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नक्सलियों के गढ़ की पहली आदिवासी डॉक्‍टर अपने इलाके में ही करेंगी सेवा

ETV MP/Chhattisgarh
Updated: March 16, 2017, 10:42 AM IST
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Updated: March 16, 2017, 10:42 AM IST
छत्‍तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिला दंतेवाड़ा में नक्सलियों की मांद कहे जाने वाले क्षेत्र के गांव माड़ेंदा की  आदिवासी लड़की लक्ष्मी नाग ने डॉक्‍टर बनकर सफलता का वह परचम लहराया है जिसकी आज हर तरफ चर्चा हो रही है.

लक्ष्‍मी के पिता रामसिंग नाग डाकिया हैं और एक छोटी सी दुकान भी चलाते हैं. अत्यंत गरीबी के बावजूद अपनी बिटिया की पढ़ने की ललक देखते हुए उन्‍होंने उसे बीडीएस (बैचलर इन डेन्टल सर्जरी) का कोर्स पूरा कराया. आज वह डॉक्‍टर बनकर अपने गांव के लोगों का मुफ्त इलाज कर रही है.

लक्ष्‍मी बताती हैं कि जब वो मिडिल स्कूल में थीं तब आने-जाने का कोई साधन न होने और स्‍कूल दूर होने के कारण रोजाना आना-जाना नहीं हो पाता था. इसलिए उन्‍होंने वर्ष 2005 से 2007 तक माध्यमिक स्तर तक की पढ़ाई जगरगुंडा के कन्या आश्रम में रहकर पूरी की.

बाद के वर्षो में जनजागरण और सलवाजूडूम को खत्‍म करने के लिए नक्सलियों ने जिस तरह की तबाही मचाई उससे पूरा जगरगूंडा बाहरी क्षेत्र से कट सा गया था. इसलिए उन्‍होंने कुआकोण्डा के स्‍कूल में ही पढ़ना जारी रखा. कुआकोण्डा में पढ़ते समय उसकी मुलाकात पोटाली में पदस्थ डॉक्‍टर अतीक अंसारी से हुई, जिनकी प्रेरणा से उन्‍होंने स्वास्थ्य के क्षेत्र में ही पढ़ाई को अपना लक्ष्य बनाया. उसकी मेहनत और प्रशासनिक मदद से उसका दाखिला मैत्री कॉलेज ऑफ डेंटस्‍ट्री एंड रिसर्च सेंटर में हो गया.

पढ़ाई पूरी कर जब लक्ष्मी लौटीं तो उसका चयन कुआकोण्डा और कटेकल्याण विकास खंड के लिए हुआ लेकिन लक्ष्मी ने अपने ही विकासखंड को चुना. पढ़ाई खत्‍म होने के बाद से ही लक्ष्मी ने अपने गांव में लोगों को नि:शुल्‍क चिकित्सा सेवा देनी शुरू कर दी है.

लक्ष्मी नाग ने कहा कि उसकी तमन्ना इसी क्षेत्र में अपनी सेवाएं देने की है. लक्ष्मी की सफलता की कहानी आज उनकी जैसी हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है. आसपास के ग्रामीण और जनप्रतिनिधि डॉक्टर बनी लक्ष्‍मी को बधाई देने एवं क्षेत्र के युवाओ को प्रेरित करने माड़ेन्दा गांव पहुंच रहे हैं ताकि इस क्षेत्र के बच्‍चे लछमी की तरह पढ़कर नाम रोशन कर सकें.
First published: March 16, 2017
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