अगर दिल्‍ली, नोएडा और मुंबई में फ्लैट खरीदने का प्‍लान है, तो जान लें ये सच, हकीकत होश उड़ा देगी आपके..!

डॉ. नीलम महेंद्र

First published: April 27, 2016, 8:52 AM IST | Updated: April 27, 2016, 8:56 AM IST
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अगर दिल्‍ली, नोएडा और मुंबई में फ्लैट खरीदने का प्‍लान है, तो जान लें ये सच, हकीकत होश उड़ा देगी आपके..!
सिर पर छत क्या होती है यह वही शख्स समझ सकता है, जिसके सिर पर उसकी खुद की छत नहीं...

सिर पर छत क्या होती है यह वही शख्स समझ सकता है, जिसके सिर पर उसकी खुद की छत नहीं हो। आज जो देश में रीयल एस्टेट के हालात हैं, उन्होंने आम आदमी की इस बुनियादी आवश्यकता को एक एैसे महंगे स्वप्न में तब्दील कर दिया है, जिसे देखने के लिए भी हिम्मत जुटानी पड़ती है।

अव्वल तो शहर में जमीन है ही नहीं -सब भू-माफिया बड़े बड़े उद्योगपतियों अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठानों के कब्जे में है और इस तलाश में जब शहर से दूर एक अदद जमीन का टुकड़ा मिलता भी है, तो उसकी कीमत आम आदमी को यह एहसास दिलाने के लिए काफी होती है, एक घर के सपने की कीमत तुम क्या जानो दिले नादां !

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फिर भी हिम्मत करके जब कोई इंसान इस टुकड़े पर अपने छोटे से घर का ख्वाब पूरा कर लेता है, तो उसे ऐसा अनुभव होता है जैसे उसने अपने जीवन के सबसे बड़े युद्ध में विजय प्राप्त कर ली हो। छोटे शहरों में इस युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले कुछ खुशनसीब होते भी हैं, किन्तु महानगरों में तो यह एक अन्तहीन दुखदायी दिवास्वपन बनकर रह जाता है। वहां जमीन के  टुकड़े पर सपनो का एक घर नहीं हजारों घरों के सपने बेचे जाते हैं, जी हां आप सही समझ रहे हैं -फ्लैट! एक के ऊपर एक, एक के सामने अनेक, अगल-बगल में सटे कई  अरमान।

यकीनन आज के परिवेश में इन्हें सपने कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि ये घरोंदे हवा में ही बनते हैं जिसमें अपनी कमाई का तिनका-तिनका जोड़कर आम आदमी अपने आशियाने की मंजिल तलाशता है वहां उसकी न तो जमीं होती है न आसमां बस रहने की जगह होती है, यही आज के विकास की हकीकत है,महानगरीय सच्चाई है। अब घरों में आंगन, आंगन में खेलते बच्चे, बच्चों से बढ़ते परिवार बीते कल की बातें बनकर रह गए हैं।

आज 2BHK का एक फ्लैट आम आदमी को EMI के ऐसे चक्रव्यूह में उलझा देता है, जिसमें से निकलने में उसका आधा जीवन निकल जाता है। लेकिन असली मुद्दा यह नहीं है, बल्‍कि पीड़ा तो यह है कि हवा में बनने वाले इस फ्लैट की भारी कीमत चुकाने के बाद भी यह  कागजों पर ही सिमटा रह जाता है। बिल्‍डरों द्वारा आम आदमी को जब उनके अपने एक छोटे से घर का ख्वाब बेचा जाता है, तब उसे दिलो-दिमाग़ में यह अंदाजा नहीं होता कि  इसकी कीमत सिर्फ पैसे से नहीं चुकानी है, बल्कि अभी तो बहुत लम्बी मानसिक, आर्थिक,कानूनी लड़ाई भी बाकी है।

