सतगुरु नानक प्रगटिया, मिटी धुंध जग चानण होया..!

तेजिंदर सिंह

First published: November 14, 2016, 10:37 AM IST | Updated: November 14, 2016, 11:26 AM IST
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सतगुरु नानक प्रगटिया, मिटी धुंध जग चानण होया..!
सतगुरु नानक पातशाह का आगमन अंधकार में प्रकाश के समान है। उनके आगमन को "प्रकाश पर्व" के रूप में मनाया...

सतगुरु नानक पातशाह का आगमन अंधकार में प्रकाश के समान है। उनके आगमन को "प्रकाश पर्व" के रूप में मनाया जाता है। ये बाहरी रौशनी नहीं, बल्कि अंदर के अंधकार को दूर करने के संकल्प का दिन है। ज्ञान, जिज्ञासा से लबरेज एक ईश्वर का बोध है।

सतगुरु नानक प्रगटिया, मिटी धुन्ध जग चानण होया” सिख धर्म के महाकवि भाई गुरदास जी ने गुरु नानक पातशाह के आगमन को अंधकार में ज्ञान के प्रकाश समान बताया, जिसके आंतरिक बिन्दू से एक ईश्वर का संदेश प्रवाहित होता है। गुरु नानक पातशाह ने काव्य रूपी रचनाएं तैयार कीं, जिसमें ईश्वर की सर्वोच्‍चता और सत्यता का बखान किया गया। इसे गुरबाणी कहा जाता है, यानी गुरु के मुख से निकली वाणी और संदेश।

जपुजी साहिब की पहली पंक्ति में बाबा नानक ने एक ओअंकार लिखा, जिसका अर्थ है कि ईश्वर (वाहिगुरु) अलग नहीं, बल्कि वो एक ही हैं। उन्होंने एक ईश्वर को मानने का सिद्धांत देकर बताया कि उसका का नाम सत्य है, वो दुनिया को बनाने वाला है। उसे किसी का भय नहीं, वो किसी का विरोध नहीं। वो जन्म-मरण के बंधन से परे है। उसकी उत्पत्ति खुद से है। वो गुरु द्वारा दिए प्रसाद के समान हैं। खास बात है कि वो युगों से सत्य है, वर्तमान और भविष्य में भी सत्य ही रहेगा।

गुरु नानक साहब ने कहा था कि अकाल पुरख वाहिगुरु की कोई शल्क नहीं। उनकी मूर्ति नहीं बन सकती और न हो वह किसी खास दिशा में रहते हैं। वाहिगुरु सर्व व्यापक हैं। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में रहने वाले दवेन्दर सिंह खालसा कहते हैं कि वास्‍तव में गुरु तो शबद है, गुरु ग्रंथ साहब शबदों का संकलन हैं, इसलिए उन्हें शबद गुरु कहा जाता है, लेकिन आज के दौर में जिस तरह गुरु नानक पातशाह की काल्पनिक तस्वीरों को महत्‍व दिया जा रहा है, वो चिन्ता का विषय है। दवेन्दर सिंह ने कहा कि शबद गुरु की कोई शक्ल नहीं, क्‍योंकि वह निराकार है, तो फिर उसका आकार कैसा? जबकि गुरु तो जन्म और मृत्यु से मुक्त है।

पंद्रहवीं शताब्दी में जब देश जब भेदभाव और विदेशी हमलावरों के आक्रमणों से जूझ रहा था, तब मटियामेट हो चुकी मानवता को जीवन के सही उद्देश्यों का बोध कराने बाबा नानक विश्वभर की चार बड़ी यात्राओं पर निकले। उन्होंने चारों दिशाओं में घूमकर न केवल लोगों की तकलीफें सुनी, बल्कि उसका उपाय भी बताया।

गुरु नानक पातशाह ने साल 1500 में पहली यात्रा शुरू की थी, जिसके तहत वो सुल्तानपुर, मुल्तान, सियालकोट पाकिस्तान, पानीपत, दिल्ली, बनारस, नानकमता नैनीताल, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वर, सोमनाथ, द्वारिका और आसाम तक गए। जहां उन्होंने भेदभाव और आडंबरों से ऊपर उठने का संदेश दिया। फिर दूसरी, तीसरी और चौथी यात्रा के दौरान पातशाह कश्मीर, सुमेर पर्वत, नेपाल, ताशखंड , सिक्किम, तिब्बत, चीन और श्रीलंका गए। इसके अलावा उन्होंने मक्का और अरब देशों में बगदाद तक सफर किया। जहां उन्होंने कहा (अल्लाह पाको पाक है, दूसर नाहीं कोई) यानी एक ईश्वर ही सत्य है। उसके सिवाय दूसरा कोई नहीं, वो सभी में बसता है।

