जिद्दू ने सिखायाः प्रेम आए तो ठीक, न आए तो भी ठीक

Manisha Pandey
Updated: May 12, 2017, 2:27 PM IST
जिद्दू ने सिखायाः प्रेम आए तो ठीक, न आए तो भी ठीक
Jiddu Krishnamurty
Manisha Pandey
Updated: May 12, 2017, 2:27 PM IST
ये दो साल पहले गर्मियों की बात है. मां-पापा मेरे घर आए हुए थे. एक दिन अचानक पापा की नजर मेरे बिस्तर के सिरहाने रखे बुकशेल्फ में लगी एक चिट पर गई. वो चिट इस तरह कोने में लगाई गई थी कि एक खास एंगल से बैठने और बहुत ध्यान से देखने पर ही दिखती. उस पर सबसे ऊपर लिखा था : थिंग्स टू डू बिफोर आय स्लीप और सबसे आखिर में लिखा था - प्रे फॉर फाइव मिनट्स.

बाकी सब तो ठीक था, जैसे कि सोने से पहले ब्रश करना, नाइट क्रीम लगाना, दूध फ्रिज में रखना वगैरह-वगैरह. लेकिन इस आखिरी पंक्ति पर उनकी निगाह रुक गई. 'प्रे फॉर फाइव मिनट्स' - उन्होंने मेरी तरफ आश्चर्य से देखा. उनकी आंखों में सवाल था. मानो पूछ रहे हों कि ये मैं क्या देख रहा हूं.

यह अचंभा भी बिना कारण नहीं था. मेरी परवरिश ही कुछ ऐसी थी. ठेठ बौद्धिक, मार्क्सवादी किस्म की. उसमें प्रार्थना की कोई जगह नहीं थी.

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लेकिन मेरी जिंदगी में प्रार्थना की जगह कब बन गई, मुझे पता ही नहीं चला. या शायद हमेशा से थी. बचपन में भी तो मैं कभी जिन्न, कभी परी से कुछ न कुछ प्रार्थना करती ही रहती थी. कभी ये कि मेरी स्कूल में खोई कॉपी वापस मिल जाए या कभी ये कि पापा मुझे साइकिल दिला दें. जब पहली बार पीरियड्स हुए तो मैं महीनों किसी दैवी शक्ति से ये गुहार लगाती रही कि मुझे इससे बचा लो. मुझे कोई वरदान दे दो या कोई ताबीज कि ये दोबारा कभी न हो. लेकिन कोई दुआ, कोई प्रार्थना काम न आई. मुझे किसी ने नहीं बचाया.

लेकिन मेरी प्रार्थनाएं कम नहीं हुईं. और ये सब तब हो रहा था, जबकि घर में भगवान, पूजा-पाठ का नामोनिशान नहीं था.

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फिर बहुत साल गुजर गए. एक बार मैं देहरादून से 30 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी गांव में दस दिनों का मौन साधे विपश्‍यना कर रही थी. एक दिन हम सब ध्यान में थे. तभी अचानक बाहर जोर की बारिश होने लगी. वह जगह इतनी दूर एकांत में थी कि सभ्यता का कोई शोर, कोई आवाज वहां पहुंच नहीं सकती थी. ऐसे में चिड़िया, झिंगुर और बारिश के कीड़ों की भिनभिनाहट भी तेज सुनाई देती.

उस दिन बाहर जोरों की बारिश हो रही थी. इतनी तेज, इतनी हाहाकारी कि बारिश की हर बूंद का शोर सुना जा सकता था. मेरा ध्यान टूटा. मैंने खिड़की से बाहर देखा. बाहर एक पेड़ के ऊंची शाखा पर एक बंदर बारिश से खुद को बचाने के लिए पत्तों की ओट लेने की कोशिश कर रहा था. वह काफी भीग चुका था. फिर भी बचना चाहता था, बारिश की बूंदों से, उसके शोर, उसकी देह पर गिरने की चोट से. वह सिकुड़ा जा रहा था, बचने के लिए पत्तों के बीच छिपा जा रहा था. मैं उसे काफी देर तक देखती रही.

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अचानक मुझे जाने क्या हुआ कि मेरा मन अपार कृतज्ञता से भर उठा. मैंने जीवन का शुक्रिया अदा किया कि मेरे सिर पर छत है. मैं इस वक्त इस सफेद बिछौने पर बैठी हूं. बारिश की बूंदें मुझे नहीं भिगो रहीं, मैं ठंड से ठिठुर नहीं रही. मैं गर्म, सुकून भरी जगह पर हूं. मैं कृतज्ञ हूं कि मैं यहां हूं. मेरी आंखों में आंसू थे और मन में अपार शांति.