सच, नाम कोई भी हो मि० शर्मा या मि० देशपान्डे या मि० भदौरिया या मि० गुप्ता चेहरा कोई भी हो पहचान सिर्फ़ एक -"आम आदमी"। यद्यपि यह व्यथा देश के हर कोने की है, लेकिन दिल्ली एनसीआर की बात करें तो यहां पानी सिर से ऊपर जा चुका है और लोगों के सब्र का बांध टूटता जा रहा है। हर महीने घर के किराये और बच्चों की फीस के साथ-साथ घर के खर्च के अलावा बैंक की ईएमआई देते-देते बिलडर को 90% कीमत चुकाने के बाद तय सीमा निकल जाने के बाद भी अपनी छत आम आदमी के लिए हकीकत से कोसों दूर है और उसे उसका ड्रीम होम बेचने वाले बिल्‍डर खुद गहरी नींद की आगोश में हैं।

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12 मार्च 2015 टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित सौरभ सिन्हा की रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्लैट मिलने की औसत देरी 29 -30 महीने है, अर्थात् कम से कम दो साल, गुड़गांव में तो यह 34 महीने की है और फरीदाबाद में 44 महीने। दरअसल अपना काम फैलाने के चक्कर में बिल्‍डर द्वारा एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे में और दूसरे का तीसरे में लगाने की प्रक्रिया में सभी प्रोजेक्ट अधूरे रह जाते हैं और आम आदमी अपने हक के लिए लड़ता रह जाता है।

इस लड़ाई को आम आदमी अकेले लड़ते-लड़ते जब वह थक गया तो संगठित हुआ -नोएडा एक्श्टेंशन फ्लैट ऑनर्स असोशिएशन , नोएडा फ्लैट बायर वेलफेयर असोसिएशन, सनब्रीज़ अपार्टमेन्ट बायर वेलफेयर एसोसिएशन,शरनम बायर वेलफेयर एसोसिएशन अनेकों संगठन बने कभी राहुल गांधी,अखिलेश यादव सरीखे नेताओं से अपनी व्यथा कही, कभी बिल्‍डर के ऑफिस के बाहर धरना प्रदर्शन, कभी अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो कभी मीडिया की मदद मांगी।

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आखिर बिल्‍डर भी तो समझदार हैं, उन्हें पता है कि नौकरी पेशा आम आदमी रोज रोज दफ्तर से न तो छुट्टी ले सकता है और न ही ऐसे संगठित हो सकता है। अपने-अपने तरीके से  सोई सरकार को नींद से जगाने की असफल कोशिश में हताश इस आम आदमी की पीड़ा को आज सुनने वाले भी बहुत हैं और सुनाने वाले भी बहुत हैं किन्तु आवश्यकता इन्हें समझने वाले की है।

एक छोटे से घर का सपना देखता आम आदमी है, लेकिन इसे सजाता बिल्‍डर है। आम आदमी को लुभाने के लिए अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन, शहर में लुभावने होर्डिंग, कोई सेलिब्रिटी को पेश करता है, तो कोई घर के साथ टीवी, कार अथवा छुट्टियों का पैकेज दिखाकर अपनी ओर आकर्षित करता है।

आम्रपाली बिल्‍डर्स ने तो धोनी को अपना ब्रैंड एम्बैसेडर के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा था कि यहां क्रिकेट एकेडमी खोली जाएगी। 2010 में लॉन्‍च हुए इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य छ एकड़ एरिया में छ हजार फ्लैट बनाकर 2013 तक पूर्ण करने का था। 2016 के अप्रैल महीने तक प्रोजेक्ट की दयनीय स्थिति और आम आदमी के बढ़ते दबाव के मद्देनजर महेंद्र सिंह धोनी ने स्वयं को इससे अलग कर लिया है।

बिलडोंरों द्वारा प्रोजेक्ट की तस्वीरों में आसपास हरे-भरे बगीचे दिखाए जाते हैं, प्राकृतिक नजारों के बीच एक खूबसूरत स्विमिंग पूल सजाया जाता है कुल मिलाकर आपका सपना आप ही के सामने ऐसे प्रस्तुत किया जाता है कि आप को अपनी मंजिल यहीं दिखने लगती है और ऐसा लगता है कि इस मौके को हाथ से निकलना नहीं चाहिए।

