साधना की मेहनत से स्ट्रीट चिल्ड्रन ने जाना 'क्या है पढ़ाई'

आईबीएन-7

First published: February 1, 2011, 10:48 AM IST | Updated: February 1, 2011, 10:48 AM IST
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साधना की मेहनत से स्ट्रीट चिल्ड्रन ने जाना 'क्या है पढ़ाई'
आमतौर पर कोशिश यही होती है कि इन बच्चों को ऐसा काम सिखा दिया जाए, जिससे ये कहीं भी काम कर सकें। फिलहाल इन्हें यहां इलैक्ट्रिकल, कारपेंट्री और प्लंबिंग के साथ प्रिंटिंग जैसे काम सिखाए जाते हैं। बच्चों को टाइपिंग यहां भी सिखाई जाती है।

अर्जुन कुछ साल पहले और बच्चों की तरह बिहार से भाग कर यहां पहुंचा था और हनुमान मंदिर के पास किसी तरह अपना गुजर बसर करता था। लेकिन हमारी सिटिजन जर्नलिस्ट साधना इसके लिए वरदान साबित हुई, जिनके संपर्क में आने के बाद अर्जुन ने पुरानी सभी गलत हरकतों को बंद कर अपना पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाया और आज वो दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन कर रहा है। जिस सेंटर में रहकर वो बड़ा हुआ, उसे वो दिन आज भी याद है और अक्सर यहां आकर बच्चों को पढ़ाने का काम करता है।

अर्जुन जैसे बच्चों को रास्ता दिखाने वाली साधना कहती हैं कि वो सामाजिक संस्था प्रयास के साथ जुड़कर स्ट्रीट चिल्ड्रेन के साथ कई साल से काम कर रही हैं। भीख मांगने वाले बच्चों को राहत देने के लिए उन्होंने पूरी दिल्ली में अपने साथियों का जाल बिछा रखा है। मोरीगेट, हनुमान मंदिर, कनाट प्लेस, आजादपुर मंडी, लाहौरी गेट समेत कई जगहों पर कॉन्टेक्ट प्वाइंट हैं जहां भीख मांगने वाले बच्चों के साथ हम सभी लगातार संपर्क में रहते हैं।

इन बच्चों को सड़क से चिल्ड्रेन होम में लाना वाकई कठिन है, क्योंकि बच्चों से जबर्दस्ती नहीं की जा सकती और वो आसानी से किसी की बात नहीं मानते। ऐसे में इन बच्चों को उनके भीख मांगने वाली जगह पर ही पढ़ाई लिखाई शुरू की जाती है।

इन बच्चों के साथ कई महीने तक सभी लगातार संपर्क में रहते हैं। संस्था से जुडे़ राजेश कुमार ने तीन साल ऐसे ही बच्चों के साथ इसी जगह पर बिताया। तब जाकर ये बच्चे हमारे ऊपर भरोसा करने लगे। बाद में उन्हें समझाया गया कि तुम सभी हमारे साथ चलो, हम तुम्हें अच्छी तरह खाना तो देगें ही साथ ही तुम्हारी पढाई का भी इंतजाम करेंगे। जब बच्चों को समझ में आ जाता है कि साधना दीदी की बात सही है, फिर ये हमारे साथ चिल्ड्रेन होम में आने को तैयार हो जाते हैं। जहांगीरपुरी के इस चिल्ड्रेन होम में बच्चों की पढाई लिखाई का पूरा इंतजाम है।

आमतौर पर कोशिश यही होती है कि इन बच्चों को ऐसा काम सिखा दिया जाए, जिससे ये कहीं भी काम कर सकें। फिलहाल इन्हें यहां इलैक्ट्रिकल, कारपेंट्री और प्लंबिंग के साथ प्रिंटिंग जैसे काम सिखाए जाते हैं। बच्चों को टाइपिंग यहां भी सिखाई जाती है। ये सभी ऐसे काम हैं, जिससे बच्चे जहां चाहें वहां काम कर सकते हैं और अपनी रोजी रोटी का आसानी से इंतजाम कर सकते हैं।

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