जब निदा फ़ाज़ली के लफ़्ज़ों को मिली जगजीत सिंह की आवाज

News18Hindi
Updated: February 8, 2017, 12:12 PM IST
जब निदा फ़ाज़ली के लफ़्ज़ों को मिली जगजीत सिंह की आवाज
पद्मश्री सम्मानित मशहूर शायर ने निदा फ़ाज़ली ने बॉलीवुड फिल्मों के लिए कई सदाबहार गीत लिखे है. निदा की बहुत-सी नज़्मों और ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने अपनी दिलकश आवाज़ में गाया है.
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Updated: February 8, 2017, 12:12 PM IST
आठ फरवरी का दिन संगीत की दुनिया का यादगार दिन है. आज ही के दिन मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने इस दुनिया को अलविदा कहा था और ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह का जन्म हुआ था. इसके साथ ही निदा और जगजीत में एक और बेहद खास कनेक्शन भी है. जगजीत सिंह ने निदा फ़ाज़ली के कई लफ़्ज़ों को अपनी खूबसूरत आवाज़ में संजोया है.

पद्मश्री सम्मानित मशहूर शायर ने निदा फ़ाज़ली ने बॉलीवुड फिल्मों के लिए कई सदाबहार गीत लिखे है. इसके अलावा भी उनकी नज़्मों और ग़ज़लों की कई एलबम भी आई हैं. निदा की बहुत-सी नज़्मों और ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने अपनी दिलकश आवाज़ में गाया है.

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है




होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
उनसे नज़रें क्या मिलीं रोशन फ़िज़ाएं हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है




अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं




सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो
इधर उधर कई मंज़िल हैं चल सको तो चलो
बने बनाये हैं सांचे जो ढल सको तो चलो




आइना देख के बोले यह संवारने वाले
अब तो बे -मौत मरेंगे मेरे मरने वाले
देखके तुमको होश में आना भूल गए
याद रहे तुम औ ज़माना भूल गए




चांद भी देखा, फूल भी देखा
बादल, बिजली, तितली, जुगनू
कोई नहीं है ऐसा, तेरा हुसन है जैसा
मेरी निगाह ने ये कैसा ख्वाब देखा है
ज़मीं पे चलता हुआ महताब देखा है
मेरी आंखों ने चुना है तुझको, दुनिया देखकर
किसका चेहरा, अब मैं देखूं, तेरा चेहरा देखकर



धड़कन धड़कन धड़क रहा है, बस इक तेरो नाम
पंछी पंछी चहक रहा है, बस इक तेरो नाम
नन्हों की भोली बातों में, उजली उजली धूप
गुंचा गुंचा चटक रहा है, बस इक तेरो नाम




गरज बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाना, बच्चों को गुड़धानी दे मौला
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला




हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी
सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी




अब ख़ुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
उसको रुख़्सत तो किया था, मुझे मालूम न था
सारा घर ले गया, घर छोड़ के जाने वाला




बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता
सब कुछ तो है क्या ढूंढ़ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता




तेरी आंखों से ही जागे सोए हम
कब तक आखिर तेरे ग़म को रोए हम
वक्त का मरहम ज़ख़्मों को भर देता है
शीशे को भी ये पत्थर कर देता है




जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना
यूं उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना



बहुत खूबसूरत है आंखें तुम्हारी
अगर हो इनायत ऐ जाने मोहब्बत
बना दीजिए इनको किस्मत हमारी


First published: February 8, 2017
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