हमारे देश में इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि सिर पर छत जीवन की ऐसी बुनियादी जरूरत होती है जिसमें जीवन का सबसे बड़ा निवेश लगता है, बावजूद इसके यह सौदे जल्दबाजी में किए जाते हैं और कई बार तो बिल्‍डरों द्वारा उपलब्ध काग़ज़ातों को पूरी तौर पर पढ़ा भी नहीं जाता, जिसका नतीजा यह होता है कि भुगतान के समय आम आदमी कारपेट एरिया और सुपर बिल्ट अप एरिया जैसे शब्दों के जाल में उलझ के रह जाता है।

दरअसल आज रीयल एस्टेट अनियन्त्रित एवं असंगठित है। इसे नियंत्रित करना बेहद आवश्यक हो गया है ताकि इस उद्योग से हमारी अर्थव्यवस्था और समाज को एक स्थायित्व मिले। हालांकि संसद में बिल्‍डरों पर शिकंजा कसने के लिए रीयल एस्टेट रेगुलेट्री बिल पास किया जा चुका है, लेकिन कानून लागू होने में समय लगेगा। इस बिल के लागू होने से आम आदमी को यकीनन राहत प्रदान होगी।

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इधर, आज बिल्‍डर केवल जमीन के टुकड़े पर प्रोजेक्ट लॉन्‍च करते हैं, उनके पास न कोई नक्शा होता है और न ही अनुमति भ्रामक विज्ञापनों के जरिए फलैटों को बुक करना शुरू कर देते हैं, ज्यों ही इस मायाजाल में आप फंस जाते हैं, आप एक अन्तहीन इन्तजार को अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं लेकिन रीयल एस्टेट रेगुलेट्री बिल के लागू होने से प्रोजेक्ट के लॉन्‍च से पहले ही बिल्‍डर को सरकारी और कानूनी अनुमति लेनी होगी और इस अनुमति को अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करना भी अनिवार्य होगा। अभी बिल्‍डर द्वारा विज्ञापन में प्रकाशित तस्‍वीरें ग्राफिक डिजाइनिंग द्वारा निर्मित होती थीं, लेकिन इस बिल के बाद बिल्‍डर केवल साइट की असली तसवीरों का ही प्रयोग कर पाएंगे।

सबसे अहम बात जो कि उपभोक्ता के लिए बेहद लाभदायक सिद्ध होगी, वह यह कि बिल्‍डर प्रॉपर्टी की कीमत कारपेट एरिया के आधार पर ही वसूल पाएंगे न कि सुपर बिल्ट अप एरिया से। कारपेट एरिया वह एरिया होता है जिसका उपयोग आप स्वयं कर सकते हैं, जबकि सुपर बिल्ट अप एरिया में गार्डन स्विमिंग पूल पार्किंग समेत वह पूरा हिस्सा होता है, जिस पर बिल्‍डिंग बनती है।

कानून लागू होने में तो समय लगेगा, लेकिन जागरूकता तो हमारे हाथ है, जिस दिन आम आदमी अपने अधिकारों के प्रति समय रहते जागरूक हो जाएगा बिलडर उसके सपनों को हकीकत में बदलने को मजबूर हो जाएगा।

(इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं , एवं आईबीएन खबर डॉट कॉम इसमें उल्‍लेखित बातों का न तो समर्थन करता है और न ही इसके पक्ष या विपक्ष में अपनी सहमति जाहिर करता है। इस लेख को लेकर अथवा इससे असहमति के विचारों का भी आईबीएन खबर डॉट कॉम स्‍वागत करता है । इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है। आप लेख पर अपनी प्रतिक्रिया  blogibnkhabar@gmail.com पर भेज सकते हैं। ब्‍लॉग पोस्‍ट के साथ अपना संक्षिप्‍त परिचय और फोटो भी भेजें।)

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