इस महान शहीद को खुद घरवालों ने नहीं अपनाया, कहते थे 'पागल', मगर दिलेरी देख दंग थी दुनिया!

विष्णु शर्मा

First published: August 24, 2016, 9:48 AM IST | Updated: August 24, 2016, 9:48 AM IST
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इस महान शहीद को खुद घरवालों ने नहीं अपनाया, कहते थे 'पागल', मगर दिलेरी देख दंग थी दुनिया!
एक क्रांतिकारी का ये आखिरी बयान है-‘मेरे जैसे एक बेटे के पास अपनी मां को देने के लिए क्या है?...

एक क्रांतिकारी का ये आखिरी बयान है-‘मेरे जैसे एक बेटे के पास अपनी मां को देने के लिए क्या है? केवल मेरा अपना खून.. जो मैंने उसकी वेदी पर चढ़ा दिया है। भारत में इस वक्त केवल एक ही पाठ सिखाने की जरूरत है और वो ये कि कैसे अपनी जान कुर्बान की जाए और इसे सिखाने का बस एक ही रास्ता है कि हम खुद अपनी जान देश पर कुर्बान करके दिखाएं। मेरी भगवान से बस एक ही प्रार्थना है कि अगले जन्म में मैं उसी मां की कोख से जन्म लूं, उसी धरती पर जन्म लूं और फिर उसी ध्येय के लिए अपनी जान कुर्बान कर दूं और करता रहूं, जब तक कि वो ध्येय पूरा ना हो’। आपको हैरत होगी ये जानकर कि इस क्रांतिकारी को आज तक उसके परिवार वालों ने अपनाया नहीं है। 1909 में लंदन जाकर अंग्रेजों के घर में उनके एक बड़े अफसर को मौत की नींद सुला देने वाले इस वीर क्रांतिकारी का नाम था मदन लाल धींगरा।

मदन लाल धींगरा से लंदन में जब कोर्ट ने पूछा तो उन्होंने वकील लेने से ये कहकर इनकार कर दिया कि मेरा केस आपको सुनने का अधिकार ही नहीं है। आप तो विदेशी हो हमारे देश पर कब्जा किए बैठे हो, आप हमारे साथ न्याय कैसे कर सकते हो। धींगरा ने अपना केस खुद लड़ा और मान लिया कि अंग्रेजी अफसर विलियम हट कर्जन वाइली, जो कि भारत सचिव का राजनीतिक सलाहकार था और भारत में अरसे से फौजी अफसर के बतौर काम कर चुका था, की हत्या उसने की लेकिन क्यों की, उस स्टेटमेंट की थोड़ी सी लाइनें पढ़िए, ‘अगर जर्मनी इंग्लैंड पर कब्जा कर लेता और कोई अंग्रेज इसके विरोध में किसी जर्मन को मार देता तो क्या वो देशभक्ति नहीं होती?  पिछले पचास साल में मेरे देश के 8 करोड़ लोगों की मौत के अंग्रेज जिम्मेदार हैं और हर साल मेरे देश से एक करोड़ डॉलर निकालकर ले जाने के लिए भी आप ही लोग जिम्मेदार हैं। आपकी हिप्पोक्रेसी देखकर मैं हैरान हूं, कांगो और रूस में कुछ भी गलत होता है तो आप लोग मानवीयता की बातें करते हो और हर साल इंडिया में बीस लाख लोगों की मौत आपकी वजह से होती है और कोई फर्क नहीं’। आखिर में मदन ने कहा, ‘आप मुझे फांसी दे दो, आई डोंट केयर। आप गोरे लोग आज पॉवरफुल हो, लेकिन एक दिन हमारा भी वक्त आएगा, फिर हम वो करेंगे जो हम चाहेंगे’।

शहीद मदन लाल धींगरा की प्रतिमा, उनकी वास्तविक फोटो, जारी हुआ डाक टिकट और पुश्तैनी मकान।

