यहां लाइट-कैमरा-एक्शन को खा गया कर्फ्यू-फायरिंग और टेरर अटैक!

स्मिता चंद | News18India.com

Updated: January 19, 2017, 12:48 PM IST
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नई दिल्ली। बॉलीवुड के रुपहले पर्दे की सुंदरता को कश्मीर की वादियां चार चांद लगाती रहीं हैं। डल झील के शिकारे में शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर के  रोमांस से लेकर  'बजरंगी भाईजान' के सलमान खान तक.  की  फिल्मों में यहां की खूबसूरती को बखूफी दर्शाया गया है।  लेकिन क्या आपने कभी किसी कश्मीरी फिल्म के बारे में सुना है? क्या‍ कभी उन कश्मीरी निर्देशकों और फिल्म निर्माताओं की फिल्में देखी हैं, जिन्होंने कर्फ्यू के सन्नाटों, गोलियों और बमों की बौछारों से अंधेरों में घिरी कश्मीर की वादियों में किसी फिल्म को शूट किया हो।

हिंसा की काली घटाओं के बीच कश्मीर की कला, संस्कृति और भाषा में रची-बसी कहानियों को इन निर्देशकों ने अपनी फिल्मों में दर्शाया, लेकिन इनकी बदकिस्मती ऐसी है कि उनकी फिल्में यूट्यूब और इंटरनेट पर सिमट कर रह गईं। उनको एक थिएटर भी नसीब नहीं हुआ कि वो अपनी फिल्में रिलीज कर सकें।

यहां लाइट-कैमरा-एक्शन को खा गया कर्फ्यू-फायरिंग और टेरर अटैक!
क्या‍ कभी उन कश्मीरी निर्देशकों और फिल्म निर्माताओं की फिल्में देखी हैं, जिन्होंने कर्फ्यू के सन्नाटों, गोलियों और...

बॉलीवुड के बड़े-बड़े डायरेक्टर-प्रोड्यूसर कश्मीर में जाकर फिल्में बनाते हैं और अरबों रुपए कमाते हैं, लेकिन कश्मीर के कई कलाकार और निर्माता एक-एक पैसे के मोहताज हैं। ये लोग अपनी जेब से पैसे लगाकर फिल्में बना भी लेते हैं और उनमें से कई फिल्मों को अवॉर्ड भी मिल जाते हैं, लेकिन कोई कमाई नहीं हो पाती। धरती के इस जन्नत के उन कलाकारों और निर्माताओं की असल जिंदगी की कहानी हम आपको आईबीएनखबर पर बता रहे हैं।

दिलनवाज मुंतजीर (प्रोड्यूसर, पर्तव)

1989 के बाद आतंकवाद की चपेट में आए कश्मीर के सभी सिनेमा हॉल बंद हो गए। जिसका सबसे बड़ा खामियाजा सहना बड़ा यहां के फिल्म मेकर्स और कलाकारों को। वैसे तो कश्मीर में क्षेत्रीय सिनेमा का विकास पूरी तरह हो ही नहीं पाया। क्योंकि पिछले कई दशकों से यहां के लोग दहशत के माहौल में जी रहे हैं। कुछ फिल्में बनीं तभी यहां के हालात बिगड़ गए, लेकिन फिर भी कुछ मेकर्स ने यहां की कला-संस्कृति को जिंदा रखते हुए फिल्में बनाईं, उन्हीं फिल्ममेकर में से एक हैं दिलनवाज मुंतजीर जिन्होंने 40 साल के बाद कश्मीर में यहां की भाषा में फिल्म ‘पर्तव’ बनाईं। दिलनवाज ने बताया कि 40 लाख की लागत से बनीं इस फिल्म को कई अवॉर्ड मिले। कनाडा फिल्म फेस्टिवल में भी इस फिल्म को दिखाया गया और लोगों ने इसे खूब पसंद किया। लेकिन कश्मीर में थिएटर ना होने की वजह से ये फिल्म रिलीज ही नहीं की जा सकी। मुंतजीर ने बताया कि हमने कश्मीर यूनिवर्सिटी में इस फिल्म की स्क्रीनिंग की थी, लेकिन इस फिल्म की लागत भी नहीं वसूल पाए। यहां तक कि दूरदर्शन से भी कोई सपोर्ट नहीं मिला कि हम इस फिल्म को टीवी पर ही दिखा सकें।

