सूरदास के एक भजन ने निदा फ़ाज़ली को बना दिया था शायर

News18Hindi

Updated: February 8, 2017, 1:04 PM IST
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हिन्दी और उर्दू के मशहूर शायर मुक्तदा हसन निदा फ़ाज़ली ने आठ फरवरी 2016 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया था. निदा का हिंदी शायरी की ओर रुझान होने का किस्‍सा भी बेहद दिलचस्‍प है. एक बार निदा किसी मंदिर के करीब से गुजर रहे थे. उसी वक्‍त मंदिर में कोई शख्‍स सूरदास का भजन गा रहा था. इस भजन में कृष्‍ण और राधा के विरह का जिक्र था. बस उसी वक्‍त निदा ने तय कर लिया कि वे हिंदी में भी शायरी लिखेंगे.

निदा फाजली का जन्‍म कश्‍मीरी परिवार में दिल्‍ली में 12 अक्‍टूबर 1938 को हुआ था. उन्‍होंने प्रारंभिक शिक्षा मध्‍य प्रदेश के ग्‍वालियर में हासिल की. उनके पिता भी उर्दू के नामचीन शायर थे. विभाजन के वक्‍त निदा फाजली के पिता पाकिस्‍तान चले गए, लेकिन निदा ने भारत में ही रहने का फैसला किया.

सूरदास के एक भजन ने निदा फ़ाज़ली को बना दिया था शायर
हिन्दी और उर्दू के मशहूर शायर मुक्तदा हसन निदा फ़ाज़ली ने आठ फरवरी 2016 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया था. निदा का हिंदी शायरी की ओर रुझान होने का किस्‍सा भी बेहद दिलचस्‍प है.

1964 में निदा फाजली नौकरी की तलाश में मुंबई आ गए और फिर बॉलीवुड के आकर्षण में खिंचते चले गए. वहां उन्‍हें सरदार जाफरी और कैफी आजमी जैसी नामचीन शख्सियतों संग काम करने का मौका मिला.

पहली बार ऐसे मिला ब्रेक

जब कमाल अमरोही 'रजिया सुल्‍तान' बना रहे थे, उसी वक्‍त उन्‍हें इस फिल्‍म में दो गाने लिखने का मौका मिला. और फिर इसके बाद निदा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

फिल्‍मों में लिखे उनके कई नज्‍म बेहद लोकप्रिय हूए. बाद में निदा फाजली को साहित्‍य अकादमी, पद्मश्री सहित कई अवॉर्ड से नवाजा गया.

निदा फाजली के कुछ मशहूर शेर

-बहुत मुश्किल है बंजारा मिज़ाजी

सलीक़ा चाहिये आवारगी में

-बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता

जो बीत गया है, वो गुज़र क्यों नहीं जाता

-घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें

किसी रोते हुये बच्चे को हंसाया जाये

-कुछ लोग यूं ही शहर में हमसे भी ख़फ़ा हैं

हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

-मीरो ग़ालिब के शेरों ने किसका साथ निभाया है

सस्ते गीतों को लिख लिखकर हमने घर बनवाया है

-बात कम कीजे ज़हानत को छुपाते रहिये

ये नया शहर है कुछ दोस्त बनाते रहिये

दुश्मनी लाख सही ख़त्म ना कीजे रिश्ता

दिल मिले या ना मिले हाथ मिलाते रहिये

-कभी कभी यूं भी हमने अपने ही को बहलाया है

जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है

निदा फाजली के मशहूर गीत

-आई जंजीर की झन्कार, खुदा खैर कर (फिल्म रजिया सुल्ताना)

-होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है (फिल्म सरफ़रोश)

-कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता (फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता) (पुस्तक मौसम आते जाते हैं से)

-तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है (फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता)

-चुप तुम रहो, चुप हम रहें (फिल्म इस रात की सुबह नहीं)

First published: February 8, 2017
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