मेरी यात्रा वहां से शुरू होती है, जहां कभी शंकाओं और सवालों का ढेर लगा था..!

उमेश पंत

First published: December 10, 2016, 3:47 PM IST | Updated: December 10, 2016, 4:43 PM IST
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मेरी यात्रा वहां से शुरू होती है, जहां कभी शंकाओं और सवालों का ढेर लगा था..!
युवा लेखक और ब्‍लॉगर उमेश पंत एक घुम्‍मकड़ हैं। पहाड़ों की गोद उत्‍तराखंड के पिथोरागढ़ से आते हैं, लिहाजा पहाड़ों...

युवा लेखक और ब्‍लॉगर उमेश पंत एक घुम्‍मकड़ हैं। पहाड़ों की गोद उत्‍तराखंड के पिथोरागढ़ से आते हैं, लिहाजा पहाड़ों से उन्‍हें प्‍यार है और पहाड़ भी उन्‍हें बेइंतहा मोहब्‍बत करते हैं। उनके आपसी प्रेम की किस्‍सागोई  उनकी उस ‘यात्रागोई’ में दिखाई देती है, जो उन्‍होंने अपनी नई किताब इनर लाइन पास में दर्ज की है। इनर लाइन पास ' महज एक किताब भर नहीं है, बल्‍कि दुर्गम  राहों पर उमेश की पदचापों की आवाज से निकले वे शब्‍द हैं,जो यात्राओं के जरिये मनुष्‍य के भीतर कौतुहल और जिज्ञासा के रूप में समाए हैं और लगातार अपने समय के साथ दर्ज हुए हैं। आइए जानते हैं उमेश ने आखिर क्‍योंकि पहाड़ों की  ये  यात्रा और क्‍या कहानी है  उनकी किताब 'इनरलाइन पास' की।

अपनी आदि-कैलास और ओम पर्वत की यात्रा के किस्से लिखने बैठा, तो करीब बैयालीस हज़ार शब्दों का सफ़र तय हो गया। पिछले कई दिनों से मैं लगातार अपनी उस यात्रा को फिर से जीने की कोशिश कर रहा था, जिसमें जीवन और मृत्यु के बीच कितनी महीन रेखा होती है, ये बहुत करीब से महसूस किया। बिना टेंट, बिना आग और बिना खाने के, एक रात ऐसे जंगल में बिताई जहां तापमान शून्य या उससे नीचे जा रहा था और ये यात्रा एक ‘सर्वाइवल’ की कहानी बन गई।

ये यात्रा जहां से शुरू होती है, वहां शंकाओं और सवालों का एक ढेर पड़ा था। ऐसा ढेर जो लगातार आपकी चेतना को सोखता रहता है। खुशी, सेल्फ सेटिस्फेक्शन, कॅरियर, टाइम-मैनेजमेंट, बैंक-बेलेंस, सेविंग्स। तीस की तरफ तेज़ी से बढ़ती उम्र के पड़ाव में एक वक्त आता है, जब ये सारी चीजें ज़िंदगी के सीधे सपाट रास्ते पर कहीं से जैसे मलवे की तरह आ जाती हैं, और आपके सफ़र में अड़चनें पैदा करने लगती  हैं। लगने लगता है कि ज़िंदगी में कुछ तो कमी है। पर क्या? ज़िंदगी का कोई तो लक्ष्‍य है। पर क्या? खुशी? पर ये खुशी मिलती कहां से है?

कई सारे सवाल आप सबकी तरह उन दिनों मेरे ज़हन में भी हलचल कर रहे थे। इन सवालों के जवाब ढूंढने थे मुझे। पर ये जवाब आखिर मिलते कहां हैं? तो एक दिन सब कुछ छोड़ के अपनी सारी चिंताएं कुछ दिनों के लिए अलमारी के लॉकर में डाल दी मैंने और उनसे टाटा, बाय-बाय कहके इन सारे सवालों को अपने बैग में पैक कर लिया। दिल्ली से कहीं दूर उत्तराखंड के पहाड़ों में मुझे इन सवालों के जवाब खोजने एक ज़रिया मिल ही गया आखिर। वही ज़रिया आज ‘इनरलाइन पास’  के रूप में आपके सामने है।

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अठ्ठारह दिनों में की इस 200 से ज़्यादा किलोमीटर की पैदल यात्रा के अनुभवों को एकदम बारीकी से लफ़्ज़ों में ढालने की एक कोशिश भर है ‘इनरलाइन पास’। यकीन मानिये समुद्र तल से 214 मीटर की ऊंचाई (दिल्ली) से समुद्र तल से करीब 5000 मीटर की ऊंचाई तक जा पहुचने में ऐसा बहुत कुछ बदल जाता है, जो आपको ज़िंदगी की खूबसूरती और जोखिमों के तकरीबन चरम पर लेकर चला जाता है।

इस ‘यात्रागोई’ के ज़रिये आप दुनियाभर में सबसे ऊंची बसावटों में रहने वाले समुदायों में से ‘शौका’, ‘रंग’ समुदाय के मूल निवास दारमा घाटी के कुछ हिस्सों और ब्यांस घाटी की यात्रा करेंगे। जीवन की उस पगडंडी की यात्रा जहां न ट्रैफिक का शोर है, न वक्त की मारामारी। नदियों, झरनों, जलधाराओं, पेड़ों, ग्लेशियरों से होते हुए उच्च हिमालय की यात्रा, और उसके समानांतर एक दूसरी यात्रा भी, जो मन के भीतर चलती है। इसे ज़रूरतों को लांघकर, कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलकर, जीवन की दुरुहता से जूझने और अपनी क्षमताओं को आंकने की यात्रा भी कहा जा सकता है, या फिर उसे पाने की यात्रा जिसे आप सबसे ज़्यादा चाहते हैं।

घुमक्कड़ी किसी ऐसे प्रेमी से मन भर मिल आना है, जो आपका कभी नहीं हो सकता। कुछ देर उसे पाकर आपको लौट आना होता है, अपनी तल्ख़ सच्चाइयों की तरफ। पैसा, कॅरियर और दुनियादारी के बंधनों की तरफ, इन सारे बंधनों को कुछ देर के लिए पूरी तरह भूलकर उस अज्ञात प्रेमी के माथे पर रख दिया गया एक मासूम सा चुम्बन है-घुमक्कड़ी।

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