खून से सनी सड़क पर उम्मीद की बस

खून से सनी सड़क पर उम्मीदों की बस

जगरगुंडा से दोरनापाल के बीच की सड़क जवानों के खून से सनी है. 58 किलोमीटर लंबे रास्ते पर 3 साल में 50 से ज्यादा पुलिस और सीआरपीएफ के जवान जान गंवा चुके हैं.

हर किलोमीटर सड़क के लिए 6 जवानों की शहादत

Suhas MunshiSuhas Munshi | News18.com @suhasmunshi

Published: June 8, 2017

बस्‍तर के गांव में सुबह 7 बजे हैं. जगरगुंडा के स्‍थानीय लोग और जानवर तक बाहर आकर एक बस देखने को खड़े हैं. गांव में यह बस 12 साल बाद लौटी है और इन लोगों के लिए ये बहुत बड़ी चीज है.

पुराने दिनों में जगरगुंडा एक फलता-फूलता कारोबारी शहर था. यहां बड़ी तादाद में व्यापारी रहते थे. स्कूल, क्लीनिक और बिजली भी थे. हालांकि 2005 में कुख्‍यात सलवा जुडूम आंदोलन चला, जिसके बाद जगरगुंडा में सब कुछ खत्म हो गया. नक्‍सलियों और जुडूम की मिलिशिया में हुई खूनी मुठभेड़ में ये इलाका कई बार बर्बाद हुआ. नक्‍सलियों ने जुडूम को मिलने वाली आर्मी सप्‍लाई रोकने के लिए जगरगुंडा को दंतेवाड़ा और सुकमा से जोड़ने वाली सड़कें उड़ा दीं. 2005 में ये इलाका दुनिया से बिलकुल कट चुका था.

बाद के दिनों में जगरगुंडा सलवा जुडूम के रिटायर्ड सदस्‍यों का घर बना. नक्‍सलियों से इलाका बचाने के लिए इसकी चारों ओर से नाकेबंदी कर दी गई. अर्द्धसैनिक बल और पुलिस तैनात कर दिए गए.

नक्‍सल हिंसा के खौफ से पिछले 12 साल में कम ही लोग गांव के बाहर गए. करीब 5000 लोग जीवन निर्वाह के लिए सरकार पर निर्भर रहे, जिन्हें साल में दो बार राशन मिलता है.

नक्‍सलियों ने जुडूम को मिलने वाली आर्मी सप्‍लाई रोकने के लिए जगरगुंडा को दंतेवाड़ा और सुकमा से जोड़ने वाली सड़कें उड़ा दीं. 2005 में ये इलाका दुनिया से बिलकुल कट चुका था.

इस साल 2 मई को जब ये बस सेवा फिर शुरू हुई तब गांव के कुछ लोगों ने पहली बार घर के बाहर कदम रखे. ये बस रोज दोरनापाल और सुकमा से होते हुए जगदलपुर के बीच 200 किलोमीटर का फासला तय कर रही है. राज्य सड़क परिवहन निगम ने बस चलाने की जिम्मेदारी एक निजी ठेकेदार को दी है

जगरगुंडा में अभी काफी सुबह है फिर भी कई लोग बस के आसपास जमा हो चुके हैं. कुछ चाय पी रहे हैं तो कुछ बस के अंदर बैठकर नीम की दातुन कर रहे हैं. ऐसे बच्चे, जिन्होंने पहली बार बस जैसी चीज देखी है, वो बस की खिड़कियों से बाहर झांक रहे हैं. कुछ लड़के-लडकियां बस में चढ़ने से पहले अपने आपको शीशे में देखकर कपड़े झाड़ रहे हैं.

17 साल की शर्मीली लड़की मादवी यहीं रहती है और कपड़े सिलने का काम करती है. वह इस बस से जगदलपुर जा रही हैं, उन्हें उम्मीद है कि उन्हें वहां बेहतर रोजगार मिलेगा. उनके साथ उसकी चाची बैठी हैं.



उन्होंने बताया "मुझे पता है कि मैं अच्छा काम कर सकती हूं, लेकिन मुझे जगरगुंडा के बाहर खुद को साबित करने का मौका नहीं मिला. जगदलपुर में मेरे कुछ रिश्तेदार हैं और कुछ चेन्नई में हैं. मैं कहीं काम ढूंढने की कोशिश करुँगी और उम्मीद है कि मुझे यहां से ज्यादा पैसे मिलेंगे."