ये अपने आप में पहला मामला था, जिसकी ना केवल एक दिन में यानी 23 जुलाई 1909 को ही सुनवाई पूरी हो गई, जज ने उसी दिन ना केवल फांसी की सजा सुनाई बल्कि किस जेल में और कौन सी तारीख को फांसी होगी, ये भी बता दिया। बाद में अंग्रेजी मीडिया ने इस बात की काफी आलोचना की। टाइम्स ऑफ लंदन ने अगले दिन ‘कनविक्शन ऑफ धींगरा’ के नाम से एक रिपोर्ट लिखी, "The nonchalance displayed by the assassin was of a character which is happily unusual in such trials in this country. He asked no questions. He maintained a defiance of studied indifference. He walked smiling from the Dock."। मदन लाल के आखिरी स्टेटमेंट की चर्चा उन दिनों डेविड लॉयड जॉर्ज और विंस्टन चर्चिल के बीच भी हुई, इस प्राइवेट बातचीत में उन्होंने इस स्टेटमेंट को ‘The Finest ever made in the name of Patriotism’ बताया, ऐसी उन दिनों मीडिया में खबरें थीं।

लेकिन हमारे देश में क्या हुआ? गांधीजी जो उन दिनों तक एक तरह से नेपथ्य में थे, उन्होंने धींगरा के बयान की आलोचना की और 14 अगस्त 1909 के द इंडियन ओपीनियन के अंक में उन्होंने लिखा, ‘Even should the British leave in consequence of such murderous acts, who will rule in their place? Is the Englishman bad because he is an Englishman? Is it that everyone with an Indian skin is good? If that is so, there should be [no] angry protest against oppression by Indian princes. India can gain nothing from the rule of murderers—no matter whether they are black or white. Under such a rule, India will be utterly ruined and laid waste’।

मदन लाल धींगरा के पिता अमृतसर में एक सिविल सर्जन थे और तमाम हाईक्लास सोसायटी और अंग्रेज अधिकारियों के साथ उनका उठना बैठना था। वो पहले ही धींगरा को घर से निकाल चुके थे। इस केस के बाद जिस देशभक्त क्रांतिकारी की दुनिया भर में तारीफें हो रही थीं, उसे उसके ही घरवालों ने मानसिक रूप से अस्वस्थ तक बता दिया। मदन लाल के सभी छह भाई लंदन में पढ़े हुए थे। लेकिन मदन लाहौर के एक कॉलेज में एमए कर रहे थे। 1904 में उनके प्रिंसिपल ने जब ऑर्डर दिया कि स्टूडेंट्स के ब्लेजर के लिए कपड़ा इंग्लैंड से मंगाया जाएगा तो स्टूडेंट्स भड़क गए। उस वक्त देश भर में स्वदेशी आंदोलन की चिंगारी सुलग रही थी। मदन लाल ने अपने कॉलेज में बीड़ा उठाया और आंदोलन छेड़ दिया। धींगरा को कॉलेज से निकाल दिया गया। गुस्से में पिता ने भी घर से निकाल दिया। मदन लाल ने उस दौरान क्लर्क की नौकरी की। कालका से शिमला के बीच तांगा चलाया और बाद में एक फैक्ट्री में मजदूरी भी की। लेकिन जैसे ही मजदूरों की आवाज उठाने के लिए मजदूर यूनियन बनाने की कोशिश की, तो निकाल दिया गया। कुछ समय तक मदन लाल धींगरा ने मुंबई में काम किया, फिर अपने भाई की सलाह मान ली।

मदन लाल के भाई डॉ. बिहारी लाल ने सलाह दी कि लंदन जाकर बाकी की पढ़ाई कर लो, बाद में आकर देश के बारे में सोचना। मदन लाल ने लंदन के यूनीवर्सिटी कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग कोर्स में एडमीशन ले लिया। उसमें ना केवल भाई ने मदद की बल्कि राष्ट्रवादियों ने भी सहयोग दिया। वहीं मदन की मुलाकात इंडिया हाउस के फाउंडर श्याम जी कृष्ण वर्मा और वीर सावरकर से हुई। दोनों ही उनके क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित थे। बाद में श्याम जी तो पहले पेरिस और बाद में स्विट्जरलैंड चले गए, लेकिन वीर सावरकर मदन लाल धींगरा को देशभक्ति का पाठ पढ़ाते रहे और साथ में देते रहे हथियारों की ट्रेनिंग। उनका मानना था कि अंग्रेजों पर हमले होंगे तभी वो खौफ में हमारे देश को छोड़ कर जाएंगे। धींगरा टोटेनहम शूटिंग रेंज में भी प्रेक्टिस करने लगे।

