किस-डे: दशकों पहले मंटो ने इस खत से की थी चुंबन सिखाने की मांग

News18Hindi

Updated: February 13, 2017, 3:16 PM IST
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वेलेंटाइन वीक में आज किस डे है. मशहूर लेखक और उर्दू के अफसानानिगार सआदत हसन मंटो ने कभी  अंकल सैम को लिखे  नौ पत्रों में चुंबन का तरीका सिखाने के लिए सुंदर लकियों को भेजने की सिफारिश की थी. पेश है मंटो की खतो-किताबत का वह हिस्‍सा, जहां जिक्र है चुंबन की नजाकत और प्‍यार की अदाओं को सिखाने का.

चचाजान,

किस-डे:  दशकों पहले मंटो ने इस खत से की थी चुंबन सिखाने की मांग
वेलेंटाइन वीक में आज किस डे है. मशहूर लेखक और उर्दू के अफसानानिगार सआदत हसन मंटो ने कभी अंकल सैम को लिखे नौ पत्रों में चुंबन सिखाने के लिए सुंदर..

आदाबो-नियाज।

अभी कुछ दिन हुए, मैंने आपकी खिदमत में एक निवेदन खत भेजा था. अब यह नया लिख रहा हू बात यह है कि जैसे-जैसे आपकी पाकिस्‍तान को फौजी सहायता देने की बात पक्‍की हो रही है, मेरी अकीदत और आपके प्रति सआदतमंदी बढ़ रही है - मेरा जी चाहता है कि आपको हर रोज लिखा करूं.

हिंदुस्‍तान लाख टापा करे, आप पाकिस्‍तान से फौजी सहायता का समझौता जरूर करें इसलिए कि आपको इस दुनिया की सबसे बड़ी इस्‍लामी सल्‍तनत को मजबूत करने की बहुत ज्यादा फिक्र है, और क्‍यों न हो, इसलिए कि यहा का मुल्‍ला रूस के कम्‍युनिज्‍म का बेहतरीन तोड़ है.

फौजी सहायता का सिलसिला शुरू हो जाए तो आप सबसे पहले उन मुल्‍लाओं की सजावट कीजिएगा. उनके लिए खालिस अमरीकी ढेले, खालिस अमरीकी जपमालाए (तस्बीह) और खालिस अमरीकी नमाज पढ़ने वाली चटाइया रवाना कीजिएगा. उस्‍तरों और कैंचियों को भी लिस्‍ट में जरूर रखिएगा. खालिस अमरीकी खिजाबे-लाजवाब का नुस्खा भी अगर आपने उनको भेंट कर दिया तो समझिए पौबारह हैं, फौजी सहायता का उद्देश्‍य, जहा तक मैं समझता हू, इन मुल्‍लाओं की सजावट करना है - मैं आपका पाकिस्‍तानी भतीजा हू, आपकी आख का इशारा समझता हू - अक्ल की यह भेंट भी आप ही की सियासी चाल है. खुदा इसे बुरी नजर से बचाए.

मुल्‍लाओं का यह फिरका अमरीकी स्‍टाइल से सज-धज गया तो सोवियत रूस को यहाँ से अपना पानदान उठाना ही पड़ेगा, जिसकी कुल्लियों तक में कम्‍युनिज्म और सोशलिज्म घुले होते हैं.

जब अमरीकी औजारों से कतरी हुई लबें होंगी, अमरीकी मशीनों से सिले हुए शरअई पाजामें होंगे, अमरीकी मिट्टी के अनटच्‍ड बाई हैंड ढेले होंगे, अमरीकी लकड़ी के स्‍टैंड होंगे जिस पर कुरान रखते हैं और अमरीकी चटाई होंगी, तब आप देखिएगा, चारों तरफ आप ही के नाम की माला जपने वाले मिलेंगे.

यहा के निचले और निचले दरमियानी तब‍के को ऊपर उठाने की कोशिश तो, जाहिर है, आप खूब करेंगे - भर्ती इन्‍हीं दो तबकों से शुरू होगी. दफ्तरों में चपड़ासी और क्‍लर्क भी यहीं से चुने जाएगे. तनख्वाहें अमरीकी स्‍केल की होंगी - जब इनकी पाचों उगलियाँ घी में होंगी और सर कड़ाहे में, तो कम्‍युनिज्म का भूत दुम दबाकर भाग जाएगा.

भर्ती का, या कोई भी सिलसिला शुरू हो, मुझे कोई एतिराज नहीं, लेकिन आपका कोई सिपाही इधर नहीं आना चाहिए - मैं यह हरगिज नहीं देख सकता कि हमारी पाकिस्‍तानी लड़कियां अपने जवानों को छोड़कर आपके सिपाहियों के साथ चहकती फिरें.

इसमें कोई शक नहीं कि आप यहा खूबसूरत और सेहतमंद अमरीकी सिपाही भेजेंगे, लेकिन मैं आपको बताए देता हू कि हमारा ऊपर का तबका तो हर किस्‍म की बेगैरती कुबूल कर सकता है कि वह पहले ही अपनी आखें आपकी लांड्रियों में धुलवा चुका है, मगर यहा का निचला और निचला दरमियानी तबका ऐसी कोई चीज कुबूल नहीं करेगा.

अलबत्ता आप वहा से अमरीकी लड़कियां रवाना कर सकते हैं, जो हमारे जवानों की मरहम-पट्टी करें, उनको डांस करना सिखाएं, उनको खुल्‍लमखुल्‍ला चुम्‍मे लेने की शिक्षा दें, उनकी झेंप दूर करें - इसमें आप ही का फायदा है.

आप अपनी एक फिल्‍म 'बेदिंग ब्‍यूटी' में अपनी सैकड़ों लड़कियों की नंगी और गोल टाँगे दिखा सकते हैं - हमारे यहां भी ऐसी टांगें भेज दीजिए ताकि हम भी अपने इकलौते फिल्‍म स्‍टूडियो 'शाह नूर' में एक ऐसी ही फिल्‍म बनाएँ और, 'अपवा' वालों को दिखाएँ कि उन्हें कुछ खुशी हो.

हां, हमारे यहा 'अपवा' एक अजीबो-गरीब चीज बनी हुई है, जो बड़े आदमियों की बड़ी बहू-बेटियों के शौक का दिलचस्‍प नतीजा है. यह 'अल पाकिस्‍तान वूमेंस एसोशिएशन' का संक्षिप्‍त नाम है. इसमें और ज्यादा छोटा करने की गुंजाइश नहीं - कोशिश जरूर हो रही है, जो आपको उन छोटे-छोटे ब्‍लाउजों में नजर आ सकती है, जिनमें से उनके पहनने वालियों के पेट बाहर झाकते नजर आते हैं, अभी शुरुआत है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि यह ब्‍लाउज आमतौर पर चालीस बरस से ऊपर की औरतें इस्‍तेमाल करती हैं, जिनके पेट कई बार कलबूत चढ़ चुके होते हैं - चचाजान, मैं औरत के पेट पर, चाहे वह अमरीकी हो या पाकिस्‍तानी, और सब कुछ देख सकता हूँ, मगर उस पर झुर्रियाँ नहीं देख सकता.

'अपवा' वालियाँ छोटे-छोटे लिबास के बारे में हर वक्‍त सोचने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि उन्हें कोई आजमाए हुए नुस्खे बताए - आपके यहा पैंसठ-पैंसठ बरस की बुड्ढिया अपने पेट दिखाती हैं, मगर उन पर, मजाल है, जो एक भी झुर्री नजर आ जाए. मालूम नहीं, वह बच्‍चे मुह से पैदा करती हैं, या उन्हें कोई ऐसा गुर मालूम है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

बहरहाल, अगर आपको यहा छोटे कटे हुए लिबास चाहिए तो हाॅलीवुड के कुछ एक माहिरीन यहा भेज दीजिए - आपके यहा प्‍लास्टिक सर्जरी का फन तरक्‍की पर है. फिलहाल ऐसे आधा दर्जन सर्जन यहां भेज दीजिए, जो हमारी बुड्ढियों को लाल लगाम के काबिल बना दें.

