केजरीवाल की चुप्‍पी एक बड़ा सवाल? क्‍या बदल गई उनकी राजनीति

विक्रांत यादव | News18Hindi
Updated: July 15, 2017, 4:09 PM IST
केजरीवाल की चुप्‍पी एक बड़ा सवाल? क्‍या बदल गई उनकी राजनीति
दूसरा बड़ा बदलाव देखने को मिला कि इन नतीजों के बाद अरविंद केजरीवाल दिल्ली में बेहद सक्रिय हो गए. उनके आलोचक कहते थे कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पर कतई ध्यान नहीं दिया.
विक्रांत यादव | News18Hindi
Updated: July 15, 2017, 4:09 PM IST
11 मार्च 2017 यही वो दिन था, जब पंजाब चुनाव का नतीजा आया और इस चुनाव नतीजे ने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की राजनीति की दशा और दिशा पूरी तरह से बदल दी. सड़क पर आंदोलन कर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे अरविंद केजरीवाल की पूरी राजनीति बेहद आक्रामक रही है. जब वो दिल्ली की सड़क पर लोकपाल के लिए आंदोलन कर रहे थे, तब भी बेहद आक्रामक थे और जब दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए तब भी वो आक्रामक तेवर कम नहीं हुए. मुख्यमंत्री रहते हुए धरना देना हो या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखे आरोप हों, अरविंद केजरीवाल की भाषा और शैली की आक्रामकता कभी हल्की नहीं दिखाई दी. पार्टी ने पंजाब चुनाव में जीत सुनिश्चित मानते हुए लड़ा. लेकिन सिर्फ एक चुनाव नतीजे ने अरविंद केजरीवाल की आक्रामक शैली और तीखे शब्दों को पूरी तरह से गायब ही कर दिया.

पंजाब के चुनाव नतीजे वाले दिन यानी 11 मार्च 2017 को पार्टी मान कर चल रही थी कि वो पंजाब का चुनाव जीत चुकी है और अब औपचारिक ऐलान ही होना बाकी है. अरविंद केजरीवाल के घर फ्लैग स्टाफ रोड़ को शानदार तरीके से सजाया गया था. बड़ा सा मंच बना था. मीडिया के लिए जगह मुकर्रर था. बड़ी टीवी स्क्रीन लगी थी. यानी पार्टी पूरी तरह से मान कर चल रही थी कि चुनाव नतीजों का ऐलान होते ही वहां शानदार जश्न होगा. लेकिन जैसे जैसे चुनाव नतीजे सामने आने शुरू हुए, पार्टी की रौनक भी गायब होनी शुरू हो गई. शानदार जीत का इंतजार कर रही पार्टी को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा. हालांकि पहली बार पंजाब का चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी और उसके 20 उम्मीदवार जीतने में भी कामयाब हुए. लेकिन बहुमत के पुरजोर दावे के साथ चुनाव लड़ने वाली पार्टी की ये जीत उसके लिए हार सरीखा ही बन गई. इस नतीजे के बाद स्थिति ये बनी कि अरविंद केजरवाल सामने भी नहीं आए.

अरविंद केजरीवाल के करीबी नेता बताते हैं कि इस नतीजे ने अरविंद केजरीवाल को काफी मायूस कर दिया. वो सोच ही नहीं पा रहे थे कि आखिर पंजाब की सुनिश्चित जीत हार में कैसे तब्दील हो सकती है. इस हार ने पार्टी के सामने एक और गंभीर संकट खड़ा कर दिया, वो था दिल्ली के नगर निगम का चुनाव. पार्टी मान कर चल रही थी कि पंजाब वो जीत ही रहे हैं और उसके बाद नगर निगम से बीजेपी का सूपड़ा साफ कर देंगे. पंजाब नतीजों के करीब डेढ़ महीने बाद 23 अप्रैल को नगर निगम के चुनाव थे. बेहद बेमन से अरविंद केजरीवाल ने इन चुनावों में पार्टी के लिए प्रचार किया. दिल्ली और पंजाब विधानसभा चुनाव में एक दिन में सात-आठ-नौ सभा करने वाले अरविंद केजरीवाल ने गिनती की सभाएं की. इन सभाओं में भी उनकी वो आक्रामकता पूरी तरह से गायब थी. यहां तक कि मीड़िया को ये जानकारी भी नहीं मिल पाती थी कि किस दिन अरविंद केजरीवाल कहां पर प्रचार करने जाएंगे. किस तरह मायूस थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि निगम चुनाव के प्रचार के आखिरी दिन अरविंद केजरीवाल दोपहर 2 बजे अपने घर से निकले थे और शाम पांच बजे प्रचार बंद होना था.

