अम्‍मी! एक तुम्‍ही थी जो औरत के घर से बाहर निकलकर काम करने की कीमत समझती थी


Updated: May 14, 2017, 7:49 AM IST
अम्‍मी! एक तुम्‍ही थी जो औरत के घर से बाहर निकलकर काम करने की कीमत समझती थी
अम्‍मी! एक तुम्‍ही थी जो औरत के घर से बाहर निकलकर काम करने की कीमत समझती थी

Updated: May 14, 2017, 7:49 AM IST
प्रिय अम्मी,

आज आपकी बहुत याद आई. आज शब-ए-बारात है. आज कोई सोएगा नहीं. मैं भी नहीं. लेकिन आज मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ? रात कटने का तो नाम ही नहीं लेगी. बस, मन बहलाने के लिए अलमारी खोली तो उसमें से एक पुरानी फ़ोटो एल्बम हाथ लगी.

अम्मी, आपके जाने के बाद मैंने वह एल्बम देखना बंद कर दिया था और उसे कपड़ों के नीचे छुपा दिया था क्योंकि वह मुझे आपकी याद दिलाता था. लेकिन आज मुझे उसे देखने का मन किया. जैसे ही मैंने एल्बम खोला तो उसमें सबसे पहली तस्वीर जो निकली, उसमें आप और खाला एक साथ हैं. आप बेहद खूबसूरत लग रही हैं. पीले रंग की कमीज़ और काले रंग की सलवार पहनी हुई है आपने और सिर पर काला दुपट्टा डाला हुआ है. सच कहूँ, आप इस तस्वीर में थोड़ी मोटी भी लग रही हैं. अम्मी, मैं भी आपकी तरह ही दिखना चाहती हूँ.

न चाहते हुए भी मैं दूसरी तस्वीर देखने लगी. इसमें आप, नाना और नानी के साथ बैठी हैं और बातें कर रही हैं. आप के पीछे भी कुछ पहचान के लोग खड़े हैं. अम्मी, ये सब कौन हैं? मैं तो उन लोगों को तो भूल ही चुकी हूँ. बस, सिर्फ आपका चेहरा याद है. मैं बहुत कोशिश करती हूँ लेकिन उन लोगों को पहचान नहीं पाती. अम्मी, अब कुछ याद नहीं रहता. भूलती जा रही हूँ सबकुछ.

एक दूसरी तस्वीर में आप अब्बू के साथ डांस कर रही हो. यह देखते हुए मुझे आपके हंसमुख चेहरे की फिर से याद आ गई. आपमें नाचने की कितनी चाहत थी. मामू की शादी में आप दिल खोलकर नाची थी. तीसरी मामू की शादी की है. आप छत पर बैठी सबके लिए देहग बना रही हैं. मुझे याद है कि आप खाना बनाने में कितनी घुल जाती थीं. सर्दी का दिन था और आप छत पर बैठी सबके लिए खाना बना रही थीं. अम्मी मैं भी कभी-कभी आप जैसा खाना बनाने की कोशिश करती हूँ, लेकिन आपके जैसा कभी नहीं बना पाती. अम्मी, क्या आप मुझे सिखाकर नहीं जा सकती थीं.

इसी बीच आपकी एक और तस्वीर हाथ लगी. आप हरे रंग की शॉल ओढ़े सीढ़ियों पर शादाफ को लिए बैठी हैं. मुझे कुछ-कुछ याद है, उस समय हम तुर्कमान गेट पर रहा करते थे. आप रोज सीढ़ियों की धुलाई किया करतीं­. सर्दियों में सिर्फ और सिर्फ वहीं पर धूप आती थी. एक बार आप अमान को खिला रही थीं. मैं स्कूल से घर वापस आई तो मुझे इतना गुस्सा आया कि आप पर चिल्लाने लगी थी, 'अम्मी, इसे अपनी गोद से उतारिये, अभी के अभी. यह तो बड़ी अम्मी का बेटा है. आपकी बेटी तो मैं हूँ !’ मुझे ठीक से याद तो नहीं है, मगर अब्बू मुझे यह सब बताते थे. तब आप मेरे पास आईं और बड़े प्यार से मेरे गालों को चूम लिया. अम्मी, वह प्यार दोबारा मुझे कभी नहीं मिला.