और सुनिए - तुकांत शाइरी का जमाना था तो हमारे यहा माशूक की कमर ही नहीं थी. अब तुकांत शाइरी का दौर नहीं रहा, मगर यह ऐसा उलटा पड़ा है कि अब माशूक की गायब कमर कुछ इस तरह पैदा हुई है कि उसे देखो तो सारा माशूक उसके पीछे गायब नजर आता है. पहले यह हैरत होती थी कि वह कमर बंद कहा बाँधती है अब यह हैरत होती है कि वह किस पेड़ का तना है जिसके गिर्द गरीब कमरबंद को बाधने की कोशिश की गई है - आप मेहरबानी करके खुद यहा तशरीफ लाए और फौजी समझौता करने से पहले इस बात का फैसला करें कि यहा माशूक की कमर होनी चाहिए या नहीं, इसलिए कि फौजी नजरिए से यह बात बहुत अहमियत रखती है.

एक बात और - आपके फिल्‍मसाज हिंदुस्‍तानी फिल्‍म इंडस्‍ट्री में बहुत दिलचस्‍पी ले रहे हैं. यह हम बर्दाश्‍त नहीं कर सकते - पिछले दिनों ग्रेगरी पैक हिंदुस्‍तान पहुचा हुआ था. उसने फिल्‍म स्‍टार सुरैया के साथ तसवीर खिंचवाई और उसके हुस्‍न की तारीफ में जमीन-आसमान कुलावे मिला दिए. पिछले दिनों सुना था कि एक अमरीकी फिल्‍म प्रोड्यूसर ने नरगिस के गले में बाजू डालकर उसका चुम्‍मा भी लिया था - यह कितनी बड़ी ज्यादती है। हमारे पाकिस्‍तान की एक्‍ट्रेसें मर गई हैं क्‍या?

गुलशन आरा मौजूद है. यह अलग बात है कि उसका रंग तवे जैसा काला है और लोग उसे देखकर यह कहते हैं कि गुलशन पर आरा चला हुआ है, लेकिन है तो एक्‍ट्रेस ही. कई फिल्‍मों की हीरोइन है और अपने पहलू में दिल भी रखती है. सवीहा है. यह अलग बात है कि उसकी एक आंख थोड़ी-सी भैंगी है मगर आपके जरा-से ध्‍यान देने से ठीक हो सकती है.

यह भी सुना है कि आप हिंदुस्‍तानी फिल्‍म प्रोड्यूसरों को आर्थिक सहायता भी दे रहे हैं - चचाजान, यह क्‍या दोगलापन है। यानी जो भी लल्‍लू-पंजू आता है, उसको आप मदद देना शुरू कर देते हैं.

आपका ग्रेगरी पैक जाए जहन्‍नम में - माफ कीजिए, मुझे गुस्‍सा आ गया है - आप अपनी दो-तीन एक्‍ट्रेसें यहाँ भेज दीजिए, इसलिए कि हमारा इकलौता हीरो संतोष कुमार बहुत उदास है। पिछले दिनों वह कराची गया था तो उसने कोकाकोला की सौ बोतलें पीकर रीटा हैवर्थ को ख्वाब में एक हजार बार देखा.

मुझे लिपस्टिक के बारे में आपसे कुछ कहना है - वह जो किसप्रूफ लिपस्टिक आपने भेजी थी, हमारे ऊचे तबके में बिलकुल पसंद नहीं की गई. लड़कियों और बुड्ढियों का कहना है कि यह केवल नाम ही की किसप्रूफ है, लेकिन मैं समझता हू कि उनका किसिंग का तरीका ही गलत है. मैंने देखा है लोगों को यह शौक फरमाते हुए. ऐसा मालूम होता है कि तरबूज की फाक खा रहे हैं - आपके यहा एक किताब छपी थी, जिसका टाइटल 'बोसा लेने का फन' था, मगर माफ कीजिए, किताब पढ़कर आदमी कुछ भी नहीं सीख सकता. आप वहा से जल्‍दी हवाई जहाज द्वारा एक अमरीकी खातून भेज दीजिए जो हमारे ऊचे तबके को तरबूज खाने और चुम्‍मा लेने में फर्क समझाए, सही और अच्‍छे तरीके सुझाए. निचले और निचले तबके को यह फर्क बताने की कोई जरूरत नहीं, इसलिए कि वह इन तौर तरीकों से हमेशा बेखबर रहा है और हमेशा बेदिल रहेगा.

