आज मदर्स-डे पर उदय प्रकाश की कहानी "नेलकटर"

News18Hindi
Updated: May 14, 2017, 10:09 PM IST
आज मदर्स-डे पर उदय प्रकाश की कहानी
उदय प्रकाश की कहानी "नेलकटर"
News18Hindi
Updated: May 14, 2017, 10:09 PM IST
सावन में घास और वनस्पतियों के हरे रंग में हल्का अंधेरा- सा घुला होता है. हवा भारी होती है और तरल. वर्षा के रवे पर्तों में तैरते हैं.

मैं नौ साल का था.

इसी महीने राखी बंधती है. कजलैयां होती है. नागपंचमी में गोबर की सात बहनें बनाई जाती हैं. धान की लाई और दूध दोने में भर कर हम सांपों की बाबियां खोजते फिरते हैं. हरियरी अमावस भी इसी महीने होती है. मैं बांस की खूब ऊंची जेंड़ी बना कर उस पर चढ़ कर दौड़ता था. मेरी ऊंचाई कम से कम बारह फुट की हो जाती होगी.

मां दक्षिण की ओर के कमरे में रहती थीं. बंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल से उन्हें ले आया गया था. सिर्फ अनार का रस पीती थीं. वे बोलने के लिए अपने गले में डॉक्टरों द्वारा बनाई गई छेद में उंगली रख लेती थीं. वहां एक ट्यूब लगी थी. उसी ट्यूब से वे सांस लेती थीं. बहुत बारीक, ठंडी और कमजोर आवाज होती थी वह. कुछ-कुछ यंत्रों जैसी आवाज. जैसे बहुत धीमे वाल्यूम में कोई रेडियो तब बोलता है जब बाहर खूब जोरों की बारिश हो रही हो और बिजलियां पैदा हो रही हों, या तब जब सुई किन्हीं बहुत दूर के दो स्टेशनों के बीच कहीं अटक गई हो.

मां को बोलने में दर्द बहुत होता होगा. इसलिए कम ही बोलती थीं. उस यंत्र जैसी आवाज में हम मां की पुरानी अपनी आवाज खोजने की कोशिश करते. कभी-कभी उस असली और मां जैसी आवाज का कोई एक अंश हमें सुनाई पड़ जाता. तब मां हमें मिलती, जो हमारी छोटी-सी समृति में होती थी.

लेकिन मां सुनना सब कुछ चाहती थीं. सब कुछ. हम बोलते, लड़ते, चिल्लाते या किसी को पुकारते तो व्याकुलता से वे सुनतीं. हमारे शब्द उन्हें राहत देते होंगे.

उनकी सिर्फ आंखें बची थीं, जिन्हें देख कर मुझे उम्मीद बंधती थी कि मां कहीं जाएंगी नहीं - मेरे पूरे जीवन भर रही आएंगी. मैं हमेशा के लिए उनकी उपस्थिति चाहता था. चाहे वे चित्र की तरह या मूर्ति की तरह ही रही आएं. और न बोलें.

लेकिन उनके जीवित होने का विश्वास भी रहा आए, जैसा कि चित्रों के साथ नहीं होता.

मैं कभी-कभी बहुत डर जाता था और रोता था. अपने जीवन में अचानक मुझे कोई एक बहुत खाली - बिल्कुल खाली जगह दिख जाती थी. यह बहुत डरावना होता था. उस दिन मां ने मुझे बुलाया. बाहर मैदान में घास का रंग गहरा हरा था. बादल बहुत थे और हवा में भार था. वह भीगी हुई थी.

मां ने अपनी हथेली मेरे सामने फैला दी. दाएं हाथ की सबसे छोटी उंगली की बगलवाली उंगली का नाखून एक जगह से उखड़ गया था. उससे उन्हें बेचैनी होती रही होगी.

इस उंगली को सूर्य की उंगली कहते हैं.