क्या पता ये कई दिनों के निरंतर मौन और ध्यान का असर था कि मैंने प्रार्थना में हाथ जोड़ लिए और अपने हिस्से में आई जिंदगी के लिए शुक्रिया अदा किया. ये शुकराना किसी भगवान के लिए नहीं था, जो आसमान में रहता है. किसी मंदिर, किसी मूर्ति, धर्म की किसी किताब के लिए नहीं. ये शुकराना उस धरती के लिए था, जिसकी मिट्टी से हम सब उपजे, मैं भी उपजी. उस सूर्य के लिए था, जो रोज उगता है. उस बारिश के लिए, जिससे धरती नम है और नदियां खिलती हुई. जिसके पानी में पैर डालकर मैं थोड़ा और खुश हो जाती हूं. जिसकी मिट्टी में उपजते हैं वो आम, जो मुझे बेहद पसंद हैं.

ये शुकराना जीवन की हर उस चीज के लिए था, जो सुंदर है.

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उस दिन जब पापा ने पूछा कि पांच मिनट की प्रार्थना किससे, किसलिए. तो भी मेरा जवाब यही था, हर उस चीज के लिए, हर उस चीज से, जो सुंदर है. जिसके होने से जीवन सुंदर है, जिसके होने से मैं हूं. उन लोगों के लिए जिन्हें मुझसे प्रेम है, जिनसे मेरी खुशी है. उन सबसे करती हूं प्रार्थना, उन सबके लिए.

आपके लिए, मां के लिए.

जिद्दू कृष्णमूर्ति के लिए.

ये जो कृतज्ञता है, ये जो शांति है, ये उन्हीं की दी हुई है. पहले मुझे जीवन से बहुत शिकायतें थीं. मेरे मन का नहीं होता तो मुझे जीवन बेकार लगता. मैंने यही सीखा था कि संसार के सब दुखों की वजह संसार में है. मेरे सब दुखों की वजह भी संसार में है. समाज में, व्यवस्था में. व्यवस्था बदलेगी तो मेरे दुख भी बदल जाएंगे. मुझे कभी नहीं लगा कि मेरे दुख की वजह मेरे भीतर भी है. संसार का सबकुछ पढ़ना, सीखना, जानना चाहा, लेकिन अपने भीतर का कुछ नहीं देखा.

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लेकिन जिद्दू ने कहा कि पहले अपने भीतर देखो. पहले खुद को जानो. जो बुद्ध कहते हैं- अप्प दीपो भव. अपना दीपक स्वयं बनो. सब मुझमें ही है. मेरे दुख, मेरा सुख, मेरा प्रेम, मेरी करुणा, मेरी ईर्ष्‍या, मेरा द्वेष, मेरा त्याग, मेरा स्वार्थ. सबकुछ इसी देह में. बाहर कहीं कुछ नहीं. मुझे अब जीवन से शिकायत नहीं होती. मैं अब इस कुंठा में नहीं गलती कि मेरे मन का क्यों नहीं हो रहा. जो हो रहा है ठीक है. मुझे स्वीकार है. मैं कृतज्ञ हूं.

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एक समय मुझे हवा की बड़ी आस थी. मैं चाहती कि हवा बहे और ऐसे बहे कि मुझे भी अपने संग बहा ले जाए.

लेकिन जिद्दू कहते हैं कि तुम्हारे हाथ में बस इतना ही है कि तुम अपना कमरा साफ-सुंदर रखो. दीवारों को सजाओ और खिड़की - दरवाजे खोल दो. फिर अगर तुम खुशकिस्मत हुए तो शायद हवा आए. शायद नहीं भी आए. आए तो बहुत सुंदर और जो न भी आए तो कोई बात नहीं.

यही देखना है. बिना किसी पूर्वाग्रह, अपेक्षा, भय, स्वीकार-अस्वीकार के सिर्फ देखना. यही स्वीकार की ताकत है. यही जीवन है. प्रेम आए तो ठीक, न आए तो भी ठीक.

और जब आप उम्मीद में आंख नहीं लगाए होते, अपेक्षाओं के बोझ से नहीं दबे होते, तभी किसी दिन अचानक प्रेम दरवाजे पर दस्तक दे देता है.

खिड़की पर लगा पर्दा हिलता है. बाहर हवा चल रही होती है. जीवन चलता रहता है.
First published: May 12, 2017
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