मां जब तुम छोड़कर चली गई तो हमने अकेले ही दुनिया से लड़ना सीखा

News18Hindi
Updated: May 14, 2017, 7:56 AM IST
मां जब तुम छोड़कर चली गई तो हमने अकेले ही दुनिया से लड़ना सीखा
मां जब तुम छोड़कर चली गई तो हमने अकेले ही दुनिया से लड़ना सीखा
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Updated: May 14, 2017, 7:56 AM IST
प्‍यारी मां,

आज मैं तुम्हारे हाथों का बना हुआ वह स्वेटर देख रही हूँ. वैसे मैंने आपको अच्छे से नहीं देखा है और न ही आपकी कोई बात मुझे याद है. पाँच साल की थी मैं जब आप हमें छोड़कर चली गईं.
इस स्वेटर को देखकर तो लगता है कि शायद आप भी मेरी ही तरह पतली-दुबली रही होंगी. यह चटकदार जामुनी और हरा रंग बताता है कि आप बहुत सुंदर, गोरी-चिट्टी होंगी क्योंकि ये तो मैंने अक्सर दीदी से सुना है.

शायद आपको यह जानकर दुख होगा कि वह भरा-पूरा परिवार, जिसे आप इस दुनिया में छोड़ गई थीं, अब टूट चुका है. इतना टूट गया है कि उस परिवार की 5 इकाई में से बस गिनी-चुनी इकाई ही रह गई है. आपके जाने के बाद सबकुछ बिखर चुका था. वह बड़ा सा घर, जिसमें आप अपने परिवार के साथ हमेशा रहती थीं. आपका वह रुतबा जो मोहल्ले में हुआ करता था, वह सब जैसे आपके साथ ही चला गया.

आपके जाने के बाद हम एक खुले आसमान के नीचे आ गए थे. एक लहराता हुआ प्लास्टिक का तिरपाल था, जो हमारे सिर की छत बन गया था. हम शुरू में तो बहुत दुःखी और डरा हुआ महसूस करते थे. हर दिन आने वाली आँधी जो हमारे लिए डर का साया थी, अब वही हमारे इंतज़ार में बदल गई थी. मैं, रानी और श्वेता स्कूल भी जाने लगे थे. शुरू-शुरू में तो आपकी कमी का एहसास ही नहीं होता था क्योंकि दीदी प्यार करती थी और आज भी करती है. जब भी स्कूल में पैरेंटस मीटिंग होती थी तो वह कोसती थी कि काश आप हमारे बीच होतीं और टीचर से मेरी तारीफें सुन पातीं.

जब मैं आठवीं में पहुँची तो पापा ने सुमन और श्वेता दीदी की शादी कर दी. एक की जयपुर और और दूसरी की अलवर में. दोनों दूर राजस्थान चली गईं. घर और ख़ाली हो गया. उन दोनों के जाने का दुःख तो था, लेकिन तब तक मैं यह समझ गई थी कि ये चीज़ें भी ज़िंदगी में ज़रूरी होती हैं. अब मैं और रानी पढ़ रहे थे और पापा वही अपने टेंट हाउस के काम में व्यस्त थे. इस काम से घर ज्यादा अच्छा तो नहीं चलता था पर गुज़ारा हो जाता था. वैसे भी पापा की आदतों से तो आप ख़ुद जानती थीं कि वे ग्राहकों पर कितनी जल्दी तरस खा जाते थे. चाहे घर से ही घाटा क्यों न हो जाए. ऐसा हुआ भी. ‘भगवान और देगा’ कहकर ख़ुद को संतुष्टि देते ही थे, साथ ही हमें भी भगवान के भरोसे छोड़ देते थे.

मैं चाहती थी कि जल्दी से पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ.

माँ, मैं यह सब आपको इसलिए नहीं बता रही हूँ कि आप सुनकर दुखी हो जाएं. पापा हमेशा कहते थे कि सुनने की ताक़त तो सबसे ज़्यादा आप में ही थी. मैं कभी कुछ सुना नहीं पाई, इसीलिए आज सबकुछ कह देना चाहती हूं. हमने बहुत बुरे दिन देखे, पार्क वाला हमारी झोपड़ी कमेटी वालों ने हटा दी. हम किराए के मकान में आ गए.

घर में सब उदास थे कि अब किराया कहाँ से भरेंगे. लेकिन मैं खुश थी. पहले वाले घर में लाइट न होने की वजह से अंधेरा होने के बाद हम पढ़ नहीं पाते थे, लेकिन इस नए घर में बिजली थी. लेकिन यह ख़ुशी ज़्यादा दिन नहीं रह पायी. कुछ दिन बाद पापा भी हमें छोड़कर चले गए. हम फिर से अकेले हो गए क्योंकि हमारी ताक़त ही चली गई थी.

मैं इतनी समझदार तो हो ही गई थी कि ख़ुदा के खेल को समझने लगी थी. उसने हम पर अपना ऐसा जाल बिछाया कि धीरे-धीरे हमसे श्वेता दीदी को भी छीन लिया. हम इतने टूट चुके थे जैसे कोई काँच, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हार. मैं पढ़ती रही और पढ़ाने भी लगी. घर का माहौल ही ऐसा था कि किसी भी चीज़ में मन नहीं लगता था. सब कहते थे कि आप बहुत हिम्मत वाली थीं, आपने भी ज़िंदगी में बहुत कुछ सहा था. उसी तरह मुझे भी सहने की आदत हो गई.

मैं जब भी स्कूल में या अपने आसपास और बच्चों को टेंशन फ्री देखती तो सोचती कि काश मेरी भी माँ होती तो मुझे इतना झेलना नहीं पड़ता. ज़िंदगी बोझ नहीं लगती. वह बोझ जिसे सहने की ताक़त अब मुझमें नहीं थी. एक बार तो सोचा भी कि आज तो कुछ पक्का ही कर लूँ. लेकिन फिर सोचा कि मेरे जाने के बाद तो मेरी ये तीन बड़ी बहनें और अकेली हो जाएंगी.

आज मैं सारी दुनिया से, जिंदगी से, हालात से और मुश्किलों से लड़कर अकेले खड़ी हूं. पता है माँ, आज मैं जिस मु़क़ाम पर हूँ, मन करता है कि अगर आप मुझे इस तरह देखतीं तो फूली नहीं समाती क्योंकि मैं अब ज़िंदगी से लड़ना सीख गई हूँ. घर में ज़्यादातर फ़ैसले मैं ही लेती हूँ. घर में बस अब हम दो ही बचे हैं. लेकिन आज भी लगता है कि काश आप हमारे साथ होतीं.

मुझे मालूम है कि इतना कुछ सुनकर आप मुझ पर फक्र ही महसूस कर रही होंगी. अब मैं अठारह साल की हो चुकी हूँ और कॉलेज की दुनिया में कदम रख चुकी हूँ.

आपकी बेटी
आरती

(20 वर्ष की आरती अग्रवाल बी. ए. फर्स्ट ईयर में पढ़ती हैं और अंकुर-कलेक्टिव की नियमित रियाज़कर्ता हैं. उनके लेखन के कुछ टुकड़े ‘फर्स्ट सिटी’, ‘अकार’ और हंस पत्रिका में छप चुके हैं.)
First published: May 14, 2017
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