एक हिंदी अनेक हिंदी : ग्रेटर नोएडा में फ्लैट खरीदवाने वाली, बच्‍चों को अमेरिका भेजने वाली और लिफाफे की गर्माहट वाली हिंदी..!

विनीत कुमार

First published: September 14, 2016, 11:46 AM IST | Updated: September 14, 2016, 3:28 PM IST
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एक हिंदी अनेक हिंदी : ग्रेटर नोएडा में फ्लैट खरीदवाने वाली, बच्‍चों को अमेरिका भेजने वाली और लिफाफे की गर्माहट वाली हिंदी..!
Boy playing with alphabet blocks in a library

आज हिंदी दिवस है। एक तरह से हमारे जैसे हिंदी भाषियों के लिए एक औपचारिकता भर। एक समय था बोलने-बरतने के तौर पर हिन्दी मेरी मातृभाषा थी जो कि अब भी है। मां से हमने इसी भाषा में बोलना-बतियाना सीखा। मगही पृष्ठभूमि की मेरी मां कोशिश करती कि हमसे उसी खड़ी हिन्दी में बोले जिसे कि "नाते-रिश्तेदार" अंग्रेजी छांटना कहा करते और आसपास की एक दुनिया शुद्ध हिन्दी।

इधर, पैदा होने के साथ ही मातृभाषा के तौर पर जो भाषा (स्वाभाविक रूप से हिन्दी) मुझे मिली उसमे मेरी कहीं कोई भूमिका नहीं थी, लेकिन एक विषय के तौर पर आगे चलकर हमने जिस भाषा और साहित्य को चुना, वो पूरी तरह मेरी खुद की इच्छा, पसंद और जुनून की भाषा रही है। एक ऐसा विषय जिसके चुनने के बाद कई सालों तक घर-परिवार के लोग सहज नहीं रहे। पापा को लगा ऐसा हमने जान-बूझकर किया है ताकि समाज में उनकी नाक कट जाए और मुझे मजा आए।

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जी हां, गोबरपट्टी से आनेवाले हम जैसे के लिए हिन्दी साहित्य पढ़ना नाक कटाने का ही मामला है। एक से एक भुचकुलवा (डफर) चाहे वो केमेस्ट्री को चेमेस्ट्री ही क्यों न बोलता हो, कुछ नहीं तो सिविल इंजीनियर के सपने तो बड़े इत्मीनान से देख ही लेता है। हमने नहीं देखा। हमें इंजीनियर, डॉक्टर जैसा कुछ बनना ही नहीं था। हमें एक सामान्य बिहारी की तरह यूपीएससी की भी तैयारी नहीं करनी थी। शायद इसलिए हम रिश्तेदारों के बीच अभी-अभी तक एब्नार्मल रहे। मेरी मां को जवाब देते-देते हालत खराब रही कि ये संत जेवियर्स जैसे कॉलेज से लेकर हिन्दी कॉलेज सिरिफ हिन्दी पढ़ने गया है।

यकीनन नौकरी की अनिश्चतिता, कई बार अपमान, उपहास और नजरअंदाज किए जाने के बीच भी लगा नहीं कि आखिर हिन्दी में आए क्यों और न ही कभी ऐसा लगा कि कुछ और करते हैं। मन को कुछ इस तरह समझाता- मां भी तो पचास ऐसी चीजें करती है, बोलती है, हमने उसे छोड़ तो नहीं दिया न।

लेकिन जब दिल्‍ली से सामना हुआ तो जिस हिंदी को जीवन में देखता सुनता हुआ, वह कुछ अलग ही अंदाज में मिली। कभी वह ग्रेटर नोएडा में फ्लैट खरीदवाने वाली हिन्दी बन गई, तो कभी बच्चों को अमेरिका भेजनेवाली हिन्दी बनी तो कभी लिफाफे की गर्माहट वाली हिन्दी बनी, यानी की यह एक हिन्दी अनेक हिन्दी वाला मामला था।

ग्रेटर नोएडा में फ्लैट खरीदवाने वाली हिन्दी कुछ इस तरह थी कि गुरु जी, हिन्दी के विस्तार के नाम पर जब आपको पत्रकारिता, अनुवाद, विज्ञापन, जनसंपर्क और सोशल मीडिया का ही भजन-कीर्तन करना होता है, तो आप जो सालभर क्लासरूम में साहित्य की कक्षाएं लगाते हो, उनमे बच्चों को बंद-बटर और अंडे-भुर्जी बनाने की ट्रेनिंग देते हो?

