अलविदा! एशिया की पहली महिला कर्नल थीं लक्ष्मी सहगल

News18India

Updated: July 23, 2012, 4:02 PM IST
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कानपुर।नेताजी सुभाषचंद्र बोस की निकट सहयोगी और आजाद हिंद फौज में रानी झांसी रेजीमेंट की कमान संभालने वाली कैप्टन लक्ष्मी सहगल का सोमवार को कानपुर में निधन हो गया। वे 97 साल की थीं और कुछ दिन पहले ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। उन्होंने बतौर डॉक्टर आजीवन गरीबों की सेवा की और 2002 में बतौर वामपंथी उम्मीदवार डा.ए पी जे अब्दुल कलाम के खिलाफ राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लड़ा। उन्होंने कई साल पहले देहदान का संकल्प लिया था,लिहाजा उनका किसी धार्मिक रीति से अंतिम संस्कार नहीं होगा।

हिंदुस्तानी महिलाओं के शौर्य और बलिदान की जिंदा मिसाल कही जानी वाली कैप्टन लक्ष्मी सहगल अब इतिहास का हिस्सा बन गई हैं। सोमवार को सुबह 11 बजकर 20 मिनट पर कानपुर के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया। 19 जुलाई की सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से ही वो अस्पताल में थीं। नेता जी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की कमांडर रहीं कैप्टन लक्षमी सहगल की उम्र इस समय 97 साल थी।

अलविदा! एशिया की पहली महिला कर्नल थीं लक्ष्मी सहगल
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की निकट सहयोगी और आजाद हिंद फौज में रानी झांसी रेजीमेंट की कमान संभालने वाली कैप्टन लक्ष्मी सहगल का सोमवार को कानपुर में निधन हो गया। वे 97 साल की थीं और कुछ दिन पहले ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।

लक्ष्मी सहगल का जन्म 24 अक्टूबर 1914 में एक परंपरावादी तमिल परिवार में हुआ था। मद्रास मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री लेने के कुछ साल बाद एक डॉक्टर की हैसियत से वो 1940 में सिंगापुर चली गईं। 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने घायल युद्धबंदियों के लिए काफी काम किया। जुलाई 1943 में जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस सिंगापुर आए तो डॉ. लक्ष्मी उनके विचारों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकीं और आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गईं। उन्हें आजाद हिंद फौज की 'रानी लक्ष्मी रेजिमेंट' का कमांडर बनाया गया। बाद में उन्हें कर्नल का ओहदा दिया गया, जो एशिया में किसी महिला को पहली बार मिला था। लेकिन लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा।

आज़ाद हिंद फ़ौज की हार के बाद 1946 में ब्रिटिश सेनाओं ने स्वतंत्रता सैनिकों की धरपकड़ शुरू की तो लक्ष्मी सहगल भी गिरफ्तार कर ली गईं। उन्हें भारत लाया गया लेकिन आजादी के लिए तेजी से बढ़ रहे दबाव के बीच उन्हें रिहा कर दिया गया। लक्ष्मी सहगल ने 1947 में आजाद हिंद फौज के ही जांबाज सिपाही कर्नल प्रेम कुमार सहगल से शादी की और मजदूरों की सेवा के लिए कानपुर में बस गईं, जो उद्योगनगरी के रूप में मशहूर थी। वे जब तक स्वस्थ रहीं, अपने क्लीनिक में और घर पर बीमारों की सेवा करती रहीं। उनके निधन की खबर से हर तरफ शोक की लहर दौड़ गई है।

समाज सेवा के अलावा कैप्टन लक्ष्मी सहगल, राजनीति में भी सक्रिय रहीं। 1971 में वे मर्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से राज्यसभा की सांसद बनीं। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की संस्थापक सदस्यों में रहीं। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें 1998 में उन्हें पद्मविभूषण से नवाजा गया। लक्ष्मी सहगल ने 2002 में डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ वामपंथी उम्मीदवार के रूप में राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आई।

उन्होंने कुछ साल पहले देहदान का संकल्प लिया था। मंगलवार को देहदान के लिए उनकी अंतिम यात्रा कानपुर के मेडिकल कॉलेज पहुंचेगी। जिस देह के जरिये उन्होंने जीवन भर समाजसेवा की,वो अब प्राणहीन होने के बावजूद मरीजों या चिकित्सा क्षेत्र के शोधार्थियों के काम आएगी। बेमिसाल स्वतंत्रता सेनानी, समर्पित डॉक्टर, निष्ठावान सांसद और अद्भुत समाजसेवी के रूप में देश उन्हें हमेशा याद रखेगा।

First published: July 23, 2012
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