फ़िल्म रिव्यू: 'हाफ़ गर्लफ्रेंड', बोरिंग से थोड़ा ज़्यादा, लॉजिक से काफ़ी कम

Moulshree Kullkarni | News18Hindi
Updated: May 19, 2017, 6:10 PM IST
फ़िल्म रिव्यू: 'हाफ़ गर्लफ्रेंड', बोरिंग से थोड़ा ज़्यादा, लॉजिक से काफ़ी कम
एक लड़का और एक लड़की मिलते हैं, फिर बिछड़ते हैं, फिर मिलते हैं, फिर बिछड़ते हैं, फिर मिलते हैं और फिर आप अपने बाल नोचने लगते हैं. image: official poster
Moulshree Kullkarni | News18Hindi
Updated: May 19, 2017, 6:10 PM IST
फ़िल्म: हाफ़ गर्लफ्रेंड

निर्देशक: मोहित सूरी

लेखक: चेतन भगत

कलाकार: श्रद्धा कपूर, अर्जुन कपूर, सीमा बिस्वास, विक्रांत मैसी

रेटिंग: 2.5 स्टार

आखिरकार चेतन भगत के नॉवेल पर बनी एक और फ़िल्म रिलीज़ हो गई. 'हाफ़ गर्लफ्रेंड', अगर आपको फ़िल्म का नाम याद नहीं रहता तो घबराने की कोई बात नहीं है क्योंकि पूरी फ़िल्म में आपको पचासों बार यह 'हाफ़' शब्द बार-बार रटाया गया है, जैसे 'हाफ़ कोर्ट', 'हाफ़ किराया', 'हाफ़ रास्ता' और 'हाफ़ गर्लफ्रेंड'.

चेतन भगत की नॉवेल पढ़ने वालों के लिए इस फ़िल्म में कोई सरप्राइज नहीं होगा और ना पढ़ने वालों को समझ आ जाएगा कि चेतन की नॉवेल पढने से बेहतर है उन पर बनी फ़िल्में देखना.

फ़िल्म में एक चीज़ जो सबसे ज़्यादा परेशान करती है वो ये है कि यह फ़िल्म 90 के दशक की कई फ़िल्मों की याद दिलाती है. जिन फ़िल्मों में जुनून और दीवानगी को प्यार बताकर परोसा जाता था. फ़िल्म में प्यार का मतलब है लड़की का पीछा करना, चीखना-चिल्लाना और दीवानेपन में उसपर हाथ भी उठाना. और फ़िर कहना, 'मैं फिर भी तुमको चाहूंगा'!

कहानी

फ़िल्म की कहानी को बहुत ही आसान भाषा में ऐसे समझ लीजिए. एक लड़का और एक लड़की मिलते हैं, फिर बिछड़ते हैं, फिर मिलते हैं, फिर बिछड़ते हैं, फिर मिलते हैं और फिर आप अपने बाल नोचने लगते हैं.

'हाफ़ गर्लफ्रेंड' 3 शहरों की कहानी है. अर्जुन कपूर उर्फ़ माधव झा बिहार के एक छोटे से गांव से है. उसकी हिंदी में बिहारी लहज़ा मिक्स है और इंग्लिश में हाथ टाइट है. सोशियोलॉजी पढ़ने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफंस कॉलेज में एडमिशन लेने आता है.

इंटरव्यू के दौरान जब एडमिशन बोर्ड के सदस्य उसके बिहारी होने का मजाक उड़ाते हैं, माधव एक इमोशनल सी स्पीच देता है और हर कोई उसका दीवाना हो जाता है.

कॉलेज के पहले ही दिन उसे रिया सोमानी दिखती है. बास्केट बॉल खेलती हुई. माधव झा उसे देखकर ही उसका दीवाना हो जाता है.  माधव भी बास्केट बॉल में चैंपियन है. बास्केट बॉल कोर्ट में ही माधव और रिया की दोस्ती होती है. 'दोस्ती'.

