अंग्रेज अफसर को राइटर्स बिल्डिंग में घुसकर मारा था इन तीन दोस्तों ने, फिर हो गए कुर्बान!

विष्णु शर्मा | News18India.com

Updated: August 22, 2016, 11:08 AM IST
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वो तीन थे, ऊर्जा से भरपूर युवा, दिलों में क्रांति की ज्वाला और अपनी भारत माता को आजाद देखने का सपना कैसे भी पूरा करने की ललक। नाम थे बिनॉय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता। सुभाष चंद्र बोस ने उन दिनों 1928 में एक ग्रुप बनाया था बंगाल वॉलंटीयर्स, तीनों उससे जुड़ गए थे। बोस उस दौर में राजनीतिक आजादी पाने की डगर पर थे। लेकिन ये ग्रुप धीरे-धीरे क्रांतिकारियों के गुस्से के इजहार का प्लेटफॉर्म बन गया। रोज चर्चा होती थी कि कौन सा ब्रिटिश अफसर भारतीयों के साथ बुरा बर्ताव करता है, उनकी लिस्ट बने और एक-एक करके सबको सबक सिखाया जाए। एक कड़ा सबक सिखाना तो बहुत जरूरी था। सबसे बड़ा निशाना बना कर्नल एन एस सिंपसन।

एन एस सिंपसन यानी बंगाल का आईजी जेल, वो जेल में भारतीय कैदियों को यातनाएं देने के लिए कुख्यात था, जब राजनीतिक कैदी भी उसका शिकार बने तो इन क्रांतिकारियों ने ठान लिया कि इसको सबक सिखाना बहुत जरूरी है। सिंपसन नस्लवादी मानसिकता का था। उसको भारतीयों से घृणा की हद तक चिढ़ थी, भारतीय होना उसके लिए मानो कोई गाली थी। सभी क्रांतिकारी उसे सबक सिखाना चाहते थे। उसकी जिम्मेदारी ली इन तीन युवा दोस्तों ने, बिनॉय-बादल और दिनेश ने। उस वक्त भी कोलकाता के डलहौजी स्क्वायर पर राइटर्स बिल्डिंग ही सत्ता का केंद्र थी, सारे बड़े अधिकारी वहीं बैठते थे। योजना बनी कि वहीं घुसकर मारा जाए, ताकि सबसे सेफ जोन में मारने से बाकी अधिकारियों में आतंक फैल जाए।

अंग्रेज अफसर को राइटर्स बिल्डिंग में घुसकर मारा था इन तीन दोस्तों ने, फिर हो गए कुर्बान!
अंग्रेज सरकार हैरान रह गई, ना केवल राइटर्स बिल्डिंग में घुसकर इतने बड़े अधिकारी की हत्या करने के उनके दुस्साहस पर बल्कि वतन पर अपनी जान कुर्बान करने के उनके जज्बे पर भी।

8 दिसंबर 1930 का दिन था, तीनों ने यूरोपीय ढंग के कपड़े पहने ताकि पहचाने ना जा सकें। सिंपसन को जरा सा भी अनुमान नहीं था कि कोई यहां भी घुसकर उस पर हमला कर सकता है, सो वो सिक्योरिटी को लेकर लापरवाह था। तीनों ने उस पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाना शुरू कर दिया, कई और अंग्रेज अधिकारियों को भी गोली लगी। लेकिन वहां से भागना आसान नहीं, गोलियों की आवाज से भगदड़ मच गई और सिक्योरिटी स्टाफ फौरन हरकत में आया। दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। तीनों ही खुद को गिरफ्तार करवाना नहीं चाहते थे, खुद को घिरता देखकर बादल गुप्ता ने पोटेशियम साइनाइड खा लिया तो बिनॉय बसु और दिनेश गुप्ता ने अपनी ही रिवॉल्वर से खुद को शूट कर लिया।

बादल की मौके पर ही मौत हो गई, लेकिन बिनॉय बसु और दिनेश गुप्ता में जान अभी बाकी थी, उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया। बिनॉय बसु पांच दिन के बाद यानी 13 दिसंबर को दुनिया से विदा हो गए। जबकि दिनेश गुप्ता को अंग्रेजों ने बचा लिया और ट्रायल के बाद फांसी दे दी। अंग्रेज सरकार हैरान रह गई, ना केवल राइटर्स बिल्डिंग में घुसकर इतने बड़े अधिकारी की हत्या करने के उनके दुस्साहस पर बल्कि वतन पर अपनी जान कुर्बान करने के उनके जज्बे पर भी। सारे क्रांतिकारियों को मानो नई संजीवनी मिल गई, एक-एक करके अंग्रेज अफसर निशाना बनाए जाने लगे और युवाओं में देश पर मर मिटने का जुनून सर चढ़कर बोलने लगा।

जबकि बिनॉय बसु तो एक अच्छा खासा कैरियर छोड़कर आए थे, उनके पिता एक इंजीनियर थे। उनका खुद का एडमीशन मिटफोर्ड मेडिकल कॉलेज (इसे अब सलीमुल्लाह मेडिकल कहा जाता है, बांग्लादेश में है) में हो चुका था। गिनती के भारतीय डॉक्टर थे उस वक्त देश में, लेकिन बिनॉय क्रांतिकारी हेमचंद्र घोष के संपर्क में आए और उन्होंने देश के लिए जान देने की ठान ली। मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर वो बंगाल वॉलंटीयर्स के ऑपरेशन फ्रीडम में कूद गए, जो ब्रिटिश पुलिस अफसरों के खिलाफ था।

