फिल्म समीक्षा: 'ओके जानू’ टाटा बाय बाय...!

दीपक दुआ | News18India.com
Updated: January 13, 2017, 5:11 PM IST
फिल्म समीक्षा: 'ओके जानू’ टाटा बाय बाय...!
आज की युवा पीढ़ी, एक तरफ रिश्ते दूसरी तरफ करियर। एक तरफ प्यार दूसरी तरफ सपने। इससे जुड़ें या उसको लपकें।
दीपक दुआ | News18India.com
Updated: January 13, 2017, 5:11 PM IST
नई दिल्ली। आज की युवा पीढ़ी, एक तरफ रिश्ते दूसरी तरफ करियर। एक तरफ प्यार दूसरी तरफ सपने। इससे जुड़ें या उसको लपकें। इससे बंधें या उस तरफ दौड़ लगाएं। युवाओं की इस कन्फ्यूजन को लेकर अब तक 256 दफा तो फिल्में बन ही चुकी होंगी। तो फिर इस फिल्म में नया क्या है? जवाब है-कुछ नहीं। कुछ तो नया होगा-कहानी, पटकथा, प्रेजेंटेशन, भावनाएं, सीख, सैटअप...? अजी बोला न-कुछ भी नया नहीं है इसमें।

इससे पहले शाद अली मणिरत्नम निर्देशित तमिल फिल्म ‘अलाइपायुदे’ को हिन्दी में ‘साथिया’ नाम से बना चुके हैं। ये दोनों ही फिल्में उम्दा थीं। लेकिन ‘ओके जानू’ मणिरत्नम की जिस ‘ओ काधल कनमणि’ पर बनी है वह हिट होने के बावजूद कोई बहुत बेहतरीन फिल्म नहीं थी। शाद ने या इसके निर्माताओं करण जौहर और मणिरत्नम ने इसमें हिन्दी के दर्शकों के लिए क्या खास देख कर इसके रीमेक के लिए जुगत लड़ाई, यह वही बेहतर बता सकते हैं।

‘हम दोस्ती करेंगे, सेक्स करेंगे, लेकिन एक-दूसरे पर हक नहीं जताएंगे और शादी नहीं करेंगे’ का नारा बुलंद करके एक-दूसरे के करीब आने वाले लड़के-लड़की के बीच प्यार उपजने और फिर शादी करने की बासी कढ़ी को यहां धीमी आंच पर उबाला गया है। बस, यही धीमी आंच ही इस फिल्म की सबसे बड़ी दुश्मन है, जो इस कढ़ी को कायदे से उबलने ही नहीं देती। फिल्म इस कदर सपाट है कि थोड़े ही वक्त के बाद इससे उकताहट होने लगती है। बीच-बीच में होठों पर हल्की मुस्कुराहटें जरूर आती रहती हैं और एक बड़ी बात यह भी कि यह फिल्म कहीं फूहड़ नहीं होती, सिवाय ‘हम्मा हम्मा...’ वाले उस गाने के जिसमें आदित्य और श्रद्धा ने बेहद घटिया डांस किया है। मणिरत्नम की ही ‘बॉम्बे’ में ए.आर. रहमान के बनाए ‘हम्मा हम्मा...’ वाले गाने को इतने घटिया तरीके से रीमिक्स करने की बजाय यहां जस का तस रख दिया जाता तो कहीं बेहतर होता।
आदित्य राय कपूर और श्रद्धा कपूर की लव-स्टोरी से बेहतर तो पर्दे पर नसीरुद्दीन शाह और लीला सैमसन की प्रेम-कहानी लगती है। इन दोनों ने काम भी बहुत खूब किया है। प्यारे तो आदित्य और श्रद्धा भी लगे हैं, लेकिन इनके किरदारों में ही दम नहीं था तो ये बेचारे उसमें कहां से जान डालते। गुलजार-रहमान की जोड़ी का बनाया गीत-संगीत भी साधारण रहा है और एक-दो को छोड़ बाकी गाने आकर कहानी की पहले से ही धीमी रफ्तार को और मंद करते हैं। साल की इस पहली बड़ी फिल्म पर पैसे और वक्त लगाने की बजाय इसे दूर से ही ओके, टाटा, बाय-बाय करने में ही समझदारी होगी।

रेटिंग-दो स्टार



(वरिष्ठ फिल्म समीक्षक व पत्रकार दीपक दुआ 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय हैं। मिजाज से घुमक्कड़। सिनेमा विषयक लेख, साक्षात्कार, समीक्षाएं व रिपोर्ताज लिखने वाले दीपक कई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखते हैं और रेडियो व टीवी से भी जुड़े हुए हैं।)
First published: January 13, 2017
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