अलविदा नक्श लायलपुरी : अब हर मोड़ पर कौन देगा हमें सदा...

News18Hindi

Updated: January 23, 2017, 11:36 AM IST
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जाने-माने उर्दू शायर और गीतकार नक्श लायलपुरी ने 88 साल की उम्र में रविवार को इस दुनिया से अलविदा कह दिया. नक्श लायलपुरी के नाम से पहचाने जाने वाले प्रख्यात उर्दू शायर और गीतकार जसवंत राय शर्मा के एक पारिवारिक मित्र ने कहा कि वह कुछ दिनों से बीमार थे और उन्होंने अंधेरी स्थित अपने घर पर रविवार सुबह लगभग 11 बजे अंतिम सांस ली.

उनकी पुत्र-वधू टीना घई ने बताया कि लायलपुरी ने शनिवार शाम सात बजे के बाद अपनी आंखें नहीं खोली थीं. वह अपनी बेटी के अलावा किसी अन्य को पहचान नहीं पा रहे थे. टीना ने कहा, ''वह बहुत तकलीफ में थे. मार्च और अक्टूबर में उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई थी और वह अस्पताल में भर्ती थे. वह बहुत कमजोर हो गए थे.''

अलविदा नक्श लायलपुरी : अब हर मोड़ पर कौन देगा हमें सदा...
PIC : TWITTER

टीना ने कहा, ''वह अब भी उर्दू शायरी पढ़ना चाहते थे और काफी कुछ पढ़ने को बचा हुआ था. उनकी एक आंख की रोशनी खत्म हो गई थी, लेकिन वह फिर भी पढ़ना चाहते थे, पढ़ने की उनकी प्रबल इच्छा थी.''

हिंदी सिनेमा में करियर बनाने के लिए मुंबई पहुंचे

पंजाब के लायलपुर में जन्मे लायलपुरी 1940 के दशक में हिंदी सिनेमा में करियर बनाने के लिए मुंबई पहुंचे थे. बता दें कि लायलपुर अब पाकिस्तान का हिस्सा है. हालांकि, उन्हें गीतकार के रूप में पहला मौका 1952 में मिला था, लेकिन 1970 के दशक प्रारंभ तक उन्हें खास सफलता नहीं मिल पाई थी. फिल्मों में उन्हें पहला ब्रेक 1952 में फिल्म ‘जग्गू’ में मिला, जिसमें उन्होंने ‘‘अगर तेरी आंखों से आंखें मिला दूं’’ गीत लिखा था. उनकी चर्चित फिल्मों में ‘‘चेतना’’, ‘‘आहिस्ता आहिस्ता’’, ‘‘तुम्हारे लिए’’, ‘‘घरौंदा’’ भी शामिल हैं.

संघर्ष के दिनों में डाक विभाग में भी किया काम

मुंबई में अपने संघर्ष के शुरुआती दिनों में उन्होंने कुछ समय डाक विभाग में भी काम किया था. उन्होंने कई शीर्ष फिल्म निर्देशकों, संगीत निर्देशकों और गायकों के साथ काम किया और सुमधुर, रुमानी और भावनात्मक गीत लिखे, जो लाखों दिलों को छू गया. लायलपुरी के लिख कुछ सर्वश्रेष्ठ गीतों में ‘मैं तो हर मोड़ पर’, ‘ना जाने क्या हुआ’, ‘जो तूने छू लिया’, ‘उल्फत में जमाने की हर रस्म को ठुकरा’ और ‘दो दीवाने शहर में’ शामिल हैं.

बॉलीवुड की मांगों से दुखी होकर ले लिया था संन्यास

बाद के दिनों में गीतों में सतही बातें शामिल करने की मांग से दुखी लायलपुरी ने 1990 के अंतिम दशक में बॉलीवुड से संन्यास ले लिया और टेलीविजन के लिए गीत लिखने लगे थे. उन्होंने 2005-06 में संक्षिप्त समय के लिए फिल्मों में वापसी की थी और नौशाद के साथ ‘ताज महल’ और खय्याम के साथ ‘यात्रा’ जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे थे.

बंटवारे के दर्द को करीब से किया महसूस

नक्श लायलपुरी ने भारत के बंटवारे के दर्द को बहुत ही करीब से महसूस किया था. 1947 में वे शरणार्थियों के एक काफिले के साथ उस पार के पंजाब से भारत में पैदल दाखिल हुए थे. उन्होंने अपना पहला फिल्मी गाना निर्माता जगदीश सेठी की फिल्म के लिए 1951 में लिखा था.

नक्श लायलपुरी कहते हैं कि गीतकार के रुप में उन्हें बुलंदी बी.आर इशारा की फिल्म ‘चेतना’ से मिली और उसमें उनकी नज्म ‘मैं तो हर मोड़ पर तुमको दूंगा सदा ‘ बहुत ही सराही गई.

मदनमोहन से खासे प्रभावित थे नक्श लायलपुरी

नक्श लायलपुरी के फिल्मी गानों की बहुत दिनों तक धूम रही. नक्श ने जयदेव, ख्य्याम, मदन मोहन और रोशन, इन सभी के साथ खूब काम किया, लेकिन विशेष रूप से वह मदन मोहन से काफी प्रभावित थे. उनके गीतों को सभी प्रमुख गायकों ने गाए थे.

पिछले कई सालों से वह मुम्बई में एक गुमनाम जिन्दगी बिता रहे थे. पिछले दिनों उनकी पुस्तक ‘आंगन आंगन बरसे गीत’ उर्दू में प्रकाशित हुई थी. वह पिछले 50 से भी ज्यादा बरसों से हिंदी फिल्मों में उर्दू के गीत लिखते रहे थे.

नक्श लायलपुरी की कुछ मशहूर शायरी

- हम ने क्या पा लिया हिन्दू या मुसलमां हो कर

क्यूँ न इंसां से मोहब्बत करें इंसां हो कर

- नाम होंठों पे तिरा आए तो राहत सी मिले

तू तसल्ली है दिलासा है दुआ है क्या है

- ये अंजुमन ये क़हक़हे ये महवशों की भीड़

फिर भी उदास फिर भी अकेली है ज़िंदगी

- मैं दुनिया की हक़ीकत जानता हूं

किसे मिलती है शोहरत जानता हूँ

- जब दर्द मुहब्बत का मेरे पास नहीं था

मैं कौन हूं, क्या हूँ, मुझे एहसास नहीं था

- एक आंसू गिरा सोचते-सोचते

याद क्या आ गया सोचते-सोचते

- कई ख्व़ाब मुस्कुराए सरे शाम बेख़ुदी में

मेरे लब पे आ गया था तेरा नाम बेख़ुदी में

- तमाम उम्र चला हूं मगर चला न गया

तेरी गली की तरफ़ कोई रास्ता न गया

नक्श लायलपुरी के लिखे फिल्मी गीत

First published: January 23, 2017
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