शुरुआत की गई अगस्त 1930 में, बंगाल के आईजी पुलिस की हत्या की योजना के साथ। 29 अगस्त 1930 को आईजी मेडिकल स्कूल हॉस्पिटल में आया, कोई सीनियर ऑफिसर वहां एडमिट था। बिनॉय ने पारंपरिक बंगाली वेशभूषा में हॉस्पिटल में प्रवेश किया, आईजी को ढूंढा और बड़ी क्लोज रेंज से उसे गोली मार दी। इस हमले में आईजी की फौरन मौत हो गई और एक एसपी हडसन घायल हो गया। बिनॉय ने किसी तरह वहां से बचकर भागने में कामयाबी हासिल कर ली।

कॉलेज की मैगजीन से बिनॉय का फोटो लेकर जगह-जगह पोस्टर चिपका दिए गए, दस हजार रुपए के इनाम के साथ। एक बार तो साथी सुपति रॉय के साथ ढाका से नारायणगंज जाने वाली ट्रेन में बिनॉय के लिए गहरा जाल बिछाया गया, लेकिन वो दोनों मुस्लिम भिखारी का वेश बनाकर स्टेशन और ट्रेन में मौजूद पुलिस वालों से किसी भी तरह बचकर भाग निकले। कुछ दिन उन्होंने कोलकाता की स्लम बस्ती में गुजारे। लेकिन तब तक क्रांतिकारियों के बीच उनका काफी नाम हो चुका था और बिनॉय को दे दी गई बादल और दिनेश के सथ आईजी जेल सिम्पसन को मारने की जिम्मेदारी, जो बिनॉय के साथ उन दोनों का भी आखिरी ऑपरेशन साबित हुआ।

बादल गुप्ता भी मुंशीगंज जिले के रहने वाले थे, जो अब बांग्लादेश में है। उनके दो मामा धरणी नाथ गुप्ता और नगेंद्र नाथ गुप्ता भी क्रांतिकारी थे और अरविंदो घोष के साथ अलीपुर बम कांड केस में जेल जा चुके थे। मामा की कहानियों का असर भांजे बादल पर भी हुआ, उस पर एक क्रांतिकारी शिक्षक निकुंज सेन का साथ भी मिल गया। बंगाल वॉलीयंटर्स के साथ जुड़कर सिंपसन को मारने का उनका पहला और आखिरी बड़ा क्रांतिकारी कदम था, जिसमें बादल ने पॉटेशियम साइनाइड खाकर अपनी जान दे दी, वो खुद को गिरफ्तार नहीं करवाना चाहते थे। जिस डलहौजी स्क्वायर पर राइटर्स बिल्डिंग है, उसका स्क्वायर का नाम बदलकर बीबीडी स्क्वायर कर दिया गया, यानी बादल-बिनॉय-दिनेश स्क्वायर।

बिनॉय और बादल की तरह दिनेश गुप्ता भी मुंशीगंज के रहने वाले थे, दिनेश गुप्ता ने शुरूआत से ही फायर आर्म्स में महारत हासिल कर ली थी। वो स्थानीय युवाओं और क्रांतिकारों को उनका इस्तेमाल करना सिखाते थे। बंगाल वॉलीयंटर्स में शामिल होने के बाद उन्होंने ट्रेनिंग का काम जारी रखा और तीन जिलों के डीएम डगलस, बर्ज और पैडी को जिन क्रांतिकारियों ने शूट किया, उन्होंने हथियार चलाने की ट्रेनिंग दिनेश गुप्ता ने ही दी थी। लेकिन सिंपसन का केस मुश्किल था, तय किया गया कि राइटर्स बिल्डिंग में दिनेश गुप्ता को भी भेजा जाएगा। वहां पकड़े जाने के डर से दिनेश और बिनॉय ने खुद को गोली मार ली।

दिनेश को बचा लिया गया और फिर केस का ट्रायल शुरू हुआ। उन्हें अलीपुर जेल में रखा गया, जहां से उन्होंने अपनी बहन अमिय सेन गुप्ता को काफी पत्र लिखे, जिनको बाद में एक किताब के तौर पर छापा गया, जिसका नाम था, ‘अमी सुभाष बोलछी’। 7 जुलाई 1931 को दिनेश गुप्ता को फांसी दे दी गई, उस वक्त वो महज 19 साल के थे। लेकिन जिस जज जिंगर ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, उनके साथी क्रांतिकारी कन्हाई लाल भट्टाचार्य ने उसको गोली मार कर दिनेश की मौत का बदला भी ले लिया।

इन तीनों के क्रांतिकारी कदम ने पूरे देश में उस वक्त तूफान ला दिया था, वतन पर बेखौफ होकर मरने वालों की ये नस्ल ना केवल अंगेजों में खौफ की वजह बनी बल्कि देश के बाकी युवाओं में देश के लिए मरने मिटने का जज्बा लेकर आई। लेकिन आज गिनती के क्रांतिकारियों का नाम युवा पीढ़ी पढ़ती है, बंगाल में भले ही इन तीनों की कई जगह मूर्तियां लगी दिखाई दें, उत्तर के राज्यों में तो बादल, दिनेश और बिनॉय का नाम भी किसी को नहीं पढाया जाता, जबकि वो केवल बंगाल को आजाद करने के लिए अपनी जानों की आहुति नहीं दे रहे थे।

First published: August 22, 2016
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