हिंदू परंपराओं के भीतर बुद्ध की छांव, धर्मांतरण का उत्‍सव और काल बाह्य होता इतिहास

संजीव कुमार

First published: September 5, 2016, 4:53 PM IST | Updated: September 5, 2016, 5:03 PM IST
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हिंदू परंपराओं के भीतर बुद्ध की छांव, धर्मांतरण का उत्‍सव और काल बाह्य होता इतिहास
नागपुर स्थित दीक्षाभूमि वह पावन स्थली है, जहां डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर , 1956 को बौद्ध धर्म अपनाया...

नागपुर स्थित दीक्षाभूमि वह पावन स्थली है, जहां डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 14 अक्टूबर , 1956 को बौद्ध धर्म अपनाया और उनसे प्रभावित 10,000 से ज्यादा लोगों को अपने हाथों से धम्म दीक्षा ग्रहण किया। गौरतलब है कि 1956 के धर्मांतरण की घटना के बाद से हर वर्ष विजयादशमी या 14 अक्टूबर के दिन लाखों की संख्या में लोग अलग-अलग राज्यों से दीक्षाभूमि आते हैं, और धर्मांतरण करते है। हालांकि मीडिया द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने के कारण मुख्य धारा की राजनीति द्वारा इसे नज़रअंदाज किया रहा है।

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इन बातों की पुष्टि पिछले 15 वर्षो के महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत से प्रकाशित होने वाली मराठी, हिन्दी और अंग्रेजी समाचार-पत्रों के अवलोकन से हुआ। इस संदर्भ में बहुत से नये आयाम भी उभर कर आए जो विदर्भ के बाहर अन्य राज्यों में उजागर नहीं हुए। इस कारण धर्म, जाति एवं धर्मांतरण के विषय में न तो शोधार्थियों और न ही आम नागरिकों को स्पष्ट जानकारी मिल पाई। इस लेख के माध्यम से दीक्षाभूमि और धर्मांतरण की इस प्रक्रिया और इसके प्रभाव से रु-ब-रु कराने की कोशिश की जा रही है।

12 अक्टूबर, 2014, को पहली दफे पीएचडी शोधार्थी के रूप में जानकारी प्राप्त करने लिए दीक्षाभूमि गया। गोया कि मेरा शोध का विषय भी इससे संबंधित यानी कि 1956 में डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा किए गए धर्मांतरण व इसके विकास के विभिन्न पहलुओं से संबंधित है। दीक्षाभूमि जाने से पहले यहां से जुड़ी कई काल्पनिक तस्वीर मेरे आंखों के सामने धूम रही थी।

मुझे हमेशा लगता था दीक्षाभूमि भी मंदिर जैसा होगा। वहां भी संस्कृत के मंत्रोच्चार, धूप व दीपों की कतारें, ढोल-नगारे, मेला-ठेला, जादूगर की मायावयी दुनिया, सर्कस के खेल सब कुछ होगा। इतना ही चाट-पकौड़े की रेहड़ी व मिठाईयों की दुकान तो मुंह से पानी टपकाने के लिए काफी था, परन्तु वास्तव में आश्चर्यजनक रूप से ऐसा कुछ भी दीक्षाभूमि में नही था।

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दरअसल, परम्परागत रूप से मैं एक हिन्दू धर्म को मानने, पूजा-अर्चना व मंदिरों के रीति-रिवाज को देखता रहा हूं। लेकिन दीक्षाभूमि पहुंचते ही ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानों मैं किसी पुस्तक मेला में आ गया हूं। यहां पकवान एवं मिठाइयां तो नहीं है, बल्कि विभिन्न संस्थाओं के द्वारा पानी व खाने की चीजें बांटी जा रही थीं।

यहां जुटे लोग-बाग महात्मा बुद्ध और अम्बेडकर की मूर्तियों को खरीदनें में तल्लीन थे। हर व्यक्ति के अन्दर उत्साह, आत्मविश्वास व खुशी थी, लोग बिना किसी भय व भेदभाव के आपस में मेलमिलाप कर रहे थे। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों के बीच समानता एवम सद्भावना का भाव था। दीक्षाभूमि से करीब-करीब 3-4 किलोमीटर के दायरे तक आने-जाने वालों का तांता भी लगा हुआ था। एक बड़े शामियाने में लोग बुद्ध की वंदना करते हुए बुद्ध की दीक्षा ग्रहण कर रहे थे। यह कार्यक्रम लगभग 12 से 15 मिनट का होता है, जिसमें लोग धर्म-परिवर्तन के लिए 22 प्रतिज्ञाएं लेते है।

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इस दौरान कुछ ऐसे लोग मिले जो पहले ही दीक्षा ले चुके थे, जिन्होंने इस बार धर्मांतरण प्रमाण-पत्र प्राप्त करने हेतु फिर से दीक्षा ग्रहण की। इस संबंध में मैने उत्सुकतावश पूछा कि आप इस प्रमाण-पत्र का क्या करेंगे?