खैर 26 अप्रैल को नतीजा आया और आम आदमी पार्टी तीनों नगर निगम में हार गई और बीजेपी को जीत मिली. वैसे तो पंजाब चुनाव के बाद से ही अरविंद केजरीवाल की राजनीति बदल गई थी. लेकिन इन नतीजों ने उन्‍हेें पूरी तरह से बदल दिया. सबसे बड़ा बदलाव देखने में आया कि पंजाब नतीजों के बाद अरविंद केजरीवाल ने एक बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कोई तीखा राजनीतिक हमला नहीं किया है. जबकि पहले वो पीएम मोदी को COWARD AND PSYCHOPATH तक कह चुके थे. पार्टी के एक वरिष्ठ रणनीतिकार ने बताया कि पंजाब और दिल्ली नगर निगम के चुनाव के आकलन के बाद पार्टी ने ये पाया कि पीएम मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में जनता के बीच कोई खास कमी नहीं आई है. लिहाजा उन पर व्यक्तिगत हमले करने का कोई राजनीतिक लाभ नहीं है, उलटा नुकसान जरूर उठाना पड़ सकता है. बीजेपी पर अगर हमला करना है, तो केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर करना होगा. जनता के बीच ये बताना होगा कि केंद्र की गलत नीतियों और फैसलों का किस तरह से नकारात्मक असर उठाना पड़ेगा.

दूसरा बड़ा बदलाव देखने को मिला कि इन नतीजों के बाद अरविंद केजरीवाल दिल्ली में बेहद सक्रिय हो गए. उनके आलोचक कहते थे कि मुख्यमंत्री बनने के बाद अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली पर कतई ध्यान नहीं दिया. दिल्ली को उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया के हवाले छोड़कर वो पार्टी के विस्तार और दूसरे राज्यों में चुनाव लड़ने की तैयारियों में ही जुटे रहे. इन नतीजों के बाद अरविंद केजरीवाल का ध्यान पूरी तरह से दिल्ली सरकार में दिखाई भी दिया. पहले के मुकाबले दिल्ली सचिवालय में उनकी मौजूदगी काफी बढ़ गई. दिल्ली के नागरिकों को 52 तरह की मुफ्त सर्जरी का ऐलान हो या फिर दिल्ली देहात में सरकारी स्कूल में बना शानदार हॉकी का ग्राउंड हो. अरविंद केजरीवाल की मौजूदगी अब केवल दिल्ली सरकार से जुड़े कार्यों में ही दिखाई देने लगी. अपने ट्विटर अकाउंट से भी अरविंद केजरीवाल लगातार राजनीतिक विरोधियों खासतौर से बीजेपी,पीएम मोदी को घेरते थे. लेकिन अब उनके ट्विटर अकाउंट से ज्यादातर दिल्ली सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की जानकारी ही मिलती है. पूर्व उपराज्यपाल के साथ अरविंद केजरीवाल के खराब संबंध सार्वजनिक तौर पर दिखाई देते थे.

कई मौकों पर उपराज्यपाल के खिलाफ भी उन्होंने आक्रामक शैली और तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया. सूत्रों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि वर्तमान उपराज्यपाल के साथ उनके संबंध अच्छे हैं और किसी मुद्दे पर विरोध नहीं है. लेकिन अब आक्रामक शैली और तीखे शब्दों का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद हो गया है. उपराज्यपाल को घेरते हुए भी अरविंद केजरीवाल अगर अब ट्विट करते हैं तो सर शब्द का इस्तेमाल करना नहीं भूलते.

पंजाब नतीजों से पहले पार्टी ने गुजरात, मध्यप्रदेश राजस्थान जैसे राज्यों में भी चुनाव लड़ने की तैयारियां की हुई थी. गुजरात अरविंद केजरीवाल गए भी थे. लेकिन अब सूत्रों का कहना है कि इन राज्यों में चुनाव लड़ने का कोई फैसला नहीं हुआ है. पहले हर राज्य में संगठन विस्तार की प्रक्रिया में अरविंद केजरीवाल स्वयं काफी दखल देते थे. लेकिन अब स्थानीय राज्य स्तर के नेताओं के जिम्मे ही ये काम छोड़ा हुआ है. दरअसल अरविंद केजरीवाल और पार्टी को भी ऐसा लगने लगा है कि राष्ट्रीय राजनीति में बने रहने के लिए दिल्ली में मजबूत रहना उनके लिए बेहद जरूरी है. यही कारण है कि अब पार्टी और खासतौर से अरविंद केजरीवाल का पूरी फोकस दिल्ली पर ही है.

इसी के साथ एक और जो बड़ा परिवर्तन देखने में आया है कि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता के बीच अपनी उपस्थिति बढ़ा दी है. वो नियमित तौर पर अपने घर पर तो दिल्ली वासियों से मिल ही रहे हैं, अपने विधानसभा क्षेत्र यानी नई दिल्ली इलाके में भी अक्सर घूमते हुए दिख रहे हैं. यानी एक बार फिर जिस जनता के साथ आंदोलन शुरू कर अपनी पकड़ बनाई थी. उसी जनता के साथ एक बार फिर सीधे संपर्क करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. साथ ही पार्टी के तमाम विधायकों और दिल्ली सरकार के मंत्रियों को भी हिदायत दी गई है कि वो नियमित तौर पर जन-संपर्क के काम में शामिल रहें. शायद पार्टी को ये समझ में आ गया है कि अगर दिल्ली में अपनी खोई जमीन को वापस पाना है, तो वो जनता के बीच मौजूदगी के साथ ही पाई जा सकती है.
First published: July 15, 2017
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