लेकिन माधव तो शादी और बच्चों तक की प्लानिंग कर चुका है. रिया से आए दिन एक ही सवाल पूछता है, 'आखिर लगते क्या हैं हम तुम्हारे? क्या रिश्ता है हमारा?', क्योंकि फ़िल्म के हिसाब से आपको हर रिश्ते को नाम देने की सख्त ज़रुरत होती है. अगर आप दोस्त हैं तो आपका रिश्ता सिर्फ़ टाइमपास है!

माधव रिया से कहता है कि वह भी 'हाफ़ रास्ते' आगे बढ़ आए. रिया बढ़ती है. वो माधव की 'हाफ़ गर्लफ्रेंड' बन जाती है.

माधव के दोस्त उसके लिए जान छिड़कते हैं, रिया के लिए बुरा-भला कहते हैं, रिया माधव के लिए 'सीरियस' है या नहीं यह पता लगाने के लिए माधव को उसे अपने कमरे में बुलाने को कहते हैं.

यह दर्शकों के लिए बहुत ही awww वाला लम्हा होता है. क्योंकि फ़िल्म के हिसाब से 'दोस्ती' का असली मतलब लड़की को कोसना ही होता है. लेकिन जब रिया अपने घर-परिवार और अकेलेपन से परेशान होकर माधव में एक दोस्त ढूंढती है, तो वह उसको सिर्फ़ 'यूज़' करती है.

रिया सोमानी अपने मां-बाप के रिश्तों से परेशान है. बाप मां पर हाथ उठाता है, मां की बेईज्ज़ती करता है. रिया अपने पेरेंट्स के रिश्ते की परेशानियों से भागना चाहती है. और भागकर म्यूज़िक में डूब जाती है.

रिया को भागने की आदत है. अपने परिवार से, खुद से, शहर से, प्यार से. रिया के चले जाने के बाद माधव बिहार वापस आ जाता है. वहां उसकी मां एक स्कूल चलाती हैं. माधव स्कूल में लड़कियों के लिए टॉयलेट्स बनवाना चाहता है.

दुनिया का सबसे अमीर आदमी बिल गेट्स बिहार के विकास के लिए किसी गांव को ग्रांट देना चाहता है. माधव भी अप्लाई करता है. यहां एक बार फिर उसको रिया मिलती है.

माधव के गांव में बिल गेट्स गांव आता है. बिल गेट्स क्या, एक विदेशी आदमी, जिसके चेहरे पर ग्राफ़िक्स की मदद से बिल गेट्स का चेहरा चिपका दिया गया है. इससे तो बेहतर था कि किसी को बिल गेट्स का मुखौटा ही लगा देते.

माधव चूंकि हीरो है, उसको ग्रांट मिलनी ही थी, सो मिल जाती है. रिया फिर भाग जाती है. माधव को चिट्ठी मिलती है, रिया को कैंसर है और वो मरने वाली है.

माधव बदहवास सा हर जगह रिया को ढूंढता है. न्यूयॉर्क जाता है. वहां भी कई महीने ढूंढने के बाद रिया उसे मिल जाती है. क्योंकि उसको कोई कैंसर-वैंसर नहीं था. वह तो बस भागने का बहाना तलाश रही थी. माधव फिर उसे ढूंढ निकालता है. और फिर हैप्पी एंडिंग.

इस फ़िल्म में सिर्फ़ फीलिंग्स हैं, कोई लॉजिक नहीं है, कोई कहानी नहीं है.

लेकिन एक बात के लिए फ़िल्म के डायरेक्टर की तारीफ करनी चाहिए कि यह फ़िल्म कहीं भी धीमी नहीं पड़ती. इसकी स्पीड ही उसकी जान बचाए रखती है.

फ़िल्म के डायलॉग्स अति रोमांटिक हैं. लेकिन चूंकि यह प्रेम कहानी है, इतनी तो रियायत दी जा सकती है. फ़िल्म की कहानी के लिए हम इसको दे रहे हैं 2 स्टार.

