देखें: पहली नजर में डॉक्टर को दिव्यांग लड़की से हुआ प्यार, गोद में उठाकर पहुंचा कोर्ट

Durgesh Kumar | ETV MP/Chhattisgarh
Updated: March 21, 2017, 11:37 PM IST
Durgesh Kumar | ETV MP/Chhattisgarh
Updated: March 21, 2017, 11:37 PM IST
कहते हैं प्यार अंधा होता है, प्यार शरीर की सुंदरता नहीं, बल्कि मन की सुंदरता को देखता है. प्यार की इस परिभाषा को सही साबित किया है जबलपुर के एक युवा डॉक्टर ने. डॉक्टर ने अपने प्यार को अंजाम देते हुए एक दिव्यांग युवती को अपना जीवनसाथी बनाया है. दोनो पैरों से दिव्यांग युवती को जब युवक ने अपने हाथों में उठाया तो देखने वालों ने इस जोड़े को प्यार की नई परिभाषा बताया.

इस जोड़े ने प्यार काे एक नया नाम दिया. दूल्हे मियां अपनी दुल्हनिया को कोर्ट मैरिज के लिए कलेक्ट्रेट लेकर पहुंचे. वहां बैंड बाजा बारात तो नहीं थी, लेकिन जोड़े को तारीफ और आर्शीवाद देने वालों की कमी नहीं थी.

ये कहानी एक डॉक्टर और मरीज से शुरू होती है. युवक का नाम समीरन बाला है, जो कोलकाता का निवासी है और पेशे से एक आयुर्वेदिक डॉक्टर है. समीरन एक साल पहले मीना पटेल के घर मीरा की मां का इलाज कराने पहुंचा था. इस दौरान समीरन ने मीना को देखा और पहली नज़र में ही दिव्यांग मीना डॉक्टर को इतनी पसंद आयी कि उन्होंने मीना को जीवनसाथी बनाने का फैसला ले लिया.

डॉक्टर समीरन बाला बंगाली ब्राह्मण हैं और मीना पटेल समाज से. डॉक्टर समीरन ने इस शादी के लिए पहले अपने परिवार को राजी किया और फिर मीना के परिवार से उसका हाथ मांगा. काफी सोच विचार और डॉक्टर के परिवार से बातचीत के बाद आखिरकार जाति के बंधन से ऊपर उठकर बेटी के भविष्य को देखते हुए पटेल परिवार ने शादी के लिए हरी झंडी दे दी. मंगलवार को मीना और समीरन ने कोर्ट मैरिज कर एक दूसरे को जीवनसाथी चुन लिया.

दिव्यांग युवती का हाथ थामने वाले डॉक्टर का कहना है कि उन्होंने बड़ा काम किया या नहीं ये उन्हें नहीं पता. बस उसे जिससे प्रेम हुआ उसे जीवन साथी बनाकर बेहद ख़ुशी है.

दुल्हन मीना बचपन से ही पोलियो की शिकार है. दोनों पैरों से दिव्यांग मीना चल भी नहीं सकती है. अपनी दिव्यांगता के कारण मीना ने तो शादी के सपने देखने ही छोड़ दिए थे. दिव्यांग लड़की के लिए दिव्यांग लड़कों के भी कई रिश्ते आए, लेकिन कहीं पर भी बात नहीं बनी. इस दौरान मां का इलाज करने के दौरान समीरन ने मीना को पसंद कर लिया. फिर मानो मीना के सारे सपने ही पूरे हो गए. मीना कहती है कि वे बहुत भाग्यशाली है कि उन्हें समीरन जैसा जीवनसाथी मिला.

इस शादी से मीना का परिवार भी बेहद खुश है. परिवार का कहना है कि जात-पात पर आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में भारी विश्वास किया जाता है. लेकिन बेटी की दिव्यांगता उसकी शादी में बड़ी समस्या थी. कई रिश्ते आए भी लेकिन शादी तक बात नहीं बनी. बेटी की मर्ज़ी जानने-समझने और उसकी रजामंदी मिलने के बाद उन्होंने इस शादी को स्वीकार किया है.

समीरन जैसे पढ़े-लिखे युवा जब इस तरह का फैसला सोच-समझकर लेते हैं तब समाज के लिए उनका फैसला किसी प्रेरणा से कम नहीं होता है. ऐसे ही समझदारी भरे फैसलों से जहां ऊंच-नीच जात-पात की रूढ़िवादी दीवारें धरासाई होती, बल्कि ऐसे ही फैसलों से देश और सामाज में सकरात्मक बदलाव भी आते हैं.
First published: March 21, 2017
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