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कांग्रेस के ‘चाणक्य’ दिग्विजय सिंह का हर दांव क्यों पड़ जाता है उल्टा?

Manoj Khandekar
Updated: March 20, 2017, 1:53 PM IST
कांग्रेस के ‘चाणक्य’ दिग्विजय सिंह का हर दांव क्यों पड़ जाता है उल्टा?
आप दिग्विजय सिंह से प्‍यार करें या नफरत लेकिन एक बात जरूर है कि मध्‍यप्रदेश के इस पूर्व मुख्‍यमंत्री को अनदेखा नहीं कर सकते.
Manoj Khandekar
Updated: March 20, 2017, 1:53 PM IST
अमूमन अपने एक बयान से विवाद खड़ा कर देने वाले कांग्रेस महासचिव ने पिछले शुक्रवार की सुबह धड़ाधड़ 20 ट्वीट कर डाले. गोवा में पार्टी के प्रभारी दिग्विजय सिंह ने विधानसभा चुनाव में तो जीत दर्ज की लेकिन सरकार बनाने की रेस में हार गए. दिग्विजय सिंह के ये ट्वीट गोवा में उनकी हार की बेचैनी दिखाते हैं. लेकिन दोपहर जब दिग्विजय सिंह न्यूज़18 इण्डिया के कार्यक्रम चौपाल में आए तब उन पर कोई दबाव नज़र नहीं आया.

आप दिग्विजय सिंह से प्‍यार करें या नफरत लेकिन एक बात जरूर है कि मध्‍यप्रदेश के इस पूर्व मुख्‍यमंत्री को आप अनदेखा नहीं कर सकते. कांग्रेस पार्टी के अंदर उनका ओहदा बड़ा है. तभी तो गोवा की नाकामी के बावजूद शीर्ष नेतृत्व उनकी भूमिका पर सवाल नहीं उठा रहा है.

तीन साल पहले जब दिग्विजय सिंह को राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार बनाया गया तब उनके गृह राज्य मध्यप्रदेश से के देवास से सांसद सज्जन सिंह वर्मा ने जमकर बयानबाजी की. उनका कहना था कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्यों में जिन बुजुर्ग नेताओं ने कांग्रेस की लुटिया डुबोई है उन्हें ही दिल्ली में बढ़ावा दिया जा रहा है.

तीन साल बाद सज्जन सिंह वर्मा सांसद नहीं हैं, लेकिन एक बार फिर इशारों-इशारों में उन्होंने दिग्विजय सिंह पर निशाना साधा है. पांच राज्यों के चुनावों नतीजों के बाद पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखी एक चिट्ठी में उन्होंने लिखा कि कुछ परिवारों ने कांग्रेस को खत्म करने की सुपारी ली.'

केवल सज्जन सिंह वर्मा नहीं बल्कि गोवा में कांग्रेस के कई विधायक सूबे में सरकार बनाने का दावा पेश करने में देरी होने पर दिग्विजय सिंह के खिलाफ सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जता चुके है.

13 साल पहले मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद से हीं दिग्विजय सिंह के राजनीतिक करियर में सफलता कम और नाकामी ज्यादा हिस्सें आईं. हालांकि, कांग्रेस के इस शक्तिशाली महासचिव की पार्टी के भीतर राजनीतिक हैसियत में कभी कोई कमी नहीं आई.

2003 के विधानसभा चुनाव में अब तक की सबसे कम सीटें (230 में 38) हासिल कर सत्ता से बाहर होने वाले दिग्विजय सिंह कांग्रेस महासचिव के रूप में भी कोई खास कमाल नहीं दिखा सकें. अपने बयानों से मीडिया की सुर्खियों में छा जाने वाले दिग्विजय के लिए जनता के दरबार में नाकामी ही मिली है.

-यूपी चुनाव प्रभारी रहे, वहां पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया

-बिहार के प्रभारी रहने के बावजूद पार्टी कभी क्षेत्रीय पार्टियों से ऊपर नहीं उठ सकी.

-यूपी, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, असम, गोवा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक के प्रभारी रहे हैं. कांग्रेस केवल कर्नाटक में सत्ता हासिल कर सकी.

-गृह राज्य मध्य प्रदेश में उनके नेतृत्व में वर्ष 2003 में पार्टी की बुरी गत हुई.

-कांग्रेस इसके बाद कभी राज्य में सत्ता हासिल करने में कामयाब नहीं रही.

-2008 और 2013 के चुनावों में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया.

न्यूज18 इंडिया के एक कार्यक्रम चौपाल में दिग्विजय सिंह से उनके प्रभार वाले राज्यों में पार्टी की हालत का सवाल किया गया तो उन्होंने जवाब दिया कि मैं जहां का भी प्रभारी रहा हूं, वहां कांग्रेस का वोट बढ़ा है ना की घटा है.

बयानों ने कराई फजीहत

कांग्रेस पार्टी में वैसे बड़े नेताओं की कमी है जो खुलकर भाजपा या आरएसएस सहित तमाम विरोधियों पर एक सुर में हमला करते हों. ये खासियत ही दिग्विजय को पार्टी में अलग पहचान दिलाती हैं. वह कभी अपने बयान से पलटते नहीं है, चाहे उस पर कितना भी बवाल मच जाए. कई बार तो उनका बयान ही बाद में पार्टी का अधिकृत बयान बन जाता है. लेकिन उनके कुछ ऐसे बयान है, जिसे लेकर काफी बवाल मचा.

-एमनेस्टी इंटरनेशनल के कार्यक्रम में कथित तौर पर कश्मीर के आजादी के नारे लगाने पर उन्होंने कहा कि नारा लगाना देशद्रोह नहीं है. उन्होंने कहा कि यदि कोई भारत विरोधी गलती करता है तो उसे सजा जरूर देनी चाहिए.

-पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की तर्ज पर जम्मू-कश्मीर के लिए भारत अधिकृत कश्मीर कह दिया था.

-अल क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को "ओसामा जी" कहने की वजह से उनकी काफी आलोचना हुई थी.

पाकिस्तानी आतंकी हाफिज़ सईद को ‘साहब’ कहकर संबोधित किया.

-दिग्विजय सिंह ने बाटला हाउस एनकाउंटर पर भी सवाल उठाए थे.

-26/11 के आतंकी हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे की शहादत को हिंदू संगठनों से जोड़कर दिए उनके बयान ने भी काफी बवाल मचाया था.
वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय कहते हैं, 'दिग्विजय ने सत्ता से बाहर होने के बाद अपने बयानों से सुर्खियों में रहने की कला सीख ली. हालांकि, अब कई बार उनके ये बयान हीं पार्टी के लिए मुसीबत की वजह बनते जा रहे हैं.'

गिरीश उपाध्याय अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते है कि कभी दिग्विजय कहा करते थे कि चुनाव मैनेजमेंट से जीता जाता है, लेकिन गोवा के मामले में तो कम से कम उनका मैनेजमेंट फेल साबित हुआ.'
First published: March 20, 2017
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