रंग ला रहा है 'पाग बचाऊ अभियान', अब कावड़ियों ने की भगवान शिव को खुश करने की कोशिश!

सुधीर झा | News18India.com
Updated: July 24, 2016, 3:52 PM IST
रंग ला रहा है 'पाग बचाऊ अभियान', अब कावड़ियों ने की भगवान शिव को खुश करने की कोशिश!
मिथिला के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए मिथिलालोक संस्था द्वारा शुरू किया गया पाग बचाऊ अभियान ने अब जोर पकड़ लिया है।
सुधीर झा | News18India.com
Updated: July 24, 2016, 3:52 PM IST
नई दिल्ली। मिथिला के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास के लिए मिथिलालोक संस्था द्वारा शुरू किया गया पाग बचाऊ अभियान ने अब जोर पकड़ लिया है। संस्था द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान को सभी वर्गों का साथ मिल रहा है और बड़ी संख्या में लोग इस अभियान से जुड़ रहे हैं। इस अभियान के सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सावन के इस पवित्र महीने में पाग का खुमार कांवड़ियों पर भी सर चढ़कर बोल रहा है। गौरतलब है कि सावन के महीने में भगवान शिव को जल चढ़ाना काफी पुण्य का काम माना जाता है। लाखों की संख्या में कांवड़िए देवघर जाते हैं और वहां शिव मंदिर में जल चढ़ाते हैं।

आज कल सुल्तानगंज से बैद्यनाथ धाम तक भोले बाबा को जल चढ़ाने जा रहे कांवड़ियों को एक अलग अंदाज में देखा जा रहा है। भगवान शिव को खुश करने के लिए कावड़ियों ने इस बार मिथिला की सांस्कृतिक पहचान पाग को धारण किया है। कांवड़ियों का कहना है कि वे इस पाग के जरिए भगवान शिव को यह संदेश देंगे कि भगवान कभी उगना के रूप में मिथिला की धरती पर आए थे। यही नहीं पाग पहने कांवड़ियों का कहना है कि अब मिथिला की धरती को एक बार फिर भगवान शिव की जरूरत है ताकि क्षेत्र का विकास हो सके। ऐसा माना जाता है कि मिथिला के महाकवि और शिवभक्त विद्यापति की भक्ति से खुश होकर उनके घर साक्षात भगवान शिव उगना के रूप में आए थे। यही कारण है कि मधुबना जिले के भवानीपुर गांव में उगना का प्राचीन मंदिर भी बना हुआ है और रेलवे ने वहां एक उगना हॉल्ट भी बनाया है।

आपको बता दें कि सुल्तानगंज में जहां से कांवड़िए जल भरते हैं वहीं पर मंगलवार से श्रावणी मेले की भी शुरुआत हुई। हर साल यहां एक मेले का आयोजन होता है, लेकिन इस बार यह आयोजन पाग कांवड़िए की वजह से खास माना जा रहा है। इस मेले का उद्घाटन बिहार के राजस्व मंत्री डॉ. मदनमोहन झा ने किया। झा ने इस मेले का उद्घाटन करते हुए कहा कि पाग मिथिला की सांस्कृतिक पहचान है और मिथिलालोक द्वारा इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास काफी सराहनीय है। इस समारोह में कई गणमान्य लोगों सहित सैकड़ों लोगों ने पाग धारण किए।

कार्यक्रम से इतर मिथिलालोक के चेयरमैन डॉ. बीरबल झा ने पाग को मिथिला के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी बताया। झा ने कहा कि इससे भगवान शिव की कृपा इस क्षेत्र पर बरसेगी। पाग से मिथिलांचल की गौरव गाथा भी जुड़ी है।मिथिलालोक संस्था के चेयरमैन डॉ. बीरबल झा द्वारा लिखित और लोकप्रिय गायक विकास झा द्वारा गाए गीतों पर झूमते कांवड़ियों का पहला दल वहां पहुंच चुका है। इन गानों ने सोशल मीडिया पर भी काफी धमाल मचाया है।

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पाग बिहार के मिथलांचल क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और एक विशेष पहनावा है। आपको बता दें कि  पाग टोपी और पगड़ी का मिश्रित रूप है जो बिहार के मिथिला क्षेत्र और नेपाल के तराई इलाकों में मैथिली भाषी ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ जातियों में अमूमन मांगलिक अवसरों पर पहनने की परंपरा है। पाग मिथिला की सांस्कृतिक पहचान है और महाकवि विद्यापति की तस्वीरों में उनके सिर पर विराजित इस पाग को देखकर ही लोग समझ जाते हैं कि यह मिथिला से संबंधित हैं। सिर पर पाग पहनना मिथिला की सदियों पुरानी विरासत है, हालांकि हाल के दिनों में इसका प्रचलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, जिसे आज बचाने की जरूरत महसूस होने लगी है।

इस आयोजन की औपचारिक शुरुआत मिथिलालोक संस्था की ओर से दिल्ली के आईटीओ स्थित राजेंद्र भवन में 28 फरवरी को हुई। जिसमें करीब 500 प्रवासी मैथिलों ने सिर पर पाग पहनकर राष्ट्रीय राजधानी की सड़कों पर मार्च किया था। इस मौके पर सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश ज्ञानसुधा मिश्र ने कहा था कि इस तरह के कार्यक्रम से मिथिला से बाहर मिथिला की एक सांस्कृतिक पहचान बनेगी और यह अच्छा प्रयास है। इस आयोजन में अभिनेता नरेंद्र झा सहित कई अन्य विशिष्ट लोगों ने भाग लिया था और इस बात पर जोर दिया कि मिथिला क्षेत्र के सर्वांगीण विकास के लिए सबको एक मंच के तहत लाना बेहद जरूरी है।



यह पाग अभियान मिथिलांचल के अन्य जिलों में भी पहुंचेगा और पटना में एक भव्य कार्यक्रम का रूप लेगा।  संस्था के अनुसार इस अभियान का उद्देश्य मिथिला की सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए लोगों को एकजुट करना है और मिथिला की सांस्कृतिक पहचान 'पाग' को वैश्विक स्तर पर लोगों के सामने पेश कर क्षेत्र की सर्वागीण विकास को सुनिश्चित की जा सके।
First published: July 23, 2016
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