एक्सक्लूसिव: आज के दौर में कपड़े सिल दिए जाते हैं फिर कहते हैं इसमें फिट हो जाओ

Pooja Batra | News18Hindi

Updated: January 20, 2017, 2:08 PM IST
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ग़ज़लों में अपनी मखमली आवाज़ से रुह तक पहुंच जाने वाले गायक और संगीतकार तलत अजीज़ से न्यूज18 हिंदी ने ग़ज़ल और आज के दौर में उसके साथ हो रही अनदेखी के बारे में खास बातचीत की. जब हमने उनसे सवाल किया कि उनकी नज़र में ग़ज़ल क्या है तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, ग़ज़ल एक अहसास है... ग़ज़ल एक मिज़ाज़ है.. जो खो जाता है मिलकर जिंदगी में... ग़ज़ल नाम है उसका शायरी में.

वहीं, बशीर बद्र कहते हैं - ये शबनमी लहजा है आहिस्ता ग़ज़ल पढ़ना, तितली की कहानी है फूलों की ज़बानी है. बस गजल यही है मेरी नज़र में. उमराव जान की ग़ज़लों को बेहतरीन फ़िल्मी ग़ज़ल मानने वाले तलत अज़ीज़ ने बताया कि आजकल की नौजवान पीढ़ी में भी कई लोग हैं, जो अच्छी ग़ज़लें गा रहे हैं.

एक्सक्लूसिव: आज के दौर में कपड़े सिल दिए जाते हैं फिर कहते हैं इसमें फिट हो जाओ
Photo- Twitter

'बुधवार को में एक नई पीढ़ी के संगीतकार अरिजीत सिंह के साथ था. ऐसे ही उनसे जब बातचीत हो रही थी तो पुराने और नए गानों के बीच का बदलाव की बात निकली, तो मैंने कहा, देखिए बात नए और पुराने गानों की नहीं है. ज़माने की बात है.

अक्सर लोग कहते हैं कि साहब पुराने गानें ज्यादा अच्छे थे क्योंकि उसमें कहीं कहीं ना कहीं कविताएं छिपी थीं. लेकिन फिल्मों में भी एक सिचुएशन थीं जहां पर ऐसे गाने फिट हो सकते थे. आजकल फिल्मों का दौर बदल चुका है उसके पीछे वजह है अब लोगों के पास वक्त नहीं है. दो घंटे की या तीन घंटे की फिल्म होती है, जिसमें आपके पास इतना वक्त नहीं होता. तो कसूर बनाने वाला का नहीं है, ना ही किसी और का है. कसूर वक्त का है. जो आज हमारे पास नहीं है. हम चाहते हैं कि फिल्म जल्दी से बनें और फिल्म में जो गाना आता है वो बैकग्राउंड से आता है. अंतरा आता है और कहानी आगे बढ़ जाती है.

अजीज़ ने कहा, अच्छे कंपोजर आज भी हैं. फर्क इतना है कि पुराने ज़माने में म्यूजिक डायरेक्टर्स और गीतकार थे उनको इतनी फ्रीडम थी कि वो जो कहते थे प्रोड्यूसर्स मान लेते थे. आजकल इस फ्रीडम की तंगी हो गई है. आजकल तो बस बनाकर दीजिए आप...वो अपने आप फिट हो जाते हैं.

अब बात ये है कि पुराने ज़माने में गजल, नज़्म लिखी जाती थी तो उस पर धुन बनती थी जिसमें एक फलो होता था लेकिन आज के जमाने में पहले धुन बनती है बाद में शब्द पिरोए जाते हैं, बात ठीक वैसी ही होती है कि पहले किसी के कपड़े सिलने से पहले उसका नाप लिया जाता था फिर कपड़े बनाए जाते थे लेकिन आजकर कपड़े बना दिए जाते हैं और कहा जाता है इसमें फिट हो जाओ.

तलत अजीज ने कहा, गज़ल हो...कोई नग्मा हो...या फिर कोई गीत हो सबसे पहले आप इसे पढ़ लें, इनमें शब्दों में ही कहीं ना कहीं धुन छिपी होती है लेकिन शर्त ये है कि आपमें तो मादा होना चाहिए इसे पहचानने का. गालिब बहुत मशहूर शायर है, आपने उनकी शायरी भी पढ़ी होगी, गालिब से किसी पूछा था, मिर्जा जो आप लिखते हैं इसकी आमद कहां से आती है तो उन्होंने कहा था, आते हैं ख्याल गायब से मजामीन खामा नवा ऐ सरोश है. मतलब उस जमाने में ऐसे कलम होते थे जिन्हें स्याही में डुबो कर लिखा जाता था. लिखने पर खर--खर--खरर की आवाज आती थी. तो इस शेर के माध्यम से गालिब कहना चाहते हैं कि मुझे भी नहीं पता कि लिखने के ख्याल आते कहां से हैं. ये कागज पर जो कलम चल रही है वो मैं नहीं बल्कि फरिश्ते मुझसे लिखवा रहे हैं. मैं तो बस एक जरिया बना हूं. बस हमें उसी आमद को पहचाना है.

इसी बातचीत के दौरान हमनें जानने की कोशिश की उनकी पसंदीदा गज़ल कौन सी है. तलत ने कहा, उन्हें उनकी गाई हर गज़ल अजीज़ है लेकिन फिर भी उमराव

जान की गजल जिंदगी जब भी तेरी बज्म में लाती है हमें, आईना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे, फिर छिड़ी रात बात फूलों की, ये ऐसी गजलें हैं जिन्हें मैं हर

कार्यक्रम में गाता हूं.

अभी हाल ही में मैंने उर्दू के बड़े शायर “असरार उल हक़ मजाज़ लखनवी ”के जीवन पर बनी फिल्म “मजाज़ – ऐ ग़म ए दिल क्या करूँ ”में मैंने संगीत दिया है और नज्में गाई हैं. अब मैं इंतजार कर रहा इस फिल्म के बाद इसकी भी फरमाइश आ जाएगी. हुस्न को बेइजाब होना था...शौक को कामयाब होना था.

First published: January 20, 2017
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