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बिदरी पूजन के नाम से प्रचलित फसलों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों की अनूठी परंपरा

News18Hindi
Updated: June 20, 2017, 1:04 PM IST
बिदरी पूजन के नाम से प्रचलित फसलों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों की अनूठी परंपरा
बिदरी पूजन
News18Hindi
Updated: June 20, 2017, 1:04 PM IST
बैतूल के बानाबेहड़ा गाँव में हर साल खरीफ फसलों की बोवनी करने से पहले ग्रामीणों को एक अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता है जिसे बिदरी पूजन कहा जाता हैं . 48 घंटे तक चलने वाले इस आयोजन के दौरान गाँव में चूल्हा जलाने, कूएं से पानी भरने, नहाने और अपने मवेशियों को नहलाने पर भी प्रतिबंध होता है.

जागरुकता की कमी और खेती की आधुनिक सुविधाओं से महरूम वनवासी हर साल अपनी फसलों को प्राक्रतिक आपदाओं और जंगली जानवरों से बचाने के लिये करते हैं. सदियों से चली आ रही इस परंपरा के नियम बेहद कड़े हैं और नियम तोड़ने वालों को जुर्माने से साथ पूरे गाँव से माफी मांगनी पड़ती है.

वनवासियों के मुताबिक बिदरी पूजा करने से उनकी फसलों पर प्राक्रतिक आपदा नहीं आती और उत्पादन अच्छा होता है. एक समय ऐसा था जब इस गाँव में फसलों का उत्पादन ही नहीं हो पाता था. सरकार से सुविधाएं नहीं मिलने के कारण लोगों ने फसलों को बचाने के लिये कुरीतियों का दामन थाम लिया जिसमें कई पीढ़ियां आज भी जकड़ी हुई हैं.

आदिवासियों के मुताबिक बिदरी पूजन का अर्थ फसलों को प्राक्रतिक आपदाओं से बचाने का बंदोबस्त करना है. हर साल जून के महीने में होने वाले बिदरी पूजन से पहले गाँव का एक भी व्यक्ति फसलों की बोवनी करने की हिम्मत नहीं हर सकता है. जानकारी के मुतबिक गाँव का सबसे सम्मानित व्यक्ति ही बिदरी पूजन करवाता है. वह आदिवासियों के सभी ईष्ट देवों जैसे मेघनाद, महादेव, इंद्र के भाई भीमा और सभी स्थानीय देवी देवताओं की पूजा कर तेंदू पत्तों की गांठे बनाता है.

ग्रामीण को अपने अनाज की टोकरी में पट्टा बांधना होता है जो एक शगुन की निशानी है . खेती के सभी औजारों की पूजा की जाती है और कुछ जगहों पर मुर्गों या बकरों की बलि देने का भी रिवाज है . इसके बाद ये सभी लोग मिलकर देवी देवताओं को महाप्रसादी का भोग लगाते हैं तब कहीं जाकर बिदरी पूजन खत्म होता है. गाँव के सरपंच के मुताबिक पीढ़ियों से यहां बिदरी पूजन हो रहा है जिससे फसलों के नुकसान में कमी और उत्पादन में इजाफा हुआ है.
First published: June 20, 2017
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