अलविदा, अनुपम मिश्र : जैसा दिखने वाला, वैसा लिखने वाला और ठीक वैसा ही जीने वाला..!

स्‍वतंत्र मिश्र

First published: December 19, 2016, 11:59 AM IST | Updated: December 19, 2016, 12:43 PM IST
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अलविदा,  अनुपम मिश्र : जैसा दिखने वाला, वैसा लिखने वाला और ठीक वैसा ही जीने वाला..!
आज एक और अपना चला गया। पर्यावरण की चिंता करने वाले अनुपम मिश्र नहीं रहे। पिछले कई महीनों से वे...

आज एक और अपना चला गया। पर्यावरण की चिंता करने वाले अनुपम मिश्र नहीं रहे। पिछले कई महीनों से वे कैंसर से जूझ रहे थे, लेकिन मृत्‍यु की छाया में समानांतर चल रहा उनका जीवन पानी और पर्यावरण के लिए समर्पित ही रहा। बिस्‍तर पर भी गांधी-मार्ग संपादित होती रही। उसे छोड़ा नहीं।

अनुपम मिश्र का जाना मेरे अपने निजी जीवन में एक हरे-भरे वृक्ष का अचानक से सूख जाना है। बीते कुछ सालों में पत्रकारिता की तपिश और थका देने वाली जिंदगी को उनकी छाया हमेशा मिलती रही। वे जब भी मिले, ये पूछना कभी नहीं भूले- 'और सब ठीक चल रहा है ना'। मिलने पर उनकी सरलता, सहजता और सौम्‍यता महीनों साथ लेकर घूमता रहा। कभी अचानक घर आ धमकते, तो कभी हाल-चाल पूछते हुए चिट्ठी लिखने का बोल देते थे।

प्रभाष जी ने सही कहा था- वे दुनिया के अनुपम आदमी थे।

मुलाकातों के बीच उनकी अनुपमता एक नहीं, कई जगह दिखाई दी। जब घर पहुंचा तो वे झाडू लगाते हुए मिले। मानों कह रहे हों कि आपको झाडू की तरह होना चाहिए, अपने काम में लगा हुआ। दांपत्‍य जीवन भी अनुपम और अनूठा ही था, वैसा मैंने अपने जीवन में नहीं देखा। उनकी पत्‍नी मंजू जी के साथ उन्‍हें देखना, ऐसा था मानों स्‍त्री और पुरुष के बीच संबंधों का अप्रतिम उदाहरण।

व्‍यवहारिक जीवन के प्रति इस बदलती दुनिया में वे एक ऐसे अनुपम और अनूठे व्‍यक्‍तित्‍व थे, जो विरले ही थे। उनके पास उनके अपने गांधीवादी मूल्‍य  थे और उनका जीवन स्‍वयं शब्‍दों, अर्थों और नैतिक मूल्‍यों की ऐसी किताब था, जो हर व्‍यक्‍ति बार-बार पढ़ना चाहेगा। पिता भवानी प्रसाद मिश्र का पूरा प्रभाव था उन पर। इतना कि पूरे जीवन पर पिता की छांव दिखाई देती रही। पिता का उदाहरण उन्‍होंने कई मुलाकातों में दिया था और अक्‍सर देते रहते थे।

जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।

वे जैसा जीते थे, वैसा ही लिखते थे और दूसरों को भी वही सीख देते थे। पिता का मन उनके जीवन में उतर गया था। इस दौर में वे मन्‍ना, यानी की भवाई भाई के मूल्‍यों की परछाई ही थे। उनका पूरा जीवन जैसा था, वैसा का वैसा उनके लिखे हुए में दिखता था। उन्‍होंने जीवन भर अपने बाल अपने हाथ से काटे। पिता मन्‍ना ने ही बाल काटना सिखाया था। जीवन को कम आवश्‍यकताओं के बीच परिभाषित करने वाले अनुपम जी ने कम के बीच ही जीवन को सदा भरा-पूरा रखा। पहले महज 6 हजार रुपये में जीवन यापन किया और बाद के वर्षों में अधिक से अधिक 12 हजार रुपये। उनका जीवन कम के बीच अपार की कहानी था।

वे लिखने पढ़ने वालों से वे अक्‍सर कहते थे-  सरल रहो, सहज बनो और जैसा जीते हो वैसा लिखो। वे कहते थे- सभी लेखक पीपल या बरगद का पेड़ नहीं हो जाएंगे। जरूरी नहीं कि हर लेखक बड़ा हो जाए। कुछ लेखक पत्‍तियां भी बनेंगे और शाख भी। समाज देखता है। जरूरी नहीं कि जो इस समय बड़ा हो, वह बाद में भी बड़ा हो जाए। मूल्‍यांकन समाज करेगा। चार से पांच पन्‍ने के लेख से लेकर चालीस पन्‍ने के लेख को संपादित कर देने का काम अनुपम मिश्र ही कर सकते थे।

बहुत सी यादें हैं अनुपम जी की। बीते 9 से 10 सालों का साथ। गांधी शांति प्रतिष्‍ठान में जहां वे बैठते थे, एक दौर में वहीं जयप्रकाश नारायण की इमरजेंसी के दौरान गिरफ्तारी हुई थी। वही उनका ठिकाना था। प्रतिष्‍ठान का पर्यावरण विभाग। लेकिन आज भी वह सूना हो गया। जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में दिखने वाली उनकी सरलता इस समय के सर्वाधिक ऊंचे नैतिक मूल्‍य थे।

देखिए ना अनुपम जी..! इस जीवन को अलविदा कहते हुए भी आप जीवन के क्‍या मानक स्‍थापित कर गए। सादगी के साथ आपका हठ फिर जीत गया। मैं आपसे बीते छह से आठ महीने से मिलना चाह रहा और आपने हर बार फोन पर टाला। जानता था कि अपने कठिन समय में दुर्बल दिखाई देना आपको स्‍वीकार नहीं था।

अब मेरे पास शेष क्‍या है। आपकी कुछ यादों का पिटारा, और बचा ही क्या?

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