जैविक खेती ने बदली किसान की तकदीर, 20 हजार से 13 लाख रुपये हुई कमाई!

CNBC आवाज

Updated: November 9, 2016, 6:54 PM IST
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सीकर। एक किसान कैसे अपनी बेजान सी जमीन में नई जान फूंक सकता है, वह भी बिना किसी की सलाह लिए, हम आपको ऐसे ही एक किसान से रूबरू करवाएंगे जिसका पूरा परिवार आज जैविक खेती के जरिए नए आयाम कायम कर रहा है।

राजस्थान में रामकरण और उनकी पत्नी संतोष देवी को अब गांव ही नहीं, इलाका जानने लगा है। सिर्फ डेढ़ हेक्टेयर जमीन से दंपत्ति सालाना 13 लाख रुपये की कमाई करता है। छह साल पहले मुश्किल से 20-25 हजार रुपये की खेती थी। रामकरण ने सीकर के कृषि मेले में जैविक खेती के बारे में जाना और अनार की जैविक खेती शुरू की। आज इनके खेत में 220 अनार के पेड़ हैं, जिसकी फसल खरीदने के लिए लोग खुद इनके पास पहुंचते हैं।

जैविक खेती ने बदली किसान की तकदीर, 20 हजार से 13 लाख रुपये हुई कमाई!
रामकरण और उनकी पत्नी संतोष देवी को अब गांव ही नहीं इलाका जानने लगा है। सिर्फ डेढ़ हेक्टेयर जमीन से दंपत्ति सालाना 13 लाख रुपये की कमाई करता है।

दरअसल, पिछले कुछ समय से देश भर में जैविक खेती की तरफ किसानों का रुझान बढ़ा है। सिक्किम में 75 हजार हेक्टेयर जमीन में जैविक खेती हो रही है, वहीं मेघालय ने भी साल 2020 तक दो लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती करने का लक्ष्य रखा है। राज्य सरकारें इसके लिए किसानों को प्रशिक्षित और प्रोत्साहित भी कर रही हैं।

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक किसान और कंज्यूमर दोनों में जैविक खेती पर जागरुकता की कमी है। लेकिन रामकरण जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि जैविक खेती बड़े पैमाने पर अपनाने से किसानों की आर्थिक हालत भी दुरुस्त होगी और लोगों के खाने-पीने में केमिकल की मात्रा भी घटेगी।

जैविक खेती क्या है?: जैविक खेती एक ऐसी पद्धति है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों के स्थान पर जीवांश खाद पोषक तत्वों (गोबर की खाद कम्पोस्ट, हरी खाद, जीवणु कल्चर, जैविक खाद आदि) जैव नाशियों (बायो-पैस्टीसाईड) व बायो एजेंट जैसे क्राईसोपा आदि का उपयोग किया जाता है। इससे न केवल भूमि की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहती है, बल्कि पर्यावरण भी प्रदूषित नहीं होता और कृषि लागत घटने व उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ने से कृषक को अधिक लाभ भी मिलता है ।

जैविक खेती वह सदाबहार कृषि पद्धति है, जो पर्यावरण की शुद्धता, जल व वायु की शुद्धता, भूमि का प्राकृतिक स्वरूप बनाने वाली, जल धारण क्षमता बढ़ाने वाली, धैर्यशील कृत संकल्पित होते हुए रसायनों का उपयोग आवश्यकता अनुसार कम से कम करते हुए कृषक को कम लागत से दीर्घकालीन स्थिर व अच्छी गुणवत्ता वाली पारंपरिक पद्धति है।

First published: November 9, 2016
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