मुंतजीर ने कहा कि हमने जम्मू-कश्मीर सरकार से बात की, मैंने जेटली जी को भी चिट्ठी लिखी कि हमारी कुछ मदद की जाए, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो पाया है। मैं श्रीनगर के कल्चरल टैगोर हॉल में इस साल फिल्म की स्क्रीनिंग करने वाला था, लेकिन यहां के हालात इतने खराब हो गए कि हम फिल्म रिलीज नहीं कर पाए। अब हम लोग सोच रहे हैं कि डीवीडी की मदद से ही लोगों को इस फिल्म को दिखाएं। दिलनवाज के मुताबिक ‘पर्तव’ कश्मीर की पहली फीचर फिल्म है, जिसको इंटरनेशनल अवॉर्ड मिला, लेकिन इतनी अच्छी फिल्म बनाने के बाद भी हम लोगों को दिखा नहीं सके।  कश्मीर में युवा कलाकारों के पास कुछ करने के लिए है ही नहीं, कई बच्चे एक्टिंग में अपनी किस्मत आजमाना चाहते हैं, लेकिन सरकार की तरफ से कोई सपोर्ट नहीं मिलता। अगर सरकार सपोर्ट करती तो काफी युवाओं को रोजगार की समस्या काफी कम हो जाएगी।

मुंतजीर ने बताया कि कश्मीरियों को एक्टिंग का काफी शौक है। जब विशाल भारद्वाज ने फिल्म हैदर के लिए ऑडिशन रखा था, तो 10 हजार कश्मीरी नौजवान ऑडिशन देने पहुंचे थे। अगर यहां कि लोकल फिल्म इंड्स्ट्री डेवलप हो जाए तो युवाओं की काफी समस्या हल हो जाए। दूरदर्शन पर काम करने वाले कई कलाकार बर्बाद हो गए। क्योंकि पिछले 5 सालों से दूरदर्शन के लिए भी प्रोग्राम बनने बंद हो गए हैं। कई युवा जो एक्टिंग में जाना चाहते थे, वो भटक गए और गलत रास्ते पर निकल पड़े हैं।  मैंने खुद से वादा किया है कि कश्मीर की अपनी फिल्म इंडस्ट्री बनानी है हम अपने साथियों के साथ मिलकर यहां सिनेमा का विकास करेंगे।

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गुल रियाज, (एक्टर, प्रोड्यूसर)

कश्मीर के मशहूर कलाकार, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर गुल रियाज पिछले 2 दशक से कश्मीर की कला संस्कृति अपने सीरियल और शॉर्ट फिल्म के जरिए लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। गुल रियाज ने 1990 में एक्टिंग की शुरुआत की थी, कश्मीर में दूरदर्शन के कई सीरियल में गुल ने लीड रोल किए हैं। एक्टिंग के साथ-साथ गुल ने कई सीरियल और शॉर्ट फिल्मों को प्रोड्यूस भी किया। रियाज ने ‘गुल’ नाम की शॉर्ट फिल्म बनाई, इस फिल्म को 12 अवॉर्ड मिले। अमेरिका में इंटरनेशनल अवॉर्ड मिला और क्रिटिक्स को ये फिल्म बेहद पसंद आई। आईबीएनखबर से बातचीत में गुल रियाज ने कश्मीर में कलाकारों को पेश आने वाली दिक्कतों के बारे में विस्तार से बातचीत की।

रियाज ने बताया कि पिछले कई सालों में कुछ फिल्में तो कश्मीर में बनीं, लेकिन बदकिस्मती से कोई फिल्म रिलीज ही नहीं हो पाई। यहां कोई कमर्शियल मार्केट है ही नहीं हैं। एक दूरदर्शन ही था, जिसकी मदद से सीरियल बनते थे, लेकिन जब उनका सपोर्ट मिलना भी बंद हो गया तो हालात और बद्तर हो गए। इतने कई कलाकार काम ना होने की वजह से डिप्रेशन में चले गए हैं, यहां तक कि कुछ लोगों की मौत भी हो गई।

रियाज बताते हैं हम लोग अपनी जेब से पैसे लगाकर शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बनाते हैं, जिसके बदले में हमें मुश्किल से कुछ मिलता है। हालांकि रियाज ये भी कहते हैं कि अब यहां के कई मेकर्स आगे बढ़कर फिल्में बना रहे हैं और हम सब ये कोशिश कर रहे हैं कि मराठी, गुजराती, हरियाणवी सिनेमा की तरह जल्द ही कश्मीरी सिनेमा भी हो।

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मुस्ताक अली अहमद खान, (फिल्म मेकर)

दूरदर्शन के लिए कई सीरियल और टेलीफिल्म बना चुके मुस्ताक बताते हैं कि कश्मीर की अपनी भाषा में मुश्किल से 4-6 फिल्में ही बनीं। 1990 से पहले एक दो फिल्में बनीं थीं, लेकिन उसके बाद शायद दूसरी फिल्म इंडस्ट्री की तरह यहां कि इंडस्ट्री बन पाती उसके पहले की ये जन्नत आतंकवाद की चपेट में आ गया। हालात इतने बिगड़ गए कि फिल्में तो दूर की बात हैं, हम लोग टीवी सीरियल की शूटिंग भी कश्मीर से बाहर जाकर करते थे।

मुस्ताक ने बताया कि हमारा दुर्भाग्य है कि यहां के सिनेमा हॉल बंद हैं, लेकिन खास बात ये है कि हॉल ना होने के बावजूद भी बॉलीवुड की फिल्म रिलीज के दूसरे दिन ही कश्मीर के लोग कहीं से भी डीवीडी या इंटरनेट के माध्यम से देख ही लेते हैं, यहां के लोग बॉलीवुड के बड़े दीवाने हैं। अगर यहां की लोकल इंड्स्ट्री बन जाए तो लोगों के मनोरंजन का एक जरिया बन जाए।

