इस शख्स के दिमाग से 35 साल पहले निकले 'मोटू-पतलू'

स्मिता चंद | News18India.com
Updated: October 15, 2016, 9:11 AM IST
इस शख्स के दिमाग से 35 साल पहले निकले 'मोटू-पतलू'
अभी तक जिस कैरेक्टर को लोग टीवी पर देखते थे और दशकों से कॉंमिक्स में पढ़ते रहे हैं, उसने अब रुपहले पर्दे पर भी एंट्री मार ली है।
स्मिता चंद | News18India.com
Updated: October 15, 2016, 9:11 AM IST
नई दिल्ली। बच्चों के फेवरेट कार्टून कैरेक्टर मोटू-पतलू अब बड़े पर्दे पर धमाल मचाने आ गए हैं। अभी तक जिन कैरेक्टर को लोग टीवी पर देखते थे और दशकों से कॉंमिक्स में पढ़ते रहे हैं, उन्होंने अब रुपहले पर्दे पर भी एंट्री मार ली है। पहले दिन फिल्म को रिस्पॉंन्स भी अच्छा मिला है। इस मौके पर आईबीएनखबर ने बात की उस शख्स से जिसके दिमाग से ये कैरेक्टर उपजे। मशहूर डायरेक्टर, कार्टूनिस्ट और स्क्रिप्ट राइटर हरविंदर मनकर से बातचीत कर उनसे ये जानने की कोशिश की गई कि आखिर कैसे लोगों के दिलों में छा गए मोटू-पतलू जैसे किरदार।

सवाल: आपको मोटू-पतलू पर फिल्म बनाने का आइडिया कैसे आया?

हरविंदर मनकर: मैंने 35 साल पहले इस कैरेक्टर को ईजाद किया था। लोटपोट के माध्यम से सालों से लोगों के दिल में ये कार्टून कैरेक्टर राज कर रहे हैं। मैं कार्टून भी बनाता हूं और लिखता भी हूं, मोटू पतलू देश के पहले ऐसे कैरेक्टर हैं, जो इतने सालों से प्रिंट में एक कॉमिक के रूप में आ रहे हैं। वो ऐसे पहले कैरेक्टर हैं, जिसको हम मपेट और पपेट के रूप में भी लेकर आए। पहले 2 डी और फिर 3 डी में भी मोटू पतलू आया। एक क्रिएटर के तौर पर मुझे लगता है कि मोटू पतलू ऐसे कैरेक्टर हैं, जो हर इंसान पसंद करता है, आज के बच्चे भी इसे देखते हैं और बच्चों के मां बाप भी बचपन में कॉमिक्स के रूप में पढ़ चुके हैं, इसलिए वो भी इसे देखना पसंद करते हैं। मुझे लगता है कि भारत में एक ये ही ऐसा कैरेक्टर है, जिसे बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी बैठकर देखते हैं। इस फिल्म में हमने जानवरों के प्रति प्यार को भी दर्शाया है, इसमें रिश्तों की अहमियत भी बताई है।

सवाल: आज कॉमिक्स की सेल में गिरावट आई है, आज के दौर में पढ़ने के प्रति रुचि कम हुई है, अब तो मोबाइल भी किसी टीवी से कम नहीं है?

हरविंदर मनकर: जाहिर तौर पर पहले से कॉमिक्स पढ़ने वालों की संख्या तो घटी हैं, लेकिन आज भी हमारी लोटपोट की 80 से 90 हजार प्रतियां छपती हैं और वो बिक जाती हैं, इसका मतलब तो ये है कि बच्चे आज भी पढ़ते हैं। खासतौर पर कस्बों में लोग पढ़ना पसंद करते हैं। अगर लोग नहीं पढ़ते तो क्या इतनी सारी मैग्जीन छपती? हां, सेल कम हुआ है, लेकिन बच्चे ऑनलाइन भी लोटपोट पढ़ते हैं और पसंद करते हैं।

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सवाल: पहले मिकी माऊस, डक टेल्स और अब डोरेमॉन और शिनचैन, हमारे यहां हमारी सामाजिक पृष्ठभूमि के कार्टून कैरेक्टर क्यों लोकप्रिय नहीं हुए?