मदन लाल अब किसी बड़े अंग्रेज अधिकारी को लंदन में ही मारकर उनकी नाक के ठीक नीचे दहशत फैलाना चाहता थे। उन्होंने बंग भंग के लिए जिम्मेदार अंग्रेजी वायसराय लॉर्ड कर्जन और बंगाल के पूर्व गवर्नर ब्रेमफील्ड फुलर की हत्या की योजना बनाई, लेकिन जहां दोनों की मीटिंग होनी थी वहां पहुंचने में देर हो गई और इरादा बदलना पड़ा। मदन लाल धींगरा का वाइली से कुछ भी लेना देना नहीं था बल्कि वो तो उनके पिता के परिचितों में से था, फिर भी उन्हें पता था कि इस हत्या से वो अंग्रेजी हुकूमत और देश के नौजवानों दोनों को कुछ मैसेज पहुंचा पाएंगे। मदन लाल ने उसी को निशाना बनाया। लंदन में रहने वाले भारतीयों के इम्पीरियल इंस्टीट्यूट में आयोजित एक कार्यक्रम में धींगरा ने उसे गोली मार दी। धींगरा को वहीं गिरफ्तार कर लिया गया।

मदन लाल के पिता अमृतसर में चीफ मेडिकल ऑफिसर थे। वो इस हत्या से काफी पहले ही बाकायदा अखबारों में विज्ञापन देकर मदन लाल से अपना नाता तोड़ चुके थे। इस कांड के बाद तो उन्होंने मदन को मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर दिया। एक क्रांतिकारी के लिए इससे बुरा क्या हो सकता था कि उसके खुद के परिवार ने उससे मिलने तक को मना कर दिया, यहां तक कि उसकी फांसी के ऐलान के बाद भी। फांसी के बाद अंग्रेजों ने वीर सावरकर की गुजारिश के बावजूद मदन लाल का शरीर उन्हें नहीं सौंपा और ना ही हिंदू रीति से अंतिम संस्कार किया बल्कि चुपचाप कहीं दफना दिया।

श्याम जी कृष्ण वर्मा की अस्थियों की तरह ही मदन लाल धींगरा की अस्थियां भी सालों विदशी जमीन पर कहीं दबी रहीं। ना परिवार को कुछ लेना देना था और ना ही आजादी के बाद की सरकारों को। वो तो 1976 में लंदन के उसी कब्रिस्तान में जनरल डायर को लंदन में ही जाकर मारने वाले दूसरे बड़े क्रांतिकारी ऊधम सिंह की अस्थियों को ढूंढा जा रहा था, तो संयोग से मदन लाल धींगरा की अस्थियों के बारे में भी पता चला और उन्हें लाया गया। घरवालों ने फिर भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। कभी भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी जिससे प्रेरणा लेते थे, उस क्रांतिकारी की अस्थियों को भारत लाया गया और उनके अपने शहर अमृतसर की बजाय महाराष्ट्र के अकोला में रख दिया गया, वो आज भी वही हैं।

आज देश मदन लाल धींगरा की कुर्बानी का महत्व समझा है। हर साल उनको श्रद्धांजलि देने के कार्यक्रम शुरू हुए हैं। अकोला और अजमेर में उनके स्मारक बन गए हैं। लेकिन ऐसे किसी भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम में उनके परिवार के सदस्य यहां तक कि नई पीढ़ी के युवा भी शामिल होने से बचते आए हैं। यहां तक कि बीजेपी के एक नेता लक्ष्मीकांता चावला ने जब मदन लाल धींगरा के पुश्तैनी घर की बुरी हालत देखकर उनके परिवार से उसे खरीद कर म्यूजियम बनाने की इच्छा जताई तो परिवार ने चावला को ये घर ना बेचकर किसी तीसरे आदमी को बेच दिया। एक युवा जो आज से सौ साल पहले अंग्रेजी राज में लंदन में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था, सोचिए कितना शानदार जीवन होता उसका। लेकिन उसने घरवालों की इच्छा के खिलाफ, अपने सारे सपनों को आग लगाकर भारत मां को आजाद करवाने और नौजवानों के दिलों में कुर्बानी का जज्बा जगाने के लिए अपनी जान देश पर कुर्बान कर दी। पागल ही तो था वो......।

 

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