रिव्यू: नए सिक्वल का रास्ता खोलती है ‘द डार्क नाइट राइजेज’

राजीव मसंद

Updated: July 21, 2012, 8:18 AM IST
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नई दिल्ली। अगर आप ‘द डार्क नाइट राइजेज’ को पूरी तरह से सराहना चाहते हैं तो फिर आप ‘बैटमैन बेगिन्स’ की यादों को ताजा कर लें क्योंकि क्रिस्टोफर नोलान की बैटमैन ट्रायोलॉजी के इस आखिरी चैप्टर में 2005 की उस फिल्म के मुख्य प्लॉट और उसके किरदारों का अच्छा खासा इस्तेमाल किया गया है। अच्छा होगा अगर आपको नोलान की 2008 का सीक्वल ‘द डार्क नाइट’ में से कुछ भी याद ना हो क्योंकि वैसे तो ‘द डार्क नाइट राइजेज’ पूरी तरह से एक अच्छी फिल्म है पर ये ‘द डार्क नाइट’ नहीं है जो अब तक की सबसे अच्छी सुपरहीरो फिल्म कही जा सकती है।

पिछली फिल्म के मुकाबले यह फिल्म कुछ कमजोर लगती है जिसकी सबसे बड़ी वजह है फिल्म का विलेन बेन यानि टॉम हार्डी जो ‘द डार्क नाइट’ के जोकर हेल्थ रेजर के आस-पास भी नहीं है। बेन देखने में डरावना जरूर है पर वो ‘द डार्क नाइट’ के जोकर से बहुत ही अलग है। पर अगर हम तुलना से हट कर बात करें तो ‘द डार्क नाइट राइजेज’ की कहानी बखूबी पर्दे पर उतारी गई है और इसका अंत एक अच्छी खासी सीरीज का रास्ता खोलता है।

फिल्म की शुरुआत होती है ‘द डार्क नाइट’ के खत्म होने के बाद से जहां जोकर को हराने और हार्वे डेंट को मारने के बाद बैटमैन गोथाम गायब हो जाता है और बदतमीज वेन अपने भरोसेमंद बटलर अल्फ्रेड के आगे अफसोस जताता है कि दुनिया को बैटमैन की जरूरत नहीं रही। 2 घंटे 45 मिनट की ये फिल्म आराम से आगे बढ़ती है। ‘द डार्क नाइट राइजेज’ आर्थिक मंदी और अतंकवाद जैसी थीम के साथ खेलती नजर आती है। पर फिर भी ये अहम मुद्दे इसमें अच्छी तरह से नहीं पेश किए गए हैं।

ये नई फिल्म इतनी संजीदा बनाई गई हैं कि इसमें हंसी मजाक की कोई भी जगह नहीं। फिल्म में जो आपका ध्यान सबसे ज्यादा खींचता है वो है ब्रूस वेन और शातिर चोर सेलिना केली यानि एन्ने हाथवे के बीच की बातचीत। फिल्म में कई सारी स्टोरी लाइंस हैं जो काफी उलझी हुई हैं फिर भी नोलान एक अच्छी फिल्म देते हैं। ‘द डार्क नाइट राइजेज’ एक संतोषजनक फिल्म कही जा सकती है। मैं ‘द डार्क नाइट राइजेज’ को पांच में से साढ़े तीन स्टार देता हूं। आप इससे ज्यादा उम्मीद ना रखें तो आप निराश नहीं होंगे।

First published: July 21, 2012
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