हरविंदर मनकर: हमारे कैरेक्टर अब धीरे-धीरे मशहूर हो रहे हैं, हां पहले ऐसा नहीं था क्योंकि हमारी टेक्नॉलॉजी इतनी स्मार्ट नहीं थी, हमारे यहां एनिमेशन फिल्में इतनी नहीं बनती थीं क्योंकि हमारे यहां इतना बजट नहीं था। इसलिए दूसरे विदेशी कैरेक्टर मशहूर हो गए, लेकिन अब छोटा भीम, मोटू पतलू जैसे कैरैक्टर धीरे-धीरे हिट होने लगे हैं। 90 के दशक में हमने नूतन कॉमिक और अमर चित्रकथा के जरिए भारतीय ऐतिहासिक चरित्रों को जिया। कुछ साल पहले इतनी चीजें नहीं हुआ करती थीं, लेकिन आज के दौर में माता-पिता की सोच बदल गई है वो बच्चों को कॉमिक्स भी पढ़ाते हैं और फिल्म भी दिखाते हैं। पहले कॉमिक्स को टाइम पास माना जाता है, लेकिन अब माता-पिता खुद खरीदकर बच्चों को देते हैं कि वो पढ़ें। विदेशी कार्टून में हिंसा होती है, लेकिन भारतीय कार्टून में ऐसा नहीं होता है। हमारे मोटू पतलू की ये खासियत है कि इसमें बच्चों को संस्कार भी सिखाया जाता है, जिसे माता-पिता और दादा-दादी भी साथ बैठकर देखते हैं।

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सवाल: क्या कार्टून फिल्में महानगरीय बच्चों के लिए ही बनाई जाती हैं, क्या छोटे शहरों में रिस्पॉन्स मिलता है?

हरविंदर मनकर: धीरे-धीरे वक्त बदल रहा है, अब छोटे शहरों में भी सिंगल सिनेमा में ऐसी फिल्में चलती हैं, मैं खुद सर्वे देखता हूं और गोरखपुर जैसे छोटे शहरों में भी किसी ना किसी तरह से लोगों तक ये फिल्में पहुंच ही जाती हैं। हां मैं मानता हूं कि उस हद तक सफलता नहीं मिलती है, लेकिन 2-3 सालों में ऐसा वक्त भी आएगा, जब हमारे देश में भी कार्टून फिल्मों का बड़ा मार्केट होगा।

सवाल: छोटा भीम आई, लेकिन जंगल बुक जैसी सफलता नहीं मिली, मोटू-पतलू को दर्शक क्यों पसंद करेंगे?

हरविंदर मनकर: जंगल बुक के मशहूर होने की वजह है कि लोग उसे कई सालों से जानते हैं, जंगल-जंगल बात चली है, ये गाना सालों से मशहूर हैं, इसका फायदा फिल्म को मिला। लेकिन बहुत जल्द ऐसा भी वक्त आएगा, जब मोटू-पतलू और छोटा भीम जैसी फिल्में भी उतनी ही चलेंगी।

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सवाल: आप बॉलीवुड से लंबे समय से जुड़े हुए हैं, कई बड़े बजट की एड फिल्मों के भी आपके पास प्रोजेक्ट्स रहे हैं, आपको लगता है कि भारतीय दर्शक और फिल्म इंडस्ट्री कार्टून, एनिमेशन और थ्रीडी फिल्मों के निर्माण के प्रति जागरूक हुई है?

हरविंदर मनकर: एनिमेशन और थ्रीडी फिल्मों का अरबों का कारोबार है, ये एक बड़ी इंडस्ट्री बन चुकी है। अब हिंदी फिल्मों में भी एनिमेशन और स्पेशल इफेक्ट का जमकर इस्तेमाल होने लगा है। लोग भी इसे पसंद करते हैं।
First published: October 15, 2016
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