अम्मी आज मैं सोचती हूँ कि मैं उस समय कितनी नादान थी. अमान तो सात-आठ महीने का था और मैं उसे गोद से उतारने के लिए कह रही थी. आज यह सब याद करके हंसी आ रही है. कितनी बेवकूफ थी मैं. ये हरकतें जब भी याद आती हैं तो मुझे हंसी आती है, लेकिन आपकी कमी भी महसूस होती है क्योंकि ऐसे हरकतें करने का जब मन होता है तो डर लगता है कि आपकी तरह अब उसे कोई सुनेगा कि नहीं. अब बचपन नहीं रह गया है. लगता है कि मैं उम्र से पहले ही बड़ी हो गई हूँ. जब घर में छोटे बच्चे थोड़े से बड़े हुए तो लगा कि मेरे बचपन की उम्र उन्हें लग गई है.

अम्मी एक और तस्वीर मुझे आपके बेहद करीब कर देती है, उसमें आप सिलाई कर रही हैं. भाई खेल रहे हैं. एक दम से भाई ने सिलाई के कपड़े को खींच लिया. आप उस पर चिल्लाई थीं. भाई आपसे डरते ही नहीं थे. अम्मी, सच यह है कि आपसे कोई भी नहीं डरता था.

अम्मी मुझे आपसे हिम्मत और खुशी दोनों मिलती थी. बाहर निकलकर कुछ करने की आपकी चाहत तो पूरी नहीं हो पाई लेकिन आपकी इसी चाहत से मुझे आगे बढ़ने की राह मिली.

अम्मी, मैं आगे बढ़ने की कोशिश कर रहीं हूँ. मुश्किलात तो बहुत हैं लेकिन कैसे न कैसे उसका सामना भी कर लेती हूँ. अपने पैरों पर खड़े होने कि कोशिश करती हूँ. लेकिन अम्मी आज भी कुछ लोगों कि नज़र नहीं बदली है. जब भी गली से बाहर निकलकर काम के पर जाती हूँ तो लोग कुछ अजीब सी बातें करते हैं. तरह-तरह की नज़र रखते हैं. एक-दो बात सुनकर मैं अनसुनी कर देती हूँ लेकिन भाई नहीं कर पाते हैं. मुझ पर गुस्सा कर जाते हैं. एक बार तो अम्मी उन्होंने मुझे रोका भी था. उस दिन वह काफी गुस्से में दिख रहे थे. उसके बाद काफी दिनों तक मैं घर में ही रही. लेकिन घर में दिन काटना बेहद मुश्किल है. हमारी बस्ती से कई लड़कियां-लड़के अब काम पर जाने लगे हैं. सुबह तैयार होकर वे जब बाहर निकलते हैं तो दिल खुश हो जाता है.

बात बहुत छोटी-सी थी अम्मी, मगर मैं उसे भूल से भी नहीं भूलती. एक बार मुझे आइसक्रीम खाने का मन था. मैं दरियागंज की तरफ बीकानेर चली गई. वहां मुझे अपने स्कूल के टाइम का एक दोस्त मिल गया. वह अचानक से मेरे सामने आकार बैठ गया. इतनी देर में शाबिश्‍ता आपी भी वहाँ पर आ गईं. उन्होंने हमें एक साथ तो नहीं पर एक टेबल पर बैठा देख लिया था. मुझे इतना तो मालूम था कि वह घर पर जरुर कुछ बताएंगी. लेकिन यह पता नहीं था कि क्या-क्या या कैसा बनाकर कहेंगी. आपी ने खालू को कुछ कहा. अम्मी पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि खालू मेरे पास आए और मुझसे बिना कुछ पूछे भला-बुरा बोलना शुरू कर दिया­. मैंने सब कुछ सच बताया, लेकिन मेरी किसी ने नहीं सुनी. बस, मुझे एक बार फिर घर बिठा दिया गया.

मुझे पता है अम्मी, अगर आप होतीं तो कहती, ''मुझे अपनी बेटी का यकीन है, दुनिया का नहीं.'' अम्मी, घर से बाहर निकलने के लिए मैंने कई बार हिम्मत दिखाई, मगर फिर घर में ही बैठा दी जाती. अम्‍मी!
मुझे पूरा यकीन है अम्मी, पूरे घर में सिर्फ और सिर्फ तुम ही सुनने वाली औरत थी. एक तुम्‍ही थी जो औरत के घर से बाहर निकलकर काम करने की कीमत समझती थी. यह सब जो मैं आपको बता रही हूँ, यह आपको परेशान करने के लिए नहीं है. इसलिए कह रही हूं क्‍योंकि किसी और से नहीं कह सकती. और कोई समझेगा भी तो नहीं.
अल्लाह आपको जन्नत में ख़ुश रखे !

आपकी बेटी
सुमेरा

(19 वर्ष की सुमेरा बीए सेकंड ईयर में पढ़ती हैं और पिछले दो सालों से अंकुर सोसायटी फ़ॉर ऑल्टरनेटिव्ज़ इन एजुकेशन के साथ काम कर रही हैं.)
First published: May 14, 2017
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