इलाके का एक युवक कवासी, जो यहां पुलिस के यहां कुक था, होटल में नौकरी पाने की उम्मीद में जगदलपुर जा रहा है. कुछ यात्री बस में उछलकूद कर रहे हैं. दो किशोर चुपचाप बैठे अपना फोन देख रहे हैं. मादवी की चाची दोनों को घूर रही हैं.

हालांकि बस स्थानीय लोगों के लिए आशा का प्रतीक ही नहीं, चिंता का विषय भी है .

'लेकिन बस केवल स्थानीय लोगों के लिए आशा का प्रतीक नहीं है; यह उनमें बैठे लोगों के लिए भी चिंता का विषय है जो इस बस में बैठकर रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं. हर चेहरे पर अजीब सी चिंता है'

आधा घंटे बाद ही ये बस इलाके की सबसे खतरनाक सड़क से गुजरेगी. दरअसल जगरगुंडा से दोरनापाल के बीच का रास्ता मौत की घाटी से कम नहीं.

जगरगुंडा से दोरनापाल के बीच 58 किलोमीटर लंबे रास्ते पर पिछले 3 साल में 50 से ज्यादा पुलिस, अर्धसैनिक बल और स्थानीय लोग मारे जा चुके हैं.

Road from Jagarguna to Dornapal

इस सड़क से लगे सीआरपीएफ कैंप पर हमेशा नक्सली घात लगाकर हमला करते रहते हैं. हाल ही में बुर्कापाल में हुए हमले में 25 सीआरपीएफ सैनिकों की जान चली गई थी.

नक्सलियों ने इस एरिया में लगभग 18 आईईडी ब्लास्ट किए हैं. बीते दो सालों में 130 से अधिक जिंदा आईईडी बरामद हुई हैं.

सीआरपीएफ का काफिला रोकने और उन पर हमले के लिए नक्सली इस इलाके में अक्सर नुकीले कीलें बिछा देते हैं, जिनका शिकार अक्सर निजी पिकअप ट्रक होते हैं.

बस कंडक्टर जगदीश कहते हैं, "इस इलाके में जोखिम बहुत है. कुछ सेकंड में यहां हालात बदल जाते हैं. अभी लोग हँस रहे है, बातें कर रहे हैं लेकिन अगले ही पल एक आईईडी विस्फोट हो सकता है और सब शांत हो जाएगा"

अभी लोग हँस रहे है, बातें कर रहे हैं लेकिन अगले ही पल एक आईईडी विस्फोट हो सकता है और सब शांत हो जाएगा

दांतेवाड़ा-सुकमा सड़क जो यहां से अधिक दूर नहीं है, वहां 17 मई 2010 को नक्सलियों ने यात्रियों से भरी एक बस को आईइडी ब्लास्ट से उड़ा दिया था. नक्सलियों को शक था कि इसमें पुलिस के जवान हैं. इस हमले में पुलिस के 11 जवानों सहित 24 लोग मारे गए थे.

वैसे हर साल सुरक्षाबलों को निशाना बनाने के लिए नक्सली लैंडमाइंस का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें आम लोगों को भी जान गंवानी पड़ती है. कभी-कभी ऐसे हमलों के लिए नक्सली माफ़ी भी मांगते हैं. ऐसा अक्सर नहीं होता.​

अभी कुछ दिन पहले मैं दक्षिण बस्तर के एक नक्सल नेता से मिला था. अपनी पहचान छिपाने की शर्त पर उसने बताया कि कई बार वे जानबूझकर लोकल लोगों को टारगेट बनाते हैं और कई बार न चाहते हुए भी एक्सीडेंटली ऐसा हो जाता है. तब वे उन लोगों से माफ़ी मांग लेते हैं. कई बार पुलिस के लिए जासूसी कर रहे लोकल लोगों को सबक सिखाने के लिए ऐसा करना पड़ता है. '

"क्या ये सब चीज़ें उन्हें किसी को मारने की अनुमति देती हैं? अगर वो किसी को मार दें और बाद में पता चले कि वो निर्दोष थे तो? ऐसा ही एक केस 2013 में हुआ था, जब उन्होंने एक लोकल पत्रकार नेमीचंद जैन को पुलिस का मुख़बिर बताकर उनकी हत्या कर दी थी. इसी तरह नक्सलवादियों ने पत्रकार साईं रेड्डी की भी हत्या कर दी थी.

