ग़ालिब ने कहा कि आधा। उन्‍होंने पूछा कि आधा यानी क्‍या। जवाब मिला कि शराब तो पीता हूं, लेकिन सुअर को नहीं खाता। यह सुनकर कर्नल अपनी हंसी ना रोक सके और गा़लिब को छोड़ दिया।

(फोटो : Getty Images)

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