31 अक्टूबर में श्रद्धांजलि कम, प्रॉपोगेंडा ज्यादा... पढ़ें रिव्यू

शिखा धारीवाल | News18India.com

Updated: October 21, 2016, 12:36 PM IST
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नई दिल्ली। 31 अक्टूबर फिल्म 1984 में हुए सिख दंगों के बीच दिल्ली के तिलक नगर इलाके में रहने वाले एक सिख परिवार की है। इससे ज्यादा इस फिल्म की कहानी के बारे में बताने लायक कुछ भी नहीं है। हां, पंजाब चुनावों को ध्यान में रखकर बनाई गई इस फिल्म का प्रचार प्रसार करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए गए। जैसे फिल्म की हीरोइन सोहा अली खान ने कुछ सिख संगठनों और बीजेपी के नेताओं के साथ मिलकर एक कैंडल मार्च निकाला। कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर से मिलते-जुलते किरदार का एक वीडियो जारी किया गया, जिसमें उसे दंगे भड़काते दिखाया गया है।

हालांकि, करीब 1 घंटे 42 मिनट लंबी यह फिल्म नहीं बल्कि एक बेहद उबाऊ और थका देने वाली डॉक्युमेंट्री लगती है। इस फिल्म में कमियां ही कमियां हैं। इंदिरा गांधी की हत्या से शुरू होने वाली इस फिल्म में दंगों को तो दिखाया गया है मगर कहानी की कमी से इसमें इमोशन नहीं आ सके हैं। मराठी फिल्म ‘दाग’ के लिए नेशनल अवॉर्ड जीत चुके डायरेक्टर शिवाजी लोटन पाटिल इस काम में फेल हुए हैं।

BTDD FILM REVIEW के फॉर्मूले पर इस फिल्म की अच्छाईयों और कमियों की तुलना में हमने ये पाया कि सोहा अली खान और वीरदास के अभियन की थोड़ी तारीफ की जा सकती है। मगर कहानी की कमी, खराब निर्देशन, खराब प्रॉडक्शन, बार-बार दंगों के एक जैसे दृश्य और इमोशन की कमी की वजह से फिल्म 31 अक्टूबर को पांच में सिर्फ आधे अंक मिलते हैं।

हालांकि इस विषय पर एक बेहतरीन और ताकतवर फिल्म बनाई जा सकती थी। मगर यह फिल्म 1984 के दंगा पीड़ितों को श्रद्धांजलि कम और कांग्रेस को कोसने का राजनीतिक प्रॉपोगेंडा ज्यादा लगती है। मगर इस काम में यह फेल है। तो पैसे वक्त और दिमाग एक साथ बर्बाद ना करें और वैसे भी दंगों में घर से बाहर नहीं निकला जाता।

First published: October 21, 2016
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