जवाब में नक्सल नेता बताते हैं, "हम यह उन लोगों के हित में करते हैं, जिनके हम प्रतिनिधि हैं. हम अपने मिलिशिया सदस्यों को जेल में नहीं डाल सकते क्योंकि आपकी सरकार की तरह हमारे पास जेल नहीं हैं. हालांकि उन्हें सजा के तौर पर हटा दिया जाता है, जो आपकी सरकार की तुलना में बड़ी सजा है. जहां तक ​​साईं रेड्डी मामले का सवाल है, शीर्ष नेतृत्व ने हत्या रद्द करने का आदेश दिया था, पर समय रहते यह बात हमारे साथियों तक नहीं पहुँच पाई.'

नक्सल लीडर ने इस सवाल पर सीधा जवाब नहीं दिया लेकिन उन्होंने विश्वास दिलाया कि अगर ऐसी गलती होती है तो निश्चित रूप से सजा दी जाती है.

आखिरकार, हम 8 बजे बस से चल पड़े. बस अपने समय से आधा घंटा लेट थी. बस चले अभी 10 मिनट भी नहीं हुए थे और हमें सीआरपीएफ कैंप के पास रोक लिया गया. बस कंडक्टर जगदीश नीचे उतरा, और वहां रखे रजिस्टर पर साइन किया. ऑफिसर ने उनसे कुछ सवाल-जवाब किए और वह फिर बस में लौट आया. बस फिर चल पड़ी.

रास्ते में लगभग 10 और सीआरपीएफ कैंपों पर हमें रोका गया. हर जगह लगभग 5 से लेकर 20 मिनट तक वक्त लगा.

बस जिस सड़क से गुजर रही थी, उसमें इतने गड्ढे थे कि वो बहुत धीरे चल रही थी. उसकी रफ्तार ऐसी थी कि हम उससे तेज पैदल चल सकते थे. एक समय में यह सड़क अच्छी हुआ करती थी जो सुकमा को आंध्र प्रदेश से जोड़ती थी.

जैसे ही हम सीआरपीफ कैंप से आगे निकले, ऐसी सड़क आई, जिसकी शायद उम्मीद भी नहीं कर सकते थे. जगदीश ने अपना फोन निकाला और कहा अब आएगा मजा और उसने वीडियो बनाना शुरू कर दिया. पूरे रास्ते उसने यही किया. उसने कहा कि मेरे वीडियो की बहुत डिमांड होगी. जगदीश ये सब कंक्रीट वाली रोड के लिए कह रहा था जिसे कुछ साल पहले नक्सलियों ने उड़ा दिया था.

रास्ता पार करने के लिए बस से कुछ लोगों को उतरना पड़ा ताकि बस थोड़ी हल्की हो और उस टूटी-फूटी सड़क से निकल पाए."

एक बारगी ऐसा लगा कि बस सड़क से उतर गई हो और फँस गई हो लेकिन बस का ड्राइवर चिंटू पुराना खिलाड़ी था. यह उसका अनुभव ही था कि उसने बड़ी कुशलता से बस निकाल दी. और यह सब करने में उसे ज्यादा समय भी नहीं लगा.

The bridge that Naxals blew up



नरसापुरम से ठीक पहले बस पर एक यात्री चढ़ा, जिसका नाम राजू था. उसने बताया, "मेरे पिताजी ने मुझे 2008 में जगदलपुर के एक स्कूल में भेजा था. उन दिनों मैंने नहीं सोचा था कि मैं कभी भी इस सड़क पर अपने दोस्तों के साथ यात्रा कर पाऊंगा. मैंने ये कभी नहीं सोचा था कि हम एक दिन चिंतलनार के वीकली बाजार जा सकेंगे या सुकमा में अपने रिश्तेदारों से इतनी आसानी से मिल सकेंगे. "

यह बस नहीं लोगों के सपने हैं जो उनके लिए रोजगार लेकर आई है. इसके साथ ही जगरगुंडा, नरससापुरम और चिंतलनार जैसे दूरदराज के गांवों के लोगों को दुर्गापुर के जिला अस्पताल से जोड़ देगी. इससे आम आदमी को आसानी से दवाएं, भोजन और रोजमर्रा का सामान लाने-ले जाने में आसानी होगी.