आपको यह सुनकर खुशी होगी कि मेरी पाचन शक्ति अब किसी हद तक आपके अमरीकी गेहूँ की आदी हो गई है. अब आपकी गेहू को हमारे यहा की आवोहवा रास आनी शुरू हो गई है, क्‍योंकि अब इसके आटे ने पाकिस्‍तानी स्‍टाइल की रोटियों और चपातियों की शक्‍ल अपनाने का इरादा कर लिया है - मेरा खयाल है, कि खैरअंदेशी के तौर पर आप यहाँ के गेहू का बीज अपने यहां मगवा लें. आपी मिट्टी बड़ी उपजाऊ है. इस मेल-जोल से जो अमरीकी-पाकिस्‍तानी गेहू पैदा होगा, बड़ी खूबियों से भरा हुआ होगा. हो सकता है, कोई नया आदम पैदा हो जाए जिस‍की औलाद हम और आपसे बिल्‍कुल अलग हो.

मैं आपसे एक राज की बात पूछता हूं - पिछले दिनों मैंने यह खबर पढ़ी थी कि नई दिल्‍ली में भारत की देविया रात को अपने बालों में छोटे-छोटे कुमकुमे लगाकर घूमती हैं, जो बैटरी से रौशन होते हैं. खबर में यह भी लिखा था कि बाज देविया अपने ब्‍लाउजों के अंदर भी ऐसे ही कुमकुमे लगाती हैं ताकि उनका अंदर-बाहर रौशन रहे - यह फसल कहीं आप ही की तो भेजी हुई नहीं थी? अगर थी तो चचाजान, सुब्‍हानल्‍लाह - मेरा खयाल है, अब आप उन्हें कोई पाउडर तैयार करके भेजें, जिसके खाने से उनका सारा बदन रौशन हो जाया करे और कपड़ों से बाहर निकल-निकल कर इशारे किया करे.

पंडित जवाहरलाल नेहरू पुराने खयालात के आदमी हैं. वह उस बापू के शागिर्द हैं, जिसने नौजवानों को यह हुक्‍म दिया था कि वह अपनी आखों पर ऐसा शेड या हुड इस्‍तेमाल किया करें जो उन्हें आख मटक्‍के से रोका करे. पिछले दिनों उन्‍होंने अपनी देवियों को उपदेश किया था कि वह अपने अंगों का खयाल रखा करें और मैकअप वगैरा से परहेज किया करें, मगर उनकी कौन सुनेगा - अलबत्ता हालीवुड की आवाज सुनने के लिए यह देविया हर वक्‍त तैयार हैं - आप पाऊडर वहा जरूर रवाना करें. पंडित जी का रद्देअमल काफी पुरलुत्फ होगा.

मैं इस लिफाफे में आपको एक तसवीर भेज रहा हूं. यह एक पाकिस्‍तानी खातून की है, जिसने बंबई की मछेरनों की चोली जैसा ब्‍लाउज पहना हुआ है. इसमें से उसके पेट का थोड़ा-‍सा निचला हिस्‍सा झाँक रहा है. यह आपकी महिलाओं के नंगे पेटों को एक मात्र पाकिस्‍तानी गुदगुदी पेश करने के इरादे से है.

गैर-कुबूल अजतरफ जहे-अजो-शर्फ

आपका बरखु़र्दार भतीजा

सआदत हसन मंटो

1954

31, लक्ष्‍मी मैन्‍शंज, हॉल रोड़ लाहौर.

हिंदी समय डॉट कॉम से साभार.

 

First published: February 13, 2017
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