कैफ़ी आज़मी की नज़्म सुनकर जब एक लड़की ने तोड़ दी थी अपनी मंगनी

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First published: January 14, 2017, 9:44 AM IST | Updated: January 14, 2017, 9:48 AM IST
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कैफ़ी आज़मी की नज़्म सुनकर जब एक लड़की ने तोड़ दी थी अपनी मंगनी
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कैफ़ी आज़मी का नाम हिन्दुस्तान के आलातरीन शायरों में शुमार किया जाता है. उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के एक छोटे से गांव मिजवां में सन् 14 जनवरी 1919 में जन्मे कैफ़ी साहब का मूल नाम अख्तर हुसैन रिज़वी था. कैफी आजमी के पिता उन्हें एक मौलाना के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन कैफी आजमी को उससे कोई सरोकार नहीं था और वह मजदूर वर्ग के लिए कुछ करना चाहते थे.

1942 मे कैफी आजमी उर्दू और फारसी की उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ और इलाहाबाद भेजे गए. लेकिन कैफी ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्यता स्वीकार कर पार्टी कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया और फिर अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हो गए. कैफ़ी साहब की रचनाओं में मज़लूमों का दर्द पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आता है.

मिजवां से जब धार्मिक तालीम के लिए लखनऊ भेजे गए तो धार्मिकता में आप ही आप सामाजिकता शामिल होती गई और इस तरह वह मौलवी बनते-बनते कॉमरेड बन गए. इस पहली वैचारिक तब्दीली के बाद उनकी सोच में कोई दूसरी तब्दीली नहीं आई. वह जब से कॉमरेड बने हमेशा इसी रास्ते पर चले और देहांत के वक़्त भी उनके कुर्ते की जेब में सीपीआई का कार्ड था.

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मज़लूमों के शायर थे कैफ़ी आज़मी

कैफ़ी की पूरी शायरी अलग-अलग लफ़्ज़ों में इन्हीं आंसुओं की दास्तान है. वह समाज के शोषित वर्ग के शायर थे. उसी के पक्ष में क़लम उठाते थे. उसी के लिए मुशायरों के स्टेज से अपनी नज़्में सुनाते थे.

जब कैफी की नज्म सुन एक लड़की ने तोड़ दी थी अपनी मंगनी

कैफ़ी आज़मी अपने अंदाज़ में महफिलों में छा जाते थे. वे जब कलाम पढ़ने के लिए बुलाए जाते तो पढ़ने के बाद पूरे मुशायरे को अपने साथ ले जाते थे. स्टेज से उनको सुनना एक अनुभव के समान था.

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हैदराबाद में एक मुशायरे में कैफ़ी की प्रस्तुति ने एक हसीना को किसी और के साथ अपनी मंगनी तोड़ने पर मजबूर कर दिया था. कैफ़ी अपनी मशहूर नज़्म औरत सुना रहे थे...

उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे

क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं

तुझमें शोले भी हैं बस अश्क फिशानी ही नहीं

तू हक़ीकत भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं

तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं

अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे

उठ मेरी जान...

11 साल की उम्र में शुरू कर दी थी शायरी

कैफ़ी आज़मी ने शायरी 11 साल की उम्र में शुरू की. उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल जब गांव की एक महफ़िल में सुनाई तो उनकी उम्र को देखते हुए किसी को यक़ीन नहीं आया कि यह उन्हीं की लिखी हुई है. 11 साल की उम्र में कही हुई यह ग़ज़ल बेगम अख़्तर की आवाज़ में पूरे देश में मशहूर हो चुकी है.

कैफ़ी की उस पहली ग़ज़ल का मतला है-

इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल पड़े

हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

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फिल्मी गानों में भी नाम कमाया

उनके लिखे गीतों ने साहिर की तरह उन्हें यश भी दिलाया और नाम भी कमाया. गीतकारी के अलावा उन्होंने फ़िल्मों के लिए पटकथाएँ भी लिखीं. इसमें ‘गर्म हवा’ ख़ास है.

कैफ़ी आज़मी की शायरी

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए

इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए

बस इक झिजक है यही हाल-ए-दिल सुनाने में

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले

उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

मेरा बचपन भी साथ ले आया

गाँव से जब भी आ गया कोई

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था

जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा

कैफ़ी आज़मी की ग़ज़लें

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क

यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

इक तुम कि तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है

इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े

साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर

मय है उसी की नाम पे जिस के उबल पड़े

मुद्दत के बा'द उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह

जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता

मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं

वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है

उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं

तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को

तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो

आँखों में नमी हँसी लबों पर

क्या हाल है क्या दिखा रहे हो

बन जाएँगे ज़हर पीते पीते

ये अश्क जो पीते जा रहे हो

जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है

तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो

रेखाओं का खेल है मुक़द्दर

रेखाओं से मात खा रहे हो

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा

बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का

सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा

गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे

ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा

बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा

लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का

सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा

गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे

ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा

कैफ़ी आज़मी के फिल्मी गीत

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया

कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया (फ़िल्म : हकीकत- 1964 )

चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था, सरे राह चलते-चलते

वहीं थम के रह गई है, मेरी रात ढलते-ढलते (फ़िल्म : पाकीजा-1972)

जीत ही लेंगे बाज़ी हम-तुम, खेल अधूरा छूटे ना

प्यार का बन्धन, जन्म का बन्धन, जन्म का बन्धन टूटे ना (फ़िल्म : शोला और शबनम-1962)

ये दुनिया, ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं

किसको सुनाऊँ हाल दिल-ए-बेक़रार का

बुझता हुआ चराग़ हूँ अपने मज़ार का

ए काश ! भूल जाऊँ, मगर भूलता नहीं

किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का (फ़िल्म : हीर-राँझा-1970)

धीरे धीरे मचल ऐ दिल-ए-बेक़रार

कोई आता है

यूँ तड़प के न तड़पा मुझे बालमा

कोई आता है

धीरे धीरे ... (फ़िल्म : अनुपमा-1966)

अब्बा के लिए हमारी श्रद्धांजलि

दिवंगत शायर और लेखक-गीतकार कैफी आजमी का परिवार शनिवार को उनके 98वें जन्मदिन पर एक संगीतमय शाम आयोजित कर रहा है. संगीतमय शाम का आयोजन यहां जुहू स्थित उनके आवास जानकी कुटीर पर होगा.

कैफी की बेटी और अभिनेत्री शबाना आजमी ने कहा, "कैफी और शौकत का निवास स्थान रहे 25, जानकी कुटीर का हर कोना फिल्म, रंगमंच, संगीत के कलाकारों और शायरों द्वारा बिताई गईं शामों की स्मृतियों से भरा पड़ा है. यह मेरे अब्बा के लिए मेरे भाई बाबा की श्रद्धांजलि है और युवा कलाकारों के लिए एक सुंदर अवसर."

इस आयोजन में अनु मलिक, ललित पंडित, राजू सिंह जैसे संगीतकार प्रस्तुतियां देंगे. संगीत संध्या में सुनिधि चौहान, अलका याग्निक, हरिहरन, रूप कुमार-सोनाली राठौड़, तलत अजीज जैसे गायकों के साथ कई नए गायक भी अपनी प्रस्तुतियां देंगे.

शबाना ने कहा, "यह एक खुला मंच है और जानकी कुटीर में बड़ा कार्यक्रम है. सभी के लिए गद्दे पर बैठने की व्यवस्था है और लोग नमकीन के साथ कटिंग 'चाय' और वड़ा-पाव का लुत्फ भी उठा सकेंगे. परिवार के लिए यह एक भावुक शाम होगी."

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