शायद कुछ समय बाद यहां और बसें चलेंगी, सड़कें अच्छी बनेंगी और लोग बाहर की दुनिया से जुड़ पाएंगे.

बस्तर में वो दिन उमस भरा था. सूरज अपने चरम पर था और पारा लगभग 45 डिग्री. पानी की 9 बोतल खत्म हो चुकी थीं. बस में बैठे लोग जगदीश की तरफ एक उम्मीद से देख रहे थे. जगदीश उनकी तरफ देख रहा था और आगे वाले सीआरपीफ कैंप का इंतजार कर रहा था ताकि वो उन खाली बोतलों को भर सके.

हम 9:05 पर चिंतलनार पहुंचे. जगदीश अपने साथी के साथ कैंप के अंदर जाता है और तब तक सीआरपीएफ का एक सिपाही अंदर आकर हमारे आईडी कार्ड चेक करता है. इतने शांत दिन को देखकर ये अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यहां इतना भयंकर नक्सली अटैक होता होगा.



दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला में 6 अप्रैल 2010 को पैरामिलिट्री फोर्स पर देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला हुआ था. इस हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे.

उसके बाद आज तक ताड़मेटला जैसा कोई अटैक नहीं हुआ. लेकिन हर दूसरे हफ्ते यहां गोलीबारी होती है. एक स्थानीय पत्रकार के मुताबिक, दो साल पहले यहां चार दिन तक नक्सलवादी और सीआरपीएफ के जवानों के बीच गोलीबारी हुई थी. पिछले नवंबर में नक्सलियों द्वारा किये गए एक आईईडी ब्लास्ट में दो अर्धसैनिक सैनिक घायल हो गए थे.

यहां अब तक सिर्फ 8 किलोमीटर लंबी सड़क बनी है. हर किलोमीटर पर करीब 6 जवान शहीद हुए हैं. अभी भी 48 किलोमीटर रोड बननी बाकी है.

लगभग 10 मिनट बाद जगदीश कैंप से बाहर गया, उसके हाथ में पानी की बोतल थी और उसे देखते ही लोगों के चेहरे खिल गए. अगला स्टॉप बुर्कापाल था. ये वो जगह है, जहां 24 अप्रैल को एक बड़ा नक्सल अटैक हुआ था जिसमें सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हुए थे. ये अब तक का दूसरा सबसे बड़ा हमला था.

24 अप्रैल की घटना अपनी तरह की कोई पहली घटना नहीं थी. नक्सलियों ने कैंप को आईईडी से उड़ा दिया था. ऐसा नहीं है कि कोई लड़ाई चल रही थी.

इस सड़क को बनाने के चक्कर में न जाने कितने सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए.

सैनिकों में लगातार हो रहे हमलों को लेकर रोष भी बढ़ रहा है.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया. "हम इस सड़क का निर्माण करने के लिए अपने जीवन को खतरे में डालते हैं लेकिन हमें जिस तरह की प्रतिक्रिया मिलती है, वह दयनीय है. उस दिन भी हम सभी तरफ फैले थे. उन लोगों की सुरक्षा करने की कोशिश कर रहे थे, जो यहां सड़क बना रहे थे." उन्होंने आगे बताया, "13 मजदूर एक मशीन से सड़क बना रहे थे. हर किलोमीटर सड़क बनाने में न जाने हमारे कितने जवान शहीद हो गए." सुकमा कलेक्टर के कार्यालय के अनुसार, यहां अब तक सिर्फ 8 किलोमीटर लंबी सड़क बनी है. हर किलोमीटर पर करीब 6 जवान शहीद हुए हैं. अभी भी 48 किलोमीटर रोड बननी बाकी है.

अब थोड़ी ही दूर बुर्कापाल गांव है. यह अब सुनसान है. 24 अप्रैल के हमले के दिन सरपंच सहित सभी लोग गांव से भाग गए और अब तक वापस नहीं आए हैं.

गांव की एक महिला, जिसके पति को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, कहा, "पुलिस और सीआरपीएफ ने सभी लोगों को भगा दिया था और पीटा भी. यही कारण है कि वे छिपते हुए घूम रहे हैं, वे दूर नहीं हैं. अगर वो वापिस आते हैं तो उनको पीटा जाएगा या हो सकता है कि उन्हें गोली मार दी जाएगी. मेरे पति को भी उठाया गया था. अभी तक उनके बारे में कुछ नहीं पता चला"



सीआरपीएफ जवानों से दोबारा भेंट हुई और एक बार फिर हमारी पहचान परेड होने लगी. इसी दौरान रास्ते में चढ़े एक यात्री को पता चला कि वह अपना आईडी कार्ड घर पर भूल गया है. वो अपने घर से बहुत आगे आ चुका था. वह सिपाही से अनुरोध करता है. उस जवान ने यात्री की सावधानी से जांच करने के बाद उसे जाने दिया. हम फिर से बस में हैं. हमारा अगला स्टॉप है- चिंतागुफा.

यह वह जगह है, जहां 15 साल की एक लड़की ने सुरक्षा बलों पर गैंगरेप का आरोप लगाया था और पुलिस को शिकायत दी थी. हालांकि शिकायत दर्ज करने के कुछ दिनों बाद ही वह उसने मामले पर रहस्यमयी चुप्पी साध ली.

चिंतलनार - बुर्कापाल - चिंतलनार, ये 10 किमी की सड़क सबसे सुंदर हैं. चिंतागुफा कैंप के पास एक झील है और यहां झुंड, मन्ना और कठफोड़वा जैसे पक्षी पाए जाते हैं.

एक दिन जब यह सब खत्म हो जाएगा, मैं वापस आऊंगा. मैं अपने परिवार के साथ आऊंगा. हम सब इस झील में बोटिंग करेंगे.

— CRPF जवान

लगभग दो साल पहले बस्तर की मेरी पिछली यात्रा के दौरान चिंतागुफा कैंप में सीआरपीएफ के एक युवा सैनिक ने एक इमोशनल घटना बताई, "एक दिन जब यह सब खत्म हो जाएगा, मैं वापस आऊंगा. मैं अपने परिवार के साथ आऊंगा. हम सब इस झील में बोटिंग करेंगे. मुझे यकीन है कि जब मैं अपने बच्चों को अराजक, हिंसक अतीत के बारे में बताऊंगा, तो वे मुझ पर विश्वास नहीं करेंगे."

बस अब चिंतागुफा पहुंच चुकी थी जहां पर एक साप्ताहिक बाजार लगा है और कुछ लोग यहां उतरकर स्टॉल पर रुक गए हैं, यह जानने के लिए कि उनके पास क्या मिल रहा है. कुछ स्थानीय आदिवासी जंगल से चलकर यहां महुआ के बदले चावल खरीदने पहुँचे हैं.

बस कंडक्टर जगदीश एक सिपाही के साथ बात कर रहा है. वो सिपाही उसे एक लिस्ट देता है. इस लिस्ट के सामान जगदीश को आते हुए लेकर आना है. जैसे ही हम बस की तरफ मुड़ते हैं, वो धीरे से कहता है "यार यह हमारा काम नहीं है. मुझे एक किलो नींबू खरीदने के लिए समय कहां मिलेगा?"

हम फिर से बस में चढ़ गए हैं. अब बस में बैठे हुओं से ज्यादा लोग खड़े हुए हैं. यह साप्ताहिक बाजार है, मुझे पता है, ड्राइवर बस रोकने से खुश नहीं होता.



कंकरलंगा के बाद, चिंटू ने बस चला दी और फिर बस नहीं रोकी. वह बस भगाने लगा है. रास्ते में कुछ लोगों ने हाथ भी दिया पर चिंटू ने बस नहीं रोकी क्योंकि बस में जगह ही नहीं थी. सड़क अभी भी काफी ऊबड़-खाबड़ है

आखिरकार सुबह 11.30 बजे बस में ब्रेक लगा. हम दोरनापाल पहुँच चुके थे. मेरी यात्रा खत्म हो चुकी थी. जगदीश कहता है कि अगली बार वह मुझसे पैसे नहीं लेगा. मादवी और उसके पास बैठे कुछ लड़के अब भी चुपचाप अपना फोन देख रहे हैं.

इस साल हुए नक्सली हमले

Produced by Gauri Shankar