मैं समझ गया और नेलकटर ला कर मां की पलंग के नीचे फर्श पर बैठ गया. नेलकटर में लगी रेती से मुझे उनकी उंगली का नाखून घिस कर बराबर करना था. मां यही चाहती थीं. वह नेलकटर पिताजी इलाहाबाद से लाए थे, कुंभ के मेले से लौटने पर, दो साल पहले. नेलकटर में नीले कांच का एक सितार बना था.

मां की उंगलियां बहुत पतली हो गई थीं. उनमें रक्त नहीं था. पीली-सी त्वचा. पतंगी कागज जैसी. पीली भी नहीं, जर्द. और बेहद ठंडी. ऐसा ठंडापन दूसरी, बेजान चीजों में होता है. कुर्सियों, मेजों, किवाड़ों या साइकिल के हैंडिल जैसा ठंडापन.

और हाथ उनका इतना हल्का कैसे हो गया था? कहां चला गया सारा वजन? वह भार शायद जीवन होता है, जिसे पृथ्वी अपने चुंबक से अपनी ओर खींचा करती है. जो अब मां के पास बहुत कम बचा था. उन्हें पृथ्वी खींचना छोड़ रही थी.

मैंने उसकी हथेली थाम रखी थी. और नाखून को रेती से धीरे-धीरे घिस रहा था. मैं उनके नाखून को बहुत सुंदर, ताजा और चिकना बना डालना चाहता था.

मैं एक बार हंसा. फिर मुस्कराता ही रहा. मां को ढांढस बंधाने और उन्हें खुश करने का यह मेरा तरीका था. मैंने देखा, मां को नाखून का हल्का-हल्का रेती से घिसा जाना बहुत अच्छा लग रहा है. उसके चेहरे पर एक सुख था, जो एक जगह नहीं बल्कि पूरे शरीर की शांति में फैला हुआ था, उन्होंने आंखें मूंद रखी थीं.

एक घंटा लगा. मैंने उनकी एक उंगली ही नहीं, सारी उंगलियों के नाखून खूब अच्छे कर दिए. मां ने अपनी उंगलियां देखीं. यह कितना कमजोर और हार का क्षण होता है, जब नाखून जीवन का विश्वास देते हैं. कितने सुदंर और चिकने नाखून हो गए थे.

मां ने मेरे बालों को छुआ. वे कुछ बोलना चाहती थीं. लेकिन मैंने रोक दिया. वे बोलतीं तो पूछतीं कि मैं सिर से क्यों नहीं नहाता? बालों में साबुन क्यों नहीं लगाता? इतनी धूल क्यों है? और कंघी क्यों नहीं कर रखी है?

रात में ठंड थी. बाहर पानी जोरों से गिर रहा था. सावन में रात की बारिश की अपनी एक गंभीर आवाज होती है. कुछ-कुछ उस तरह जैसे दुनिया की सारी हवाएं किसी बड़े से घड़े के अंदर घूमने लग गई हों. हर तरफ से बंद.

सुबह पांच बजे आंगन में पांच औरतें रो रही थीं. यह रोना नहीं था, विलाप था, पता चला मां रात में नींद में ही खत्म हो गईं.

मां खत्म हो गईं.

मैंने फिर कभी उनके घिसे हुए नाखून नहीं देखे. मैंने उस रात सोने से पहले अपने तकिए के नीचे वह नेलकटर रख दिया था. उसे मैंने बहुत खोजा . बल्कि आज तक. कई वर्षों बाद भी. लेकिन वह आज भी नहीं मिला. वह पता नहीं कहां खो गया था.

हो सकता है वह किसी बहुत ही आसान-सी जगह पर रखा हुआ हो और सिर्फ मेरे भूल जाने के कारण वह मिल नहीं पा रहा हो. मैं अक्सर उसे खोजने लगता हूं.

क्योंकि चीजें कभी खोती नहीं हैं, वे तो रहती ही हैं. अपने पूरे अस्तित्व और वजन के साथ. सिर्फ हम उनकी वह जगह भूल जाते हैं.
First published: May 14, 2017
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर