अनमोल है नेहरू का ये योगदान, वरना टूट जाता भारत, दक्षिण में बनता ये नया देश..!

श्रवण शुक्‍ला

First published: November 14, 2016, 11:19 AM IST | Updated: November 14, 2016, 11:51 AM IST
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अनमोल है नेहरू का ये योगदान, वरना टूट जाता भारत, दक्षिण में बनता ये नया देश..!
आज 14 नवंबर है। चाचा नेहरू यानी की देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का जन्‍मदिन। 14 नवंबर को...

आज 14 नवंबर है। चाचा नेहरू यानी की देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का जन्‍मदिन। 14 नवंबर को बाल-दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वैसे तो पंडित नेहरू की विद्वता के बारे में और आधुनिक भारत के निर्माता के रूप में देश का हर नागरिक उन्‍हें जानता है। लेकिन बहुत ही कम लोग जानते हैं कि आज देश हमें जिस भौगोलिक एकता और अखंडता के साथ दिखाई देता है, उसकी वजह पंडित जवाहर लाल नेहरू ही हैं।

दरअसल, भारत देश जैसा अब है, वैसा 40 से 70 के दशक में बिल्कुल नहीं था। गागर में सागर वाली भारतीय संस्कृति अगर आज मौजूद है, तो इसकी वजह चाचा नेहरू ही हैं। आज जवाहरलाल नेहरू को लेकिन देश के जनमानस में कई तरह की छविया हैं। इसमें कुछ विवादित हैं, तो कई अलग तरह की कल्‍पनाओं से भरी।

कई लोगों के दिमाग में नेहरू को लेकर कुछ पता है, तो वो है एडविना के साथ की कहानियां, गांधी से नजदीकी, देश के पहले प्रधानमंत्री होने का तमगा, कश्मीर समस्या और चीन से पराजय। पर क्या आपको पता है कि नेहरू की कैबिनेट ने ऐसा कानून पास किया था, जिसने देश को हमेशा के लिए अखंड बना दिया, जिसने देश के तमाम हिस्सों में उठ रही अलगाव वाद की मांग को एक झटके में तबाह कर दिया था। वरना द्रविड़नाडु जिसके बारे में आज कोई जानता तक नहीं, वो भारत के दक्षिण में भारत के कुल क्षेत्रफल का एक तिहाई बराबर हिस्से जितना अलग देश होता।

ये करिश्मा हुआ था 1963 के सोलहवें संविधान संशोधन द्वारा, जिसमें किसी भी राजनीतिक दल के लिए अलगाववाद की मांग को अवैध घोषित कर दिया गया। इस बिल में ही इस बात को शामिल किया गया कि संवैधानिक पद पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति, संगठन के लिए अखंड भारत की संप्रभुता की कसम लेनी होगी। ये वो बिल था, जिसने दक्षिण भारतीय राजनीतिक पार्टियों के लिए द्रविड़नाडु की मांग के रास्ते को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

जी हां, द्रविडनाडु की बात को कम ही लोग जानते हैं। आज भी दक्षिण भारत में अलगाववाद का उत्तर भारतीय तमिलों के लिए अलग देश की मांग तक ही जानते हैं, पर अगर द्रविडनाडु की जड़ में जाएं तो साल 1916 में टीएम नायर और राव बहादुर त्यागराज चेट्टी ने ग़ैर-ब्राह्मण की पहली पार्टी के तौर पर जस्टिस पार्टी बनाई। इस पार्टी ने साल 1921 में स्थानीय चुनावों में जीत हासिल की। सी.एन.मुदलिआर, सर पी. टी. चेट्टी और डॉ.टी. एम. नायर की मेहनत से ये संगठन एक राजनीतिक पार्टी बन गई।

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जस्टिस पार्टी सन् 1920 से लेकर सन् 1937 तक मद्रास प्रेसीडेंसी में सत्ता में रही, पर साल 1944 में ईवी रामास्वामी यानी पेरियार ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम'कर दिया। ये उस समय ग़ैर राजनीतिक पार्टी थी, जिसने पहली बार द्रविड़नाडु (द्रविड़ों का देश) बनाने की मांग रखी थी। यहीं से द्रविडनाडु के लिए जो आंदोलन खड़ा हुआ, उसने भारत देश के अंदर उत्तर भारतीय आर्यों से अलग दक्षिण भारतीय द्रविड़ों के लिए द्रविड़नाडु की मांग रखी।

