लहरिया प्रिंट से जुड़ी इस खास परंपरा के बारे में जानते हैं आप?


Updated: July 14, 2017, 5:12 PM IST
लहरिया प्रिंट से जुड़ी इस खास परंपरा के बारे में जानते हैं आप?
सावन के मौसम मे महिलाओं की पहली पसंद लहरिया (मॉडल- हर्षिल कालिया)

Updated: July 14, 2017, 5:12 PM IST
सावन की बात हो और लहरिया का जिक्र न आए, ऐसा कैसे हो सकता है. जी हां सावन ने दस्तक दे दी है और समय आ गया है मनभावन लहरिया के परिधानों से खुदको सजाने-संवारने का. बेशक आप भी इस मौसम में अपने लिए खास लहरिया ढूंढ ही रही होंगी. सावन में लहरिया पहनने का रिवाज तो सभी को पता है लेकिन क्या आपको इस परंपरागत प्रिंट के बारे में क्या कुछ ऐसे तथ्य पता है जो इसे एक परिधान के डिजाइन से बढ़ कर बनाता है.

आइए आपको बताते हैं लहरिया से जुड़ी कीच दिलचस्प बातें, जिन्हें जानकर आप भी उत्साहित हो जाएंगे.



राजस्थानी परंपरा

लहरिया राजस्थान की लोक कला से प्रेरित है. इस प्रिंट की शुरुआत 19 वीं शताब्दी में हुई थी. राजस्थान , खासकर मेवाड़ से जुड़े स्थानों की संस्कृति में आज भी इसका इतना ही जोर है. राजपरिवारों में इसे पहनने की प्रथा काफी पुरानी है. पुराने जमाने मे नीले रंग का लहरिया राज परिवार की निशानी हुआ करती थी.

लहरिया शब्द का अर्थ
लहरिया रंगाई की अनूठी कला का एक उदाहरण है. पानी की लहरों की बनावट इसमे नजर आती है. ऊपर-नीचे उठती हुई आड़ी-तिरछी लकीरों की छाप एक नया भाव व्यक्त करती हैं. लहर शब्द से बना इस प्रिंट को मारवाड़ी और राजपूत जाती की महिलाओं द्वारा काफी पसंद किया गया.



कैसे होता प्रिंट
लहरिया प्रिंट कई चरणों से होता हुआ बनता है. एक ही कपड़े को बहुत बार डाई कर अलग-अलग रंगों की लाइनें बनाई जाती हैं. इसी के साथ कपड़े को अलग ढंग से बांधा जाता है जिससे तिरछी लाइनें बन सके. इस प्रिंट को बनाने में मेहनत होने के साथ रंगरेज की रचनात्मकता की भी उतनी ही बड़ी भूमिका है.

क्यों है इतना खास
सावन में लहरिया पहनने के पीछे का भाव बारिश और पानी के इस मौसम को उत्सव के रूप में मनाना है. हिंदु समाज में कुछ प्रिंट और रंगों को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है. लहरिया भी इनमे से एक है. शिव-गौरी की पूजा में भी इसका बहुत महत्व है. खासकर सुहागनों को इसे पहनने के लिए सुझाव दिया जाता है.
First published: July 14, 2017
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