नहीं रहे हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार प्रभाकर श्रोत्रिय, 76 की आयु में निधन

News18India.com
Updated: September 16, 2016, 11:39 AM IST
नहीं रहे हिंदी के मूर्धन्‍य साहित्‍यकार प्रभाकर श्रोत्रिय, 76 की आयु में निधन
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नई दिल्‍ली। हिंदी के मूर्धन्‍य ओलाचक, लेखक और चिंतक प्रभाकर क्षोत्रिय का 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया। गुरुवार रात दिल्‍ली के गंगाराम हॉस्पिटल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे।  उनका अंतिम संस्‍कार हरिद्वार में किया जाएगा।

बता दें कि उन्‍होंने हिंदी की कई प्रतिष्‍ठित साहित्‍यिक पत्रिकाओं का संपादन किया इनमें, वागर्थ, ज्ञानोदय और समकालीन भारतीय जैसी पत्रिकाएं शामिल हैं। एक आलोचक के रूप महाभारत पर उन्‍होंने बेहद गंभीर कार्य किया। उनका निधन हिंदी और संस्‍कृत साहित्‍य दोनों के लिए अपूरणीय क्षति है।

डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय का जन्‍म मध्‍य प्रदेश के जावरा में 19 दिसम्बर 1938 को हुआ था। आलोचक और नाटककार के रूप में वे हिंदी साहित्‍य के सबसे लोकप्रिय हस्‍ताक्षर रहे। इसके अलावा हिंदी आलोचना में भी प्रभाकर श्रोत्रिय एक महत्वपूर्ण नाम रहे, हालांकि पर आलोचना के इतर भी साहित्य में उनका अहम योगदान रहा । खासकर नाटकों के क्षेत्र में हिंदी नाटकों को नई दिशा दी।

वे पहले मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के सचिव एवं 'साक्षात्कार' व 'अक्षरा' के संपादक रहे हैं।  इसके अलावा वे भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं 'वागर्थ' के संपादक पद पर कार्य करने के साथ-साथ वे भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली के निदेशक पद पर भी रहे।  प्रभाकर श्रोत्रिय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे और उन्‍होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपनी कलम चलाई। लेकिन उन्‍हें हिंदी साहित्‍य में आलोचना, निबंध और नाटक के क्षेत्र में उनका विशेष योगदान रहा।

उनकी प्रमुख आलोचनात्‍मक कृतियों में  'सुमनः मनुष्य और स्रष्टा', 'प्रसाद का साहित्यः प्रेमतात्विक दृष्टि', 'कविता की तीसरी आख', 'संवाद', 'कालयात्री है इसके अलावा कविता' संग्रह में 'रचना एक यातना है', 'अतीत के हंसः मैथिलीशरण गुप्त', जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता'. 'मेघदूतः एक अंतयात्रा, 'शमशेर बहादूर सिंह', 'मैं चलू कीर्ति-सी आगे-आगे', 'हिन्दी - कल आज और कल' प्रमुख कृतियां रहीं।

वहीं हिंदीः दशा और दिशा', 'सौंदर्य का तात्पर्य', 'समय का विवेक', 'समय समाज साहित्य'प्रमुख कृतियां रहीं, जबकि नाटक 'इला', 'साच कहू तो. . .', 'फिर से जहापनाह', के रूप में उन्‍होंने निबंध लेखन किया।

इसके अलावा साहित्यिक जगत उन्हें प्रखर सम्पादक के रूप में भी जानता है। वे ‘वागर्थ’, साक्षात्कार‘ और ‘अक्षरा’ जैसी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के लंबे समय तक संपादक रहे हैं। भारतीय ज्ञानपीठ की पत्रिका ‘नया ज्ञानोदय’ के वे लंबे समय तक संपादक रहे।

प्रभाकर जी के नहीं रहने पर हिंदी के वरिष्‍ठ पत्रकारों, लेखकों और साहित्‍यकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी-अपनी तरह से याद किया है।

वरिष्ठ हिंदी आलोचक और अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादक रहे डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय नहीं रहे। महभारत पर उनका बड़ा काम है। वे 76 वर्ष के थे और कुछ समय से ज़्यादा ही अस्वस्थ चले आ रहे थे। उनसे पहले-पहल 1984 में बरगी नगर (मध्यप्रदेश) में मिलना हुआ था, जब अज्ञेय जी ने वहां पांचवा वत्सल निधि शिविर आयोजित किया। बरसों बाद जनसत्ता आवास में उनके पड़ोस में रहने का सुख हासिल था। पीटर ब्रुक की तीन घंटे लम्बी नाट्य-फ़िल्म 'महाभारत' (मूल प्रस्तुति नौ घंटे) उन्होंने हमारे यहा एकाधिक बार देखी।

मैंने बाद में उसकी प्रति तैयार कर उन्हें भेंट की थी। जब उनकी 'महाभारत' छप कर आई तो उसे देने स्वयं आए। जब स्वस्थ थे जनसत्ता आवास में शाम को सैर की फेरी लगाते थे। बाइपास के बाद तो नियमित रूप से। उस रास्ते पर उनकी पदचाप हमें लम्बे समय तक सुनाई देती रहेगी।

ओम थानवी, वरिष्‍ठ पत्रकार और पूर्व संपादक, जनसत्‍ता

अभी प्रभाकर श्रोत्रिय जी के जाने की ख़बर मिली। पहले से डूबा मन और डूब गया। सबसे पहले सम्पादक थे वह मेरे। तब वागर्थ में 'नए पत्ते' करके एक कॉलम जाता था। मैंने चार कविताएं उसी के लिए भेजी थीं। महीने भर के अंदर उनका सुंदर सी हस्तलिपि में स्वीकृति का पोस्टकार्ड आया। रचनाएं जनवरी 1997 में छपीं। फिर कोई 17-18 साल बाद उज्जैन में निरंजन श्रोत्रिय के सम्पादन में निकले पहले युवा द्वादश के लोकार्पण के लिए वह आये तो एक छोटी सी मुलाकात हुई। मैंने याद दिलाया तो बोले हां मुझे याद है। बाद में भी आपको पढ़ता रहा हूं। उसके बाद भी ऐसी ही छोटी-छोटी एकाध मुलाक़ातें हैं।

वैचारिक दृष्टि से पर्याप्त मतभेद होने के बावज़ूद पत्रिका में उन्होंने मेरा परिचय रेडिकल वाम से जुड़ाव के साथ छापा था। संपादकों की उस आख़िरी पीढ़ी से थे वह जिनके यहां वैचारिक/व्यक्तिगत असहमति के लिए स्पेस बचा था/है।

श्रद्धांजलि प्रभाकर जी। प्रणाम। अंतिम प्रणाम।

अशोक कुमार पांडेय, कवि एवं लेखक

आलोक जी श्रीवास्‍तव जी से ख़बर मिली कि प्रभाकर श्रोत्रिय गुज़र गये। सन '95 की बात है। वागर्थ का पहला अंक हमारे दरभंगा के मैत्रेयी साहित्य संगम पर आया। सुरुचिपूर्ण अंक था। हमने अपनी कुछ कविताएं भेज दी। ऐसा हम हर नयी-पुरानी पत्रिका के साथ किया करते थे। वागर्थ का तीसरा अंक आया, तो उसमें मेरी कविताएं छपी थीं। ऐसे संपादक थे प्रभाकर श्रोत्रिय, जो अज्ञात कुलशील कवि को भी गंभीरता से लेते थे। पारिश्रमिक के तौर पर वागर्थ की वार्षिक सदस्यता मिल गयी।

थोड़े दिनों बाद एक पत्र पदातिक थिएटर ग्रुप से आया कि वह अपने नाटक में मेरी कविताओं को शामिल करना चाहते हैं। मैंने अनुमति पत्र भेज दिया। एक महीने बाद श्यामानंद जालान जी का एक धन्यवाद पत्र आया। साथ में 1500 ₹ का चेक भी था। कविता से यह पहली बड़ी कमाई थी। दिल्ली में जब नया ज्ञानोदय पत्रिका की शुरुआत हुई, तो प्रभाकर श्रोत्रिय जी से मिलने गया। वे संपादक थे। बहुत प्यार से मिले। चाय पिलाई, क्योंकि कविताई तब तक मुझसे छूट गई थी, उन्होंने लिखने के लिए प्रेरित किया। आज जब उनके नहीं होने की ख़बर मिली, तो मन में बड़ी टीस उठी कि उनसे ज़्यादा मुलाक़ातें नहीं हो पायी। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

अविनाश दास, पत्रकार और लेखक  

हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार, आलोचक, चिंतक और संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय जी नहीं रहे। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

आलोक श्रीवास्‍तव, कवि/लेखक

हमारे समय के महत्वपूर्ण लेखक आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी का कल रात दिल्ली में निधन हो गया. वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे. आज उनका अंतिम संस्कार हरिद्वार में किया जाएगा।

प्रभाकर जी ने साहित्य में महत्वपूर्ण काम किया है। वे हमारे बीच हमेशा रहेंगे।

दस्तक परिवार के सभी मित्रों की ओर से उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि
अनिल करमेले
First published: September 16, 2016
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