इस गांव में आज भी 'राजा की आज्ञा' का पालन करते हैं लोग

आईएएनएस
Updated: March 21, 2017, 10:20 AM IST
इस गांव में आज भी 'राजा की आज्ञा' का पालन करते हैं लोग
इंद्रावती किनारे स्थित छिंदगांव के गोरेश्वर महादेव मंदिर में पुराने शिवलिंग के अलावा भगवान नरसिंह, नटराज और माता कंकालिन की पुरानी मूर्तियां हैं.
आईएएनएस
Updated: March 21, 2017, 10:20 AM IST
छत्तीसगढ़ के जगदलपुर जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर इंद्रावती नदी के किनारे शिवमंदिर परिसर में बिखरी पड़ी 10वीं शताब्दी की मूर्तियों को छिंदगांव के ग्रामीण छूने से डरते हैं. कहा जाता है कि उनके राजा ने 74 साल पहले उन्हें ऐसा करने से मना किया था.

राजाज्ञा की वह तख्ती आज भी इस मंदिर परिसर में टंगी है. बस्तरवासी अपने राजाओं का आदर करते रहे हैं और आज भी उनके आदेशों का सम्मान करते हैं, चूंकि वे बस्तर राजा को ही अपनी आराध्या मां दंतेश्वरी का माटी पुजारी मानते हैं.

1942 में राजा ने दिया था आदेश

देश की आजादी के साथ ही 69 साल पहले रियासत कालीन व्यवस्था समाप्त हो गई है, लेकिन लोहंडीगुड़ा विकासखंड के ग्राम छिंदगांव के ग्रामीण आज भी 1942 में जारी राजाज्ञा का पालन कर रहे हैं. दरअसल, इंद्रावती किनारे स्थित छिंदगांव के गोरेश्वर महादेव मंदिर में पुराने शिवलिंग के अलावा भगवान नरसिंह, नटराज और माता कंकालिन की पुरानी मूर्तियां हैं.

मंदिर के बाहर लिखा है आदेश

मंदिर के केयरटेकर त्रिनाथ कश्यप और छिंदगांव के गजमन राम कश्यप व अगाधू जोशी बताते हैं कि बस्तर के राजा शिव उपासना के लिए वर्षों से छिंदगांव शिवालय आते रहे और परिसर में पड़ी मूर्तियों को संरक्षित करने का प्रयास करते रहे हैं. उन्हीं के आदेश पर सागौन की लकड़ी पर खोदकर लिखा गया आदेश मंदिर में टंगा है, जिसमें अंग्रेजी और हिंदी में लिखा है- "इस मूर्ति को हटाना, बिगाड़ना या तोड़ना मना है"- बाहुक्म बस्तर स्टेट दरबार.

नहीं किया मूर्तियों को दूसरी जगह स्थापित करने का प्रयास

सूचना लिखे इस बोर्ड को वर्ष 1942 में बस्तर स्टेट के तत्कालीन कर्मचारियों ने मंदिर परिसर में लगाया था. तब से यहां के ग्रामीण इन मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ तो दूर, इन्हें दूसरी जगह स्थापित करने का भी कभी प्रयास नहीं किए.

जिला पुरातत्व संग्रहालय के अध्यक्ष ए.एल. पैकरा ने बताया कि यह मंदिर 1982 से छग पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है. शिवालय में पड़ी पुरानी मूर्तियों को संग्रहालय में लाने का प्रयास किया गया, लेकिन ग्रामीणों ने राजाज्ञा के प्रति सम्मान और आस्था के चलते मूर्तियों को संग्रहालय लाने नहीं दिया.
First published: March 21, 2017
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