यकीनन ये द्रविड़नाडु समूचे मद्रास प्रेसीडेंटी को द्रविड़ों के हवाले करने की मांग कर रही थी। साल 1956 में दक्षिण भारत को भाषाई आधार पर 4 राज्यों में बांट दिया गया, पर इससे काफी पहले साल 1938 में जस्टिस पार्टी ने अपने अधिवेशन में द्रविड़ों के लिए अलग राज्य की मांग रखी थी। इस मांगपत्र को जस्टिस पार्टी ने उसी साल अंग्रेज सरकार के मुखिया तक लंदन में पहुंचा दिया था, जिसमें मांग की गई थी कि दक्षिण भारतीयों खासकर तमिलों की उत्तर भारतीयों से अलग पहचान है, इसलिए इसकी देखरेख के लिए लंदन से अलग व्यवस्था हो।

इधर, ईवी रामास्वामी की अगुवाई में जस्टिस पार्टी का सम्मेलन साल 17 दिसंबर 1939 को हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि द्रविड़ों के लिए अलग द्रविड़नाडु की स्थापना हो।

इससे पहले ये नारा था तमिलों के लिए तमिलनाडु का, और साल 1940 में जस्टिस पार्टी ने द्रविड़नाडु की मांग को लेकर रिजोल्यूशन पास किया। द्रविड़नाडु के लिए जून 1940 में एक नक्शा पेरियार ने कांचीपुरम में जारी किया, जिसमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम यानी द्रविड़भाषी परिवारों के लिए अलग देश की मांग थी। ये मांग 40 से 60 के दशक में पूरी तरह से चली, साथ ही जब अंग्रेजी की जगह हिंदी को मातृभाषा के तौर पर अपनाने की अंतिम प्रक्रिया चली, तो द्रविड़ों का आंदोलन उग्र हो गया। हजारों लोगों ने जेल की राह चुनी, तो कईयों ने आंदोलन के दौरान ही जान दे दी।

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यहां नेहरू की समझबूझ कहें कि अंग्रेजी को लेकर उनकी सोच ने हिंदी की राह कठिन भले की, पर इससे देश के टुकड़े होते-होते बच गए। उन्होंने बयान दिया कि अंग्रेजी को हटाना जरूरी नहीं है। न ही हिंदी को लागू करना। हां, हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी द्वितीय भाषा के रूप में रहेगी, पर अंग्रेजी अब स्थापित हो गई। ये 60 के बाद का दशक था और सातवें दशक की शुरुआत। जब दक्षिण भारत अलगाववाद की समस्या से जूझ रहा था, तो पूर्वोत्तर भारत और उत्तरी भारत चीन की धमक से परेशान था।

इधर, भारत चीन से युद्ध में पराजित हो चला था, और यहीं से जवाहर लाल नेहरू के मन में ये युक्ति आई कि अगर हमनें अब कोई संवैधानिक कदम नहीं उठाया, तो देश के टुकड़े हो सकते हैं। उनकी अगुवाई में कैबिनेट ने 5 अक्टूबर 1963 को संविधान का 16वां संशोधन पेश कर दिया, जिसमें देश की अखंडता की कसम हर अलगाववाद की मांग पर भारी पड़ी। इसमें इस शर्त को भी शामिल किया गया कि कोई भी राजनीतिक दल भारत देश में तभी राजनीति कर पाएगा, जब वो भारत की अंखडता को स्वीकार करेगा।

संविधान के इस संशोधन के बाद द्रविड़ कड़गम और मुनेत्र कड़गम जैसी पार्टियों को अपने पार्टी संविधान में संशोधन करना पड़ा और द्रविड़नाडु की मांग को हमेशा के लिए जमीन में दफन कर देना पड़ा। ये जवाहरलाल नेहरू की वो सफलता थी, जिसके लिए अंखड भारत के पुरजोर समर्थक हमेशा उनके ऋणी रहेंगे।

ये बात इसलिए भी याद आई, क्योंकि चाचा नेहरू को लेकर तमाम बातें समाज में कहीं जाती है, लेकिन उनके योगदानों को नकार दिया जाता है। उनकी उपलब्धियों को दरकिनार किया जाता है। काश, ऐसा करने वाले इन बातों पर भी ध्यान देते कि चाचा नेहरू ने किन परिस्थितियों में देश को संवारा। आज ही के दिन यानी की 14 नवंबर साल 1889 को चाचा नेहरू भारत की सेवा के लिए जन्‍म लिया था। जन्‍मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं चाचा नेहरू।

(फोटो : Getty Images)

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