जिस हिन्दी के दम पर अंकुर विहार से लेकर ग्रेटर नोएडा में फ्लैट खरीदने की हैसियत बनी है, उस हिन्दी के महत्व पर भी तो प्रकाश डालो। बताओ तो सही कि आज के दौर में सूर, तुलसी, बिहारी, कबीर पढ़ना क्यों जरूरी है? पत्रकारिता, अनुवाद और विज्ञापन के जरिए हिन्दी के विस्तार पर बात करने के लिए तो भतेरे मिल जाएंगे। एक बार कोई नोएडा फिल्म सिटी घूम आए चौदह सितंबर को तो कड़क चाय पेश करके बबलुआ ही बतला देगा ।

इधर फिर बच्चों को अमरीका भेजनेवाली हिन्दी के अंदाज ऐसा रहा कि हिन्दी का अघाया मास्टर जब अपने बाल-बच्चों की चर्चा पर उतरता है, तो पूरी बातचीत में अमेरिका, एमबीए,आइआइटी एक बार नहीं, बार-बार आता है, जो नहीं आते हैं वो बाबा नागार्जुन, शमशेर, कबीर, जायसी।

अपने बाल-बच्चों पर बातचीत शुरू करने से पहले ही उसकी पसंद का ढांचा इस कदर आपके सामने रख देंगे कि आपको समझने में सहूलियत हो कि इन बच्चों का बाल्यकाल अर्जेंटीना में बीता है और जीवन में जो पहली शिक्षा हासिल की वो ये कि हमें अपने माता-पिता की तरह हिन्दी नहीं पढ़नी है, पढ़नी भी है तो टाइमपास या टशन भर के लिए । रोजी-रोटी के लिए तो कतई नहीं।

मुझे हिन्दी के ऐसे मास्टरों से बात करते हुए बस एक रहस्य जानने की तड़प बनी रहती है। सर जी, जब आपने बीए प्रथम वर्ष में गोदान को पढ़ना शुरू किया और खत्म करके पीएचडी तक आए, आपको एक बार भी नहीं लगा कि आपकी होरी काया का रायबहादुर में रूपांतरण इसी हिन्दी के बूते हुआ। आप अपने बच्चों को अमेरिका इसी हिन्दी के बूते भेज पाए तो फिर अब बात पीछे अमेरिका-अमेरिका क्यों करने लग जा रहे हैं। आइआइटी और एमबीए के बीच में कभी सेंट बोरिस (जहां आप घर से दरी लेकर स्कूल पढ़ने जाया करते थे) का भी तो नाम ले लिया करो।

कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको उस मौके का ख्याल आ जाता हो कि नौकरी मिली कैसे और गर न मिलती तो अमेरिका क्या, मुनिरका का किराया भारी पड़ जाता?

फिर लिफाफे की गर्माहट वाली हिन्दी तो गजब ही रही, सालभर हिन्दी के नये लोगों, अपने ही छात्रों पर लानत भेजनेवाले हिन्दीजीवी महंत हिन्दी पखवाड़ा के मौके पर जब लिफाफे की गर्माहट के बूते बोलना होता है तो सोहर गाने लग जाते हैं। मजेदार बात ये है कि जो वो सोहर गाते हैं, उनमे उन्हीं नए चेहरे, अपने सकुचाए छात्रों के बोल होते हैं जिन्हें अकसर खीझ भरे शब्दों में नसीहतें देते फिरते हैं- कुछ गंभीर काम किया करो, कालजयी लेखन का अपना महत्व है, तुरंता लेखन से बचो।

कुल मिलाकर हिंदी दिवस पर इतनी ही बात की हिन्दी को अगर मैं अपनी मां मानने लग जाऊं, स्कूली जीवन से लेकर अब तक का प्रेम तो फिर खुद के बने रहने की जरूरत आखिर किससे मांगू? किससे कहूं कि मुझे तुमसे प्यार करते रहने के लिए भी, जिंदा रहने के लिए भी तुम्हें मेरी जरूरतें पूरी करनी पड़ेगी ! अपनी जरूरतों को नजरअंदाज करके तुम्हारे साथ कैसा बने रहना संभव हो सकेगा ? आखिर प्रेम में भी, संबंधों में भी तो बुनियादी जरूरतें होती ही हैं. ऐसे में लिखने के बदले, बोलने के बदले जब मेहनत-मजदूरी की बात करता हूं तो इसका ये बिल्कुल मतलब नहीं होता कि हम तुम्हें बेच रहे हैं. आखिर आत्महंता होकर कोई क्या और किसको प्रेम कर सका है. खैर..!

आप सभी को हिंदी दिवस की पूरे गर्व के साथ शुभकामनाएं..!

(फोटो : Getty Images )

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