दाग ही पहचान हैः कोई है टैंकर तो किसी को बुलाते हैं बम

Manoj Rathore | ETV MP/Chhattisgarh
Updated: July 14, 2017, 2:06 PM IST
दाग ही पहचान हैः कोई है टैंकर तो किसी को बुलाते हैं बम
Photo- News18
Manoj Rathore | ETV MP/Chhattisgarh
Updated: July 14, 2017, 2:06 PM IST
दुनिया में हर व्यक्ति की पहचान के लिए एक नाम होता है, जो उसके मां-बाप देते हैं. लेकिन अपराध की दुनिया में कदम रखने वाले ज्यादातर बदमाशों के पीछे उर्फियत ही उनकी पहचान बन जाती है. अपराध का दामन छोड़ ये बदमाश सही रास्ते पर चलने भी लगते हैं, लेकिन आज भी इन बदमाशों के नाम से जुड़े ये 'दाग' धुल नहीं पाए है.

भोपाल में बदमाशों को ‘टोपी’,‘बम’, ‘पेंटर’, ‘काला’,‘रेडियो’, ‘बकरा’, ‘टैंकर’, ‘बघीरा’ और ‘छू’ जैसी उर्फियत से नवाजा गया है. ये उर्फियत इनके काम के आधार पर पुलिस या लोगों ने इन्हें दी है. पुलिस की एफआईआर में इनके नाम के पीछे इनकी उर्फियत को दर्ज किया जाता है.

महाराष्ट्र के साथ ही भोपाल के अपराध जगत में लिप्त बदमाशों में उर्फियत का सबसे ज्यादा चलन है. पुलिस भी इन्हें अलग-अलग पहचान देने के लिए उर्फियत का इस्तेमाल करती है. लेकिन शहर के कुछ ऐसे भी बदमाश है, जिन्होंने अपराध के रास्ते को छोड़ दिया. अब वो शराफत की जिदंगी बसर कर रहे हैं. किसी के पास सरकारी नौकरी है, तो कोई प्राइवेट कामकाज से अपने परिवार का पेट पाल रहा है. इन्होंने अपराध करना तो छोड़ दिया, लेकिन शहर में आज भी उनकी पहचान उनकी उर्फियत से होती है.



घनश्याम को शहर में कई सालों पहले तोड़फोड़ के नाम से जाना जाता था. घनश्याम ने 2003 में अपराध का साथ छोड़ दिया और स्वास्थ्य विभाग में सरकारी नौकरी करने लगे. घनश्याम का कहना है कि पहले वो किसी की नहीं सुनता था और सीधे तोड़फोड़ शुरू कर देता था. लोगों ने ही उसे तोड़फोड़ की पहचान दी. अब घनश्याम की धर्म के प्रति आस्था बढ़ गई है.

सचिन 15 साल की उम्र से ही अपराध की दुनिया से जुड़ चुका था. उस पर 15 से ज्यादा मामले में चल रहे हैं. सचिन पुणे की जेल में सजा भी काट चुका है. सचिन बचपन से ही अपराध करने लगा था, इसलिए उसे लोग सचिन बच्चा के नाम से जानने लगे. अपराध का साथ छोड़ने के बावजूद सचिन के साथ उसकी उर्फियत ने आज तक पीछा नहीं छोड़ा.

अपनी गैंग की लीडरशीप करने के चलते शुभम को सरदार नाम की एक नई पहचान मिली है. मामा की हत्या के बाद शुभम ने अपराध की दुनिया में कदम रखा और एक के बाद एक कर दो सालों में ही उसने 30 से ज्यादा अपराधों को अंजाम दे दिया. अब शुभम ठेकेदारी कर अपने परिवार को पाल रहा है. लेकिन उसकी ये उर्फियत और सरदार वाली पहचान उसका पीछा छोड़ने का नाम नहीं ले रही है.

घनश्याम, सचिन और शुभम के जैसे ही शिवम सोनवने को विलाल नाम से जाना जाता है. शिवम को विलाल नाम का सिंगर पसंद था और उसने सिंगर की तरह ही अपने बाल रखकर अपराध को अंजाम देना शुरू किया. आज शिवम प्राइवेट नौकरी कर रहा है. शिवम ने अपराध करना तो छोड़ दिया, लेकिन आज भी उसकी पहचान उसके साथ चल रही है.

अभी राजधानी में कुछ गिने-छुने बदमाशों के नाम के आगे उनकी उर्फियत ही काम कर रही है-
-टीलाजमालपुरा निवासी राजेश छू और उसका भाई कपिल छू दोनों ही कई मर्तबा पुलिस अभिरक्षा से फरार हो चुके हैं.
-पुराने शहर के नामी बदमाश रहे मून्ने पेंटर और पप्पू पेंटर मकानों में पुताई का काम करते थे. अपराध जगत में दस्तक देने के बाद इनके नामों के पीछे पुलिस ने अपने रिकार्ड में पेंटर उर्फियत जोड़ दिया.
-जहांगीराबद के बदमाश सलीम की जब भी गिरफ्तारी होती थी, तो उससे देशी कट्टा बरामद होता था.ऐसे में उसकी उर्फियत 6 राउंड हो गई, जिसे अब शहर की पुलिस इसी नाम से पुकारती है.
-शहर के इंद्रानगर कालोनी निवासी बदमाश रईस एक दुकान पर रेडियो सुधारने का काम करता था, जिसे रेडियो टांगकर गाने सुनने का भी शौक था. अपराध जगत में आते ही उसकी उर्फियत रेडियो हो गई.
-प्यारे फूक्की के पिता को भी फूक्की नाम से पहचाना जाता था, जिनकी मौत के बाद उनके बेटे प्यारे को भी फुक्की नाम से ही आज भोपाल में पहचाना जाता है.

इन बदमाशों की भी अजीबों-गरीब उर्फियतें
फिरोज लोटिया, फिरोज छडी, अंकित टकलू, सचिन बच्चा, इमरान कटोरा, राकेश ढक्कन, शादाब जहरिला, दिपक अद्धा, विशाल चिराटा, जावेद चिराटा, रईस कबूतर, मून्ना टार्जन, तंजिल गोटी,सोनू एंजिल, विशाल जगिरा.

-15 अगस्त 1994 में बिजली कालोनी की दीवार के पास एक बम ब्लास्ट हुआ था...इस मामले में अशोका गार्डन के फईम को गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद अब उसे फईम बम के नाम से जाना जाता है.

भले अपराध जगत की छाया इन बदमाशों से दूर चली गई हो, लेकिन आज भी उनकी पहचान उनपर हावी है. समाज में अपना स्थान बनने वाले इन शरीफ बदमाशों का अपराध जगत से अब कोई नाता नहीं है. ये सच्चाई है कि अपराध का रास्ता छोड़ने के बाद कुछ ऐसे लोग हैं, जो अपनी उर्फियत और अपराध जगत की पहचान का आज भी दंश झेल रहे हैं.
First published: July 14, 2017
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