मध्य प्रदेश के इटारसी से आए अशोक इंगोले का कहना था कि “हम बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के विचारों को मानते हैं, जब बाबा साहेब ने धर्म-परिवर्तन किया तो हम भी उन्हीं को मानते हुए धर्म-परिवर्तन कर रहे हैं, इसके लिए हमें प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है। हम तो पूर्ण रूप से बौद्ध बनने और बाबा साहेब के बताए रास्ते पर चलने के लिए ही धर्म-परिवर्तन कर रहें है।”

महाराष्ट्र के काम्टी से अभिषेक चिमंकर ने बताया कि “हम पूरी तरह से बौद्ध हैं, क्योंकि हमारे पिताजी ने ही धर्म परिवर्तित कर लिया था। हमारे यहां सभी कार्य बौद्ध विधि के अनुसार ही होते हैं। मैं अपने कुछ बौद्ध साथियों के साथ-साथ बौद्ध-विहार को चला रहा हूं। जहां समाज के बच्चों की शिक्षा और कॅरियर काउंसलिंग पर ध्‍यान दिया जाता है। रामनाथ ठाकुर जो बिहार के औरंगाबाद जिले से आए थे उन्होंने बताया कि हम एक ही गांव से 200 लोग आए हैं, हम सभी दीक्षित हैं, और गांव जाने के बाद और भी लोगों को बाबा साहेब के बारें में बताएंगे एवं अगले वर्ष ज्यादा से ज्यादा लोगों को दीक्षा ग्रहण कराने के लिए लाएंगे।

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इसी दौरान संध्या के समय मेरी मुलाकात बच्चों की एक टोली से हुई, जिनकी उम्र महज 12 से 18 वर्ष के बीच थी, जो महाराष्ट्र के परभणी जिले से आए थे। उनमें एक 12वीं कक्षा में विज्ञान विषय में अध्ययनरत छात्र, सूरज गजभिये की बातों से लगा कि वह अम्बेडकर व बौद्ध के विचारों की अच्छी समझ रखते हैं। उन्‍होंने कहा कि, “बाबा साहेब ने तार्किकता व नैतिकता पर जोर दिया, इसलिए मैं अंधविश्वास की जगह तार्किकता के आधार पर निर्णय लेता हूं, और आगे चलकर चिकित्सक बनने के लिए विज्ञान विषय का चुनाव किया है।”

सूरज के अनुसार “बाबा साहेब से हमें शिक्षित, संगठित और संघर्षशील होने की सीख मिलती है, जिससे सबका कल्याण संभव है, इसलिए हम वैज्ञानिक आधार पर सोचते हैं न कि अंधविश्वास व कर्म-काण्ड के आधार पर।” सूरज के साथ-साथ उसके अन्य मित्र भी उसके कथन का समर्थन कर रहे थे।

मेरे इस प्रथम अनुभव से यह बात तो साफ है कि जिन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया उनमें तार्किकता का विकास एवं अंधविश्वास, पाखंड और कर्म-काण्ड का ह्रास हुआ है। मेरा अनुभव यह भी रहा कि जिस परिवार ने एक भी पीढ़ी पहले धर्मांतरण किया उनके अगली पीढ़ी में बाबा साहेब के विचारों का असीम प्रभाव देखने को मिलता है। उनमें शिक्षित, संघर्षशील और संगठित होने की प्रवृति प्रबल पाई जाती है।

यकीनन इनके कथनों से यह तो बिल्कुल साफ था कि जो दिशाभूमि आते हैं धर्मांतरण के बाद उनके जीवन जीने की शैली मे गुणात्मक परिवर्तन आया है, आपस में भाईचारे की भावना में भी बढ़ोतरी हुई है और वो जति व्यवस्था को न सिर्फ नकरते हैं बल्कि उसके खिलाफ जीवन भर संघर्ष भी करते हैं।

(फोटो : Getty Images )

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