गुरु नानक पातशाह के साथ भाई मरदाना साए की तरह रहे, जो मुसलमान थे। जब पातशाह कीर्तन करते, तब भाई मरदाना जी रबाब (सारंगी का एक रूप) बजाते थे। पातशाह ने कीर्तन के रूप में अकाल पुरख (वाहिगुरु) की स्तुति की।

महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर के ज्ञानी मनदीप सिंह ने बताया कि बाबा नानक जी ने वैज्ञानिक ढंग से लोगों को वहम और आडंबरों से दूर रहने को कहा। उन्होंने कहा सभी दिन एक बराबर हैं। कोई वक्त शुभ अशुभ नहीं होता। गुरु बाबा ने कीर्तन के माध्यम से अपने विचार दुनिया के सामने रखे। मनदीप सिंह ने कहा कि गुरुबाणी पढ़ने उसे समझना ज्यादा जरूरी है। सिख कभी विचार शून्य नहीं हो सकता। उसे तो लगातार सीखना है।

उन्होंने सन 1521 में उन्होंने बाबर का आक्रमण देखा था, तो संवाद के माध्यम से बड़ा हमला रोक लिया। पातशाह ने लोगों का दर्द बांटा। उन्होंने कहा कि "ऐती मार पई कुरलाणै, तैं की दर्द न आया।" गुरु नानक पातशाह ने लंगर की परंपरा चलाई, जिसका मुख्य उद्देश्य था कि संसार में कोई भी भूखा न रहे। यात्रा के दौरान जब पातशाह भाई मरदाना जी के साथ जगन्नाथपुरी पहुंचे, तो वहां उन्होंने लोगों को ब्रम्हांड की आरती से अवगत कराया।

उन्होंने कहा कि "आसमान एक थाली समान है, जिसमें सूर्य और चांद दीपक जैसे दुनिया को रौशनी दे रहे हैं। जहां अनगिनत तारे मोती समान चमकते हैं। पहाड़ों से चंदन की खुशबू भरी पवन पंखा करती है, समस्त वनस्पति वाहिगुरु को फल-फूल समान समर्पित हैं। ऐसी कमाल की आरती उसे पसंद है। जहां शबद (कीर्तन) की धुन के माध्यम से परमशक्ति का बखान हो रहा हैं।

बाबा नानक ने वहां मौजूद सैंकड़ों लोगों की ओर देखा, जो आरती सुनकर उनकी ओर खिंचे चले आ रहे थे। उन्होंने ईश्वर से कहा कि ये सैंकड़ों आंखे तुम्हारी ही हैं, देखो ये हजारों नेत्र तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं। तुम्हारे सैंकड़ो चरण हैं, तुम्हारे बनाए इस खेल ने मुझे मोह लिया है। सभी में तुम हो, सभी ने तुम्हारी जगाई हुई ज्योति जल रही है। सारा अलाम जो गुरु के ज्ञान से प्रकाशमान हो उठा। ईश्वर जो तुम्हें अच्छा लगता है, वही तुम्हारी आरती है। अंत में गुरु साहिब ने कहा कि हे ईश्वर संसार को अपने साथ जोड़ कर रखो।

गुरु नानक पातशाह ने अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाकर “जओ तओ प्रेम खेलण का चाओ, सिर धर तली गली मोरी आओ। अर्थात् “यदि तुम सत्य की राह पर चलना चाहते हो तो, अपनी जान हथेली पर रखकर आओ”। गुरु ने साफ शब्दों में कहा कि जुल्म कभी नहीं करना और न ही उस बर्दाश्त करना।

इसी फलसफे के आधार पर दसवें नानक यानी गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने अमृतपान कराकर संत - सिपाही बनाया और खालसा पंथ की स्थापना की। साथ ही गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु गद्दी देकर कहा कि अब से एकमात्र गुरु ग्रंथ साहिब ही बतौर गुरु सिखों की अगुवाई करेंगे। जिन्हें देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने भी गुरु ग्रंथ साहिब को लिविंग गुरु का दर्ज दिया है।

आप सभी को प्रकाश पर्व की अनंत शुभकानाएं..!

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