म्यूज़िक

फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर बहुत अच्छा है. मिथुन का संगीत बहुत खूबसूरत फीलिंग से लैस होता है. 'तू थोड़ी देर और ठहर जा' श्रेया घोषाल की आवाज़ में पूरी फ़िल्म के दौरान बजता है. लेकिन इस गाने से ज़्यादा खूबसूरत लगा है इसी का इंग्लिश वर्जन 'स्टे अ लिटिल लॉन्गर' जिसे अनुष्का साहनी ने गया है. अरिजीत सिंह की आवाज़ में 'मैं फिर भी तुमको चाहूंगा' पिछले काफ़ी समय से ट्रेंड कर रहा है. इस फ़िल्म के गानों के लिए इसे 3 स्टार दिए जा सकते हैं.

एक्टिंग
अर्जुन कपूर का बिहारी एक्सेंट कहीं-कहीं असली लगता है कहीं बिलकुल बनावटी. हालांकि जुनून और पागलपन के सीन्स में उनके एक्सप्रेशन बहुत जेन्युइन लगते हैं.

श्रद्धा कपूर की एक्टिंग में कुछ भी नया नहीं है. 'आशिक़ी 2' और 'ओके जानू' वाली श्रद्धा ही आपको 'हाफ़ गर्लफ्रेंड' में नज़र आती हैं.

अर्जुन कपूर की मां के किरदार मेंसीमा बिस्वास हैं. सीमा की एक्टिंग पर यकीन करने का सबसे ज़्यादा मन करता है. छोटे से रोल में भी वह बहुत नेचुरल लगती हैं. महारानी और स्कूल की प्रबंधक और अकेली मां के किरदार में वह बहुत मज़बूत लगी हैं.

लेकिन जिस किरदार ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है वह है माधव का दोस्त शैलेश यानि विक्रांत मैसी. विक्रांत को इससे पहले 'लुटेरा', 'दिल धड़कने दो' और टीवी के कई शोज़ में देखा जा चुका है. बिहारी दोस्त और अमेरिकी पति का किरदार उन्होंने बहुत ख़ूब निभाया है.

एक्टिंग के लिए इस फ़िल्म को हम 3 स्टार दे रहे हैं.

सिनेमेटोग्राफी

फ़िल्म में रंग बहुत खूबसूरत हैं. इंडिया गेट के ऊपर से दिल्ली बहुत खूबसूरत लगती है. दिल्ली का सेंट स्टीफेंस कॉलेज और बिहार का सरकारी स्कूल. दोनों अपनी पहचान बनाते हैं. लेकिन बिल गेट्स के लिए किसी गोरे आदमी के चेहरे पर ग्राफ़िक्स लगाकर फ़िल्म ने अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है. सिनेमेटोग्राफी के लिए हम इसको देते हैं 2 स्टार.

कुल मिलाकर

फ़िल्म में लॉजिक की कमी है. फ़िल्म देखकर सेना के अधिकारियों को चकमा देकर आप इंडिया गेट की छत पर पहुंचने कोशिश ना ही करिएगा. यह एक खतरनाक सौदा हो सकता है.

पिछले कुछ समय से बॉलीवुड ने कुछ बेहतरीन फ़िल्में बनाई हैं. इन फ़िल्मों में रिश्तों को देखने का तरीका भी काफ़ी बदला है. लेकिन 'हाफ़ गर्लफ्रेंड' ने इंडस्ट्री को फिर एक दशक पीछे पहुंचा दिया है.

स्टीरियोटाइप तोड़ने की कोशिश करती इस फ़िल्म ने दिल्ली और बिहार के लोगों के लिए नए स्टीरियोटाइप बना दिए हैं. 'लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते,' ये आग मोहनीश बहल 30 साल पहले लगा गए. 'हाफ़ गर्लफ्रेंड' ने उस आग में पापड़ सेंककर खाए हैं.

लेकिन इस लवस्टोरी में सिर्फ़ वही लम्हें रोमांटिक लगे हैं जहां किसी भी दीवानगी से दूर रिया और माधव ने दिल खोलकर बातें की हैं. कुल मिलाकर इस फ़िल्म को हम दे रहे हैं 2.5 स्टार्स.
First published: May 19, 2017
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