महाश्‍वेता देवी, स्‍मृति शेष :  थम गई आभासीय लेखन के बीच यथार्थ रचती एक सच्‍ची कलम…!

स्‍वतंत्र मिश्र

First published: July 28, 2016, 5:21 PM IST | Updated: July 28, 2016, 5:34 PM IST
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महाश्‍वेता देवी, स्‍मृति शेष :  थम गई आभासीय लेखन के बीच यथार्थ रचती एक सच्‍ची कलम…!
उनका जाना साहित्‍य के भीतर कागज और जमीन के बीच किए गए हर उस काम का अचानक से थम जाना...

उनका जाना साहित्‍य के भीतर कागज और जमीन के बीच किए गए हर उस काम का अचानक से थम जाना है, जहां एक लेखक होने का अर्थ होता है,  सामाजिक कार्यकर्ता हो जाना। वे थीं इसका अर्थ था कि जब भी आप कलम उठाएं, तो पहले जमीन पर होने वाले बदलाव के प्रति भी उतने ही प्रतिबद्ध रहें।

दरअसल, आपके सामने महाश्‍वेता देवी का होना लेखन करने और लेखक होने की प्रतिबद्धता के प्रति मन में निष्‍ठा को जीना था। लिखने, गुनने और लिखे हुए के लिए जमीन पर उतरकर कार्य करने का साहस महाश्‍वेता देवी हो जाना था। अब चूंकि वे हमारे बीच नहीं हैंं, और हम वर्चुअल स्‍पेस में कलम दौड़ाने वालों के बीच नकली लेखकों की दुनिया में हैं, तो ऐसे में हमारे बीच से महाश्‍वेता देवी का जाना हमारे समय और समाज में बहुत कुछ थम जाने की तरह ही है। 

कभी मिला तो नहीं, लेकिन तकरीबन 8 साल पहले, यानी की उनके 82वें जन्मदिन पर उनका एक बार फ़ोन पर इंटरव्यू किया था, हालांकि इससे पहले दो -तीन बार बातचीत की थी।  

Mahasweta Verma

महाश्वेता देवी का नाम ध्यान में आते ही उनकी कई-कई छवियां आंखों के सामने प्रकट हो जाती हैं। दरअसल उन्होंने मेहनत व ईमानदारी के बलबूते अपने व्यक्तित्व को निखारा। उन्होंने अपने को एक पत्रकार, लेखक, साहित्यकार और आंदोलनधर्मी के रूप में विकसित किया। महाश्वेता देवी का जन्म बांग्लादेश के ढाका में हुआ था। 14 जनवरी को हर साल वे उम्र के एक और पड़ाव से आगे निकल जातीं।

ऐसे ही जब 8 साल पहले उनसे बात हुई थी तो उन्‍होंने कहा था, ''सामान्य दिन की तरह ही जन्मदिन भी गुजर जाता है। पहले मेरे बहुत सारे मित्र जन्मदिन पर मेरे घर आते थे। मैं उनसे वैचारिक मुद्दों पर बहस करती थी। अब मेरे ज्यादातर मित्र या तो इस दुनिया में नहीं रहे या वे शरीर से लाचार हो गए हैं। मुझे अपने बचपन के बारे में कुछ भी याद नहीं है। कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों ने पीछे लौटकर चीजों को देखने और याद करने का मौका नहीं दिया और अब उन दिनों को याद ही नहीं कर पाती हूं।''

आज 28 जुलाई 2016 को उनके जीवन की सांझ भी अंधकार में विलीन हो गई। उनका जन्‍मदिन अब केवल आभासीय हो जाएगा। 

महाश्वेता ने अपने जीवन का लंबा समय आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के संघर्ष में खर्च कर दिया। उन्होंने पश्चिम बंगाल की दो जनजातियों 'लोधास' और 'शबर' विशेष पर बहुत काम किया है। इन संघर्षों के दौरान पीड़ा के स्वर को महाश्वेता ने बहुत करीब से सुना और महसूस किया है।

पीड़ा के ये स्वर उनकी रचनाओं में साफ-साफ सुनाई पड़ते हैं। उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों में 'अग्निगर्भ' 'जंगल के दावेदार' और '1084 की मां' हैं। उन्हें महत्वपूर्ण पुरुस्कार पद्म विभूषण, रैमन मैग्सेसे, भारतीय ज्ञानपीठ सहित कई अन्य पुरस्कार मिले हैं। 

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अपने आखिरी दिनों में भले ही वे बीमार थीं, लेकिन उनके भीतर की लेखिका के भीतर हमेशा आंदोलन के नाम से वही उबाल देखने को मिलता रहा, जो वर्ष 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान दिखाई देता था।

महाश्वेता, पश्चिम बंगाल की माकपा सरकार द्वारा 'विशेष आर्थिक क्षेत्र' के अंतर्गत किसानों की जमीन छीने जाने को लेकर सक्रिय रहीं। राजनीतिक आंदोलनों के साथ उन्होंने साहित्य व सांस्कृतिक आंदोलन में जब-तब शिरकत की।

तसलीमा नसरीन को कोलकाता से हटाये जाने के मामले को लेकर वे पश्चिम बंगाल व केंद्र सरकार के रवैये को लेकर आहत रहीं और हमेशा कहती रहीं कि ''तसलीमा नसरीन को कोलकाता में लाना जरूरी है। उनके साथ पश्चिम बंगाल सहित केंद्र सरकार ने बुरा किया है। कोलकाता में तसलीमा को लेकर लड़ाई बहुत जोर-शोर से करती रहीं।''

बहरहाल, 23 जुलाई को मेजर हार्ट अटैक के बाद वे कोलकाता के एक अस्पताल में ही थीं। उनका जाना साहित्‍य लिखने से पहले जमीन पर बदलाव करने के बारे में सोचने वाले लेखकों की पीढ़ी का खत्‍म हो जाना है। आज बंगाल से उठने वाली वाली पूरे देश के हाशिये के लोगों की यह आवाज हमारे बीच नहीं है।

सच, महाश्‍वेता देवी का नहीं होना, इस आभासीय दुनिया में यथार्थ की कलम का मौन हो जाना है, थम जाना है..!

आपको भावभींनी श्रद्धांजलि..!

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