मुस्ताक ने बताया कि हमनें कई शॉर्ट फिल्में बनाईं, उसे दिखाने के लिए यूट्यूब का सहारा लिया। यहां वो ही लोग फिल्में बना पाते हैं, जिनको शौक है प्रॉफिट की कोई चिंता नहीं है। हम लोग अपनी मेहनत और पैसे लगाकर फिल्में बना लेते हैं और फिर बैठ जाते हैं, हमें कोई स्पांसर भी नहीं मिलता है। कमाई तो एक पैसे की नहीं होती है।

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अय्याश आरीफ (एक्टर, प्रोड्यूसर)

अय्याश आरीफ बताते हैं कि पिछले 30 सालों से घाटी में बिगड़े हालात ने कश्मीरी सिनेमा का विकास होने ही नहीं दिया। अब कुछ सालों से हम लोग सरकार से लगातार मिलकर बात कर रहे हैं। हमने महबूबा मुफ्ति से पहले उनके पिता से बात की थीं, लेकिन उनके निधन के बाद कुछ नहीं हो पाया। कुछ सालों पहले दूरदर्शन की मदद मिलती थी तो हम लोग कुछ काम कर लेते थे, लेकिन अब दूरदर्शन ने भी अपने हाथ खींच लिए, जिससे लोकल टेलीविजन इंडस्ट्री पूरी तरह ठप हो गई।

अय्याश के मुताबिक 2010 के बाद दूरदर्शन की अनदेखी की वजह से करीब 10 हजार लोगों के रोजगार पर संकट आ गया। वो बताते हैं बाहर आने आकर हमारे यहां फिल्में बनाकर करोड़ों कमा रहे हैं और हम एक-एक पैसे के मोहताज हैं, अगर सरकार हमें प्रोत्साहित करती तो हम भी दूसरे राज्यों की तरह एक अलग इंडस्ट्री खड़ी कर लेते।

अय्याश कहते हैं कि अगर दूसरे शहरों की तरह सरकार यहां भी पीवीआर बना दे तो हमारी फिल्में रिलीज हो जातीं, आखिर हम अपने रिस्क पर कब तक फिल्में बनाएं। यहां पर हमारी जयंती फिल्म मेकर्स सोसायटी है, हम लोग मिलकर कोशिश कर रहे हैं, कि सरकार हमारी मदद करें ताकि यहां के जो टैलेंटेड लोग हैं उनको काम मिले, लेकिन सरकार कला जगत को लेकर सीरियस है ही नहीं। हममें से दो चार लोग फिल्में बना लेतें हैं, लेकिन जब उनकी हालत देखते हैं कि वो फिल्म बनाकर दिवालिया हो गए तो उनकी हालत देखकर दूसरा फिल्म मेकर फिल्में बनाने से डरता है।

अय्याश बताते हैं कि कश्मीर के कल्चर को जिंदा रखने के लिए कुछ प्रोग्राम तो बनाने ही चाहिए, लेकिन दिक्कत ये है कि यहां 20-25 सालों पुराने सीरियल टीवी पर आ रहे हैं। ऐसे प्रोग्राम को भला आज की जनरेशन के लोग कैसे देखेंगे। यहां के लोगों के पास मनोरंजन का कोई जरिया नहीं है। सिनेमा हॉल हैं नहीं टीवी पर सीरियल पुराना आते हैं। हालात इतने बदतर हैं कि आए दिन आतंकवादी हमले होते हैं, आजकल कर्फ्यू का माहौल है, ऐसे तनाव में लोगों का मनोरंजन ना होने से वो डिप्रेशन में जा रहे हैं।

यहां कि लोकल भाषा में कोई नया प्रोग्राम है ही नहीं। यहां का जो चैनल है डीडी कशीर पहले उसका बजट 19 करोड़ था, फिर 8 करोड़ किया गया और अब 75 लाख बजट हो गया है, मतलब आपको 75 लाख रुपए में सालभर के प्रोग्राम बनाने हैं। इतने कम बजट में कोई क्या प्रोग्राम बनाएगा। बदकिस्मती ये भी है कि कुछ अच्छे प्रोग्राम जो थे वो भी बाढ़ की चपेट में आ गए और हमारे पास दिखाने के लिए कुछ प्रोग्राम बचा ही नहीं हैं। अय्याश ने बताया कि नए प्रोग्राम नहीं बनने की वजह से आर्टिस्टों को खाने के लाले पड़ गए और 4-5 कलाकारों की तो मौत ही हो गई। कुछ महीने पहले हम लोग स्टेज शो करके कुछ पैसे कमा लेते थे, लेकिन पिछले दिनों बिगड़े हालात की वजह से ये स्टेज शो भी बंद हो